ग़ुलाम जोशी, तुम्हें कहना चाहिये हेलो बड़े ग़ुलाम मोदी!

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 21-04-2018


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वीना

अ....ग़ुलाम मोदी अगर मैं आपको बड़े ग़ुलाम कहूंगा तो आपकी तौहीन हो जाएगी। मतलब...वैसे आप बड़े हैं लेकिन ग़ुलाम छोटे हैं। बड़े ग़ुलाम तो हम जैसे नाचीज़ हैं। जिन्हें आपकी भी ग़ुलामी करनी पड़ती है।

अच्छा..! छोटे ग़ुलाम जोशी, ख़ुद को बड़ा ग़ुलाम कहकर आका की नज़रों में अपनी हैसियत बढ़ाना चाहते हो। ख़बरदार!! मैं तुम्हारी चिकनी-चुपड़ी झूठी कविताओं में नहीं आने वाला। तुम्हारा ग़ुलामी का बायोडाटा क्या बेचता है मेरे आगे? 

पिछले चार साल में देश का बच्चा-बच्चा मेरी ग़ुलामी की लिस्ट पढ़-पढ़ सुना रहा है। और फिर भी है कि ख़त्म होने नहीं आती। मैं हर रोज़ 20 घंटे की मेहनत ऐसे ही थोड़े करता हूं। आका उद्योगपितयों के हुज़ूर में अपने गु़लामी के कारनामों की लाइन लगा रखी है। 

माफ़ कीजिये बड़े ग़ुलाम मोदी, मैं तो बस ये कह... ख़ैर...जाने दीजिये। जिनकी डिग्री खो जाती है उनकी हालत यही होती है।

क्या बोला बे छोटे ग़ुलाम..!

जी...जी...कुछ नहीं, मैं सहमत हूं। आप बड़े ग़ुलाम, मैं छोटा ग़ुलाम! चलिये ग़ुलाम-ग़ुलाम खेलते हैं...

अच्छा बड़े ग़ुलाम, ये बताईये, कैसा लगा जब किसानों का कुछ हज़ारों का कर्ज़ा माफ़ करने की बजाय आकाओं का लाखों हज़ार करोड़ों का कर्ज़ बट्टे खाते में डालने का सुनहरा अवसर आपको मिला?

अरे! कैसा लगता है क्या? बड़े ग़ुलाम से ग़ुलाम नंबर एक बनने का मौक़ा कोई गंवाता है भला! मैंने झट से लपक लिया!! कुछ दिन-महीने-साल किसान और इंतज़ार कर लेंगे। कुछ और मर-खप जाएंगे तो क्या नुकसान? आका के मुंह से ‘‘वैल्डन ग़ुलाम’’ सुनने का सुख तुलना से परे है। उसके लिए कुछ भी...कुछ भी मतलब कुछ भी।

जी...जी...बड़े ग़ुलाम ये तो मैं जानता हूं। आप लाल किले से जनता को एक के बाद एक झूठ का हलवा खिला सकते हैं। जो नहीं है उसे दिखा सकते हैं। बड़े ‘‘नंबर वन’’ ग़ुलाम जी आपके दिमाग़ में उस स्टेशन पर चाय बेचने का आईडिया कैसे आया जो कि था ही नहीं?

देखिये, मैं इसे ऐसे नहीं देखता। मेरे लिए वो स्टेशन हमेशा से वहां था। दरअसल मैं हैरी पॉटर का बहुत बड़ा फैन हूं। और इसीलिए मैं वो स्टेशन देख पाया, उस पर चाय बेच पाया। जैसाकि आपने कहा जो स्टेशन मौजूद ही नहीं था। और हैरी पॉटर की ही तरह उस काल्पनिक स्टेशन से मैंने चुड़ैल-पिचाश वाले सारे किरदार हक़ीकत में लोगों की ज़िन्दगी में उतार दिए। वो भी देसी भगवे लिबास में। अब देखिये, ये कितनी बड़ी बात है! क्या आज़ादी के 70 सालों के इतिहास में कोई ऐसा कर पाया? 

जी बिल्कुल! दुनिया आपके इस हुनर को पहचान चुकी है अब। गुस्ताख़ी माफ बड़े ग़ुलाम जी, पर अब वो स्टेशन आपने सचमुच बनवा दिया है। कहीं ऐसा न हो जनता आपको वहां सचमुच चाय बेचते हुए देखने की ज़िद कर ले?

ख़ामोश छोटे ग़ुलाम! स्क्रिप्ट से बाहर मत जाओ। 

नहीं...वो बड़े ग़ुलाम... बस यूं ही ख़्याल आया...

ख़बरदार! फिर ऐसा ख़्याल लाए तो। जनता के इस ख़्याल को दबाने के लिए ही तो मैं तुम जैसे को लेकर यहां लंदन में नए ख़्याल फ़ेंक रहा हूं। ताकि 2014 की तरह 2019 में भी जनता मेरे ही ख़्यालों के बोझ से दबी रहे। अपनी हक़ीकत भूल जाए। समझे...

जी...जी समझा। अच्छा बड़े ग़ुलाम, अपने निकम्मेपन को हीरोगीरी में बदलने का हुनर कैसे पाया आपने? मसलन  - गुजरात 2002 में आपके मुख्यमंत्री रहते हुए और गुजरात में मौजूद होते हुए भी दंगाई आपकी नाक के नीचे अल्पसंख्यकों को मारते-काटते रहे, गर्भवती औरतों के पेट से बच्चा निकाल कर तलवार पर घुमाते रहे। छोटी-बड़ी हर उम्र की औरत का बलात्कार करते रहे। आम और ख़ास, बूढ़े-नौजवान को मार काटकर पेट्रोल-टायर डालकर जलाते रहे। और आप कुछ नहीं कर पाए! 

हालांकि आप कहते हैं आपने दंगा रोकने की पूरी कोशिश की। पर आप रत्तीभर भी उसमें सफल नहीं हुए। इसका मतलब आप बतौर मुख्मंत्री बुरी तरह फेल हुए!

ठीक वैसे ही कोई आज भी आप की बात नहीं मान रहा है। आप कहते हैं गाय के नाम पर हत्या मुझे बर्दाश्त नहीं। पर आपके संघी झंडे तले दलित-पिछड़े-मुस्लिम-आदिवासी गाय के नाम पर मारे जा रहे हैं। आप कह रहे हैं बेटियों का बलात्कार माफ़ नहीं करूंगा, फिर भी कठुआ-उन्नाव में तिरंगे का सहारा लेकर आठ साल की बच्ची-बेटी का बलात्कार हो रहा है। 

आप कहते हैं मैं ऊंच-नीच के भेदभाव के खिलाफ हूं। फिर भी दलितों को आपके गुजरात में सिर्फ इसलिए जान से मार दिया जाता है कि उसने घोड़ा ख़रीदा और उस पर बैठ गया। मतलब हर मोर्चे पर आप नाकाम, फिर भी आप महान!

अपराध-भ्रष्टाचार के आंकड़े भी बढ़ रहे हैं और गरीबों के भी। सीमा पर पहले से ज़्यादा जवान मर रहे हैं। पहले से ज़्यादा आंतकी हमले हो रहे हैं। फिर भी आप कहते हैं आपके 56 इंच के सीने से सब घबराते हैं! 

2 पैसे का सौदा आप 2 लाख में करते हैं और दावा कर रहे हैं देश का धन बचा रहे हैं। लुटेरे बैंक लूट कर यहां लंदन में अभी आपके आस-पास ही मज़े से घूम रहे हैं। और आप यहां बैठ कर बात बना रहे हैं कि आप देश को विकास की नई ऊंचाईयों पर ले जाने को बेताब हैं। कैसे? मतलब कैसे इतनी बेशर्मी से हीरो पंथी स्थापित कर लेते हैं आप? कैसे? इस टैलेंट के बारे में ज़रूर कुछ बताईये?

देखिये, मेरे इस टैलेंट को निखारने-संवारने का सारा श्रेय मैं अपने राजनीतिक गुरुओें को दूंगा। मुझसे पहले वो इस राह पर चले बाