झारखंड के विभिन्न इलाकों के दौरे पर गए जांच दल ने कहा- असंवैधानिक नहीं है पत्थलगड़ी

विवाद , रांची, सोमवार , 07-05-2018


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विशद कुमार

रांची। जब से झारखंड में भाजपा—नीत रघुवर सरकार सत्ता में आई है, राज्य में आदिवासी समुदाय की पारंपरिक प्रथा पत्थलगड़ी को लेकर सरकार की चिंताएं बढ़ गई हैं। सूबे के मुख्यमंत्री रघुवर दास पत्थलगड़ी को लेकर काफी परेशान दिख रहे हैं, कारण जो भी हो। वे बार-बार कहते नहीं थकते कि पत्थलगड़ी राष्ट्रद्रोही शक्तियों के इशारे पर हो रहा है जो गैरसंवैधानिक है। जबकि सच तो यह है कि पत्थलगड़ी आदिवासियों की प्रथा के तहत ग्रामसभा के रूप में हमारे संविधान में भी शामिल है।  

पेश है पत्थलगड़ी के संवैधानिकता या गैरसंवैधानिकता को लेकर एक जांच दल द्वारा किए गए शोध के बाद जारी एक विस्तृत रिपोर्ट। इस रिपोर्ट को 1 मई 2018 को दिल्ली से आए 9 सदस्यीय आदिवासी समाजकर्मियों के एक दल ने जारी किया। इसमें 15 सदस्यीय मीडिया ग्रुप भी शामिल था। जिसने खूंटी जिले के भंडरा कुदाटोली ग्रामसभा और जिकिलता ग्रामसभा के दौरे के बाद इस रिपोर्ट को जारी किया।

पत्थलगड़ी की एक तस्वीर।

यह समझने के लिए कि क्या इस इलाके की ग्रामसभाओं द्वारा किया जा रहा पत्थलगड़ी वाकई असंवैधानिक है? दल ने दोनों ग्रामसभाओं के साथ बैठक की और जानने की कोशिश की कि उनके द्वारा किया जा रहा पत्थलगड़ी किस नजरिये से संविधान विरोधी नहीं है। यह पिछले सात दशकों में आदिवासी इलाकों के लिए संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद अपेक्षित विकास कार्य नहीं किये जाने का परिणाम है। उनके द्वारा की जा रही पत्थलगड़ी विकास के कार्य में बहस को तेजी प्रदान करता है । पत्थलगड़ी लोकतंत्र को मजबूत करता है न कि उससे लोकतंत्र का सिकुड़न होता है।

इस टीम ने खूटी के दौरे से वापस लौट कर एक रिपोर्ताज बनाया है जिसे यहां दिया जा रहा है:

पृष्ठभूमि –

झारखण्ड के 13 अनुसूचित जिलों में खूँटी जिला भी अनुसूचित है। इस अनुसूचित जिले में पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों का तनिक भी लाभ यहां के मुंडा आदिवासियों को नहीं मिला है। आजादी के 70 सालों के बाद भी यहां के लोग मूलभूत सुविधाओं से महरूम हैं। यहां के आदिवासियों का विश्वास सरकार के ऊपर से उठ चुका है। इसलिए उन्होंने अब अपने गांवों के सीमाओं में पत्थलगड़ी करने का काम जोर शोर से शुरू कर दिया है । इसके तहत ये पत्थल में संविधान के अनुच्छेदों यथा 13 (3) (क), 244 (1), 244 (2), 141 (1), 19 (5), 19(6), सहित आदिवासियों से सम्बंधित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को पत्थर में उकेरना शुरू कर दिए हैं। इस इलाके का पहला पत्थलगड़ी 09 मार्च 2017 को भंडरा गांव में करने के साथ ही इस जिले के अन्य 300 गांवों में पारंपरिक तरीके से उस काम को पूरा कर लिया गया है। इसके बाद गांव में बिना अनुमति के अन्य लोगों का प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है ।

जांच दल के साथ आदिवासियों की बैठक।

दौरे पर गयी टीम ने इस दौरान भंडरा कुदाटोली गाँव में जब ग्रामप्रधान से ये पूछा कि सरकार इस पत्थलगड़ी को असंवैधानिक कह रही है तो क्या ये पत्थलगड़ी असंवैधानिक है? इसके जवाब में ग्रामप्रधान ने बताया की पत्थलगड़ी प्राचीन समय से चली आ रही परंपरा है जिसका निर्वाह हम लोग आज तक करते आ रहे हैं। हम लोग अनेकों तरह की पत्थलगड़ी करते हैं। ब्रिटिश शासन काल में जब छोटानागपुर क्षेत्र में स्थाई बंदोबस्ती कानून लागू किया गया और जमीन की लिखा पढ़ी होने लगी तो इस क्षेत्र में बाहरियों ने अवैध रूप से जमीन अपने नाम में लिखवा ली।

इस कारण से यहां विद्रोह भड़क उठा और ये मामला न्यायालय में चला गया। उस समय न्यायालय कलकत्ता में हुआ करता था। जब न्यायालय ने जमीन का सबूत माँगा तो इस इलाके के लोग पत्थलगड़ी के पत्थर को ही ढो कर पैदल कलकत्ता ले कर चले गए और न्यायालय के समक्ष इसी पत्थलगड़ी के पत्थर को जमीन के सबूत के रूप में न्यायालय के समक्ष पेश किया। न्यायालय ने पत्थलगड़ी के पत्थर को सबूत के तौर पर माना और आदिवासियों की विधि और प्रथा को मान्यता प्रदान की । पत्थलगड़ी हमारी पारम्परिक प्रथा है और संवैधानिक भी।

खूंटी जिला प्रोफाइल:

कुल क्षेत्रफल       - 2535 वर्ग किमी

जनसंख्या घनत्व   -    210 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी

कुल जनसंख्या     -  531885

पुरुष जनसंख्या     -   266335

महिला जनसंख्या    -   265550

लिंगानुपात         -      997

साक्षरता दर        -    63.86 %

पुरुष साक्षरता       -    74.08 %

महिला साक्षरता     -    53.69%   

आदिवासी जनसँख्या   -   389626

आदिवासी पुरुष      -   193710

आदिवासी महिला    -    195916

आदिवासी जनसंख्या % -   73.25 %

लोग कैसे प्रवेश करें:

गांव की सीमा के पास जहां पत्थलगड़ी किया गया है वहां उस गांव के एक दो व्यक्ति रहते हैं अगर आपको उस गांव में प्रवेश करना है तो उन लोगों के माध्यम से गांव के मुंडा के पास जाकर गांव में प्रवेश की अनुमति मांगनी पड़ेगी। गांव के युवा आगंतुकों से आगंतुक रजिस्टर में आवश्यक प्रविष्टियां जिसमें आगंतुक का नाम, मिलने वाले व्यक्ति का नाम, मिलने का उद्देश्य, पता एवं फोन नंबर, तिथि और वापसी का समय आदि के प्रविष्टि और ग्राम सभा आयोजन कर उसकी अनुमति के बाद उन्हें गांव में प्रवेश की अनुमति प्रदान की जाती है। यदि ग्राम सभा आगंतुकों के उद्देश्य से संतुष्ट नहीं हो पाता है तो उन्हें अनुमति नहीं भी दी जा सकती है। इस दायरे में सरकारी कर्मचारी भी सम्मिलित हैं।

क्या है इसके पीछे वजह: 

पूर्व में घटित घटनाओं के आधार पर यह देखा गया है कि कुछ गैर आदिवासी और बाहरी लोग बगैर अनुमति के गांव में प्रवेश कर जाते हैं और कुछ अप्रिय घटनाओं को अंजाम देकर फरार हो जाते हैं। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति पर प्रतिबन्ध लगाने के उद्देश्य से यह व्यवस्था लागू की गयी है।

पत्थलगड़ी किये जाने के प्रमुख कारण:

1. संविधान के प्रावधानों की जानकारी देना

2. 5 वीं अनुसूची के अधिकारों को उल्लेखित करना

3. ग्रामसभा की रुढ़ी एवं परंपरा की बातों को लिखना

4. पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था की वकालत एवं उनको उजागर करना 

पत्थलगड़ी किये जाने के तात्कालिक कारण:

1.15 सितम्बर 2016 को सीएनटी और एसपीटी एक्ट में संशोधन के खिलाफ रांची में आयोजित विरोध-प्रदर्शन में सम्मिलित होने के लिए जाने के क्रम में सायको के पास पुलिस ने शांतिपूर्ण तरीके से जा रहे लोगों को न केवल रोका बल्कि उन पर फायरिंग शुरू कर दी। इस घटना में कई लोग घायल भी हुए । इस घटना के बाद पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों को रोकने का काम पत्थलगड़ी द्वारा शुरू हुआ।

2.मोमेंटम झारखण्ड कार्यक्रम के दौरान पूरे झारखण्ड में बीजेपी सरकार के द्वारा गैर मजरुआ जमीन को चिन्हित कर लाखों एकड़ जमीन को भूमि बैंक में डाल दिया गया।

3.इस भूमि बैंक में सैकड़ों गांवों समेत सरना, ससनदिरी, खूंटकट्टी की जमीन को भी भूमि बैंक में डाल दिया गया।

4.विलेज नोट में प्रदत्त चंदा की राशि को मनमाने तरीके से बढ़ा दिया गया है।

5.ऑनलाइन चंदा जमा करने पर, उससे निकलने वाली रसीद में जमीन का रकबा कम दिखाया जा रहा है।

6.पेसा कानून 1996 की नियमावली झारखण्ड सरकार द्वारा आज तक नहीं बनाई गयी है और इसके ऊपर झारखण्ड पंचायती राज अधिनियम 2001 के प्रावधानों को बाध्यकारी कर दिया गया है जिसमें रुढ़ी एवं प्रथा को मान्यता नहीं प्रदान की गयी है जो स्वशासन व्यवस्था लागू करने की दिशा में एक रोड़ा है।

7.वनाधिकार कानून 2006 बनाकर इनके वनों पर अधिकार को कम कर दिया गया है।

8.एक-दो वर्ष पहले इस इलाके में स्वर्ण भण्डार का पता चला है। लोगों को आशंका है उन्हें अपनी जमीन से बेदखल होना पड़ेगा।

9.झारखण्ड के राज्यपाल और आदिवासी सलाहकार परिषद् ने किसी भी आदिवासी इलाके में अपने अधिकारों एवं दायित्वों का निर्वहन नहीं किया है ।

10.आज तक सामान्य क्षेत्रों के नियम और कानून ही अनुसूचित क्षेत्रों में लागू किये जाते रहे हैं।

जांच दल के साथ आदिवासी।

अन्य कारण:

1.सभी ग्रामीण योजनाओं में भ्रष्टाचार।

2.योजनाओं का अपूर्ण रह जाना।

3.पीने के पानी की अभी तक व्यवस्था नहीं।

4.पहुंच मार्ग का मुख्य मार्ग से संपर्क नहीं ।

5.इन गांवों में अभी तक बिजली नहीं पहुंच सकी ।

6.स्कूलों में फुल यूनिट शिक्षकों की कमी जिसके कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव।

7.उप स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर, नर्स और जीवन रक्षक दवाओं का अभाव।

8.आदिवासी विकास के लिए आवंटित राशियों का सामान्य मदों में उपयोग ।

9.स्थानीय सरकारी कार्यालयों में बाहरी एवं गैर आदिवासियों का दबदबा।

अफीम की खेती: 

भंडरा कुदाटोली और जिकीलता के लोगों ने बातचीत के क्रम में बताया कि उनके गांव में अफीम की खेती नहीं की गयी है। दूसरे गांव के बारे हम नहीं बता सकते हैं। अगर किसी गाँव में अफीम की खेती की गयी हो तो उसके लिए स्थानीय प्रशासन, पुलिस थाना, स्थानीय विधायक और सांसद और जिलाधिकारी जिम्मेदार हैं।  

सिफारिश:

1.स्थानीय पारंपरिक ग्रामसभाओं एवं प्रशासनिक उच्च अधिकारियों के बीच समय-समय पर जनसंवाद।

2.स्थानीय भाषा जानने वाले अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों, थाना प्रभारियों, शिक्षकों का पदस्थापन ।

3.पांचवी अनुसूची का अनुपालन ।

4.पारंपरिक स्वशासी व्यवस्था का अनुपालन ।

5.पेसा कानून की नियमावली जल्द से जल्द बनाई जाए ।

6.भू संरक्षण व वन कानूनों का ईमानदारीपूर्वक का पालन करना ।

7.भूमि बैंक में सम्मलित सभी सामुदायिक जमीन (गैर मजरुआ जमीन) का निरस्तीकरण।

8.पत्थलगड़ी मामले में जेल गए सभी लोगों की बेशर्त रिहाई और झूठे मुक़दमे की वापसी।

9.अफीम की खेती कराने वाले दलालों की पहचान एवं कार्रवाई।

10.आदिवासियों के विकास के लिए मिलने वाले बजट की राशि का ग्रामसभा के खातों में हस्तांतरण ।

11.ग्रामसभाओं द्वारा निर्मित ग्राम विकास योजना का अनुपालन किया जाए।

12.वर्तमान सरकार द्वारा निर्मित आदिवासी ग्राम विकास समिति को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए ।

13.आदिवासी इलाके में किये गए सभी एमओयू रद्द किये जाएं ।

भ्रमण दल के सदस्यों में सुनील मिंज (आदिवासी अधिकारों का राष्ट्रीय अभियान), जेरोम जेराल्ड कुजूर (केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति लातेहार गुमला), राकेश रोशन किड़ो (ग्राम स्वराज अभियान), दीपक बाड़ा (वीडियो वालंटियर), जेवियर कुजूर (झारखण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन), लीवंस मुंडू (झारखण्ड इंडीजिनस पीपल्स फोरम), वारलेस सुरीन (वीडियो वालंटियर), बसंती (वीडियो वालंटियर) जेवियर हमसाय (वीडियो वालंटियर)।  

(विशद कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल रांची में रहते हैं।)








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N s samrath :: - 05-07-2018
आदिवासियों को अपने संवैधानिक अधिकार की जानकारी हो गई है यह बात सरकार को पच नहीं रही है।

N s samrath :: - 05-07-2018
आदिवासियों को अपने संवैधानिक अधिकार की जानकारी हो गई है यह बात सरकार को पच नहीं रही है।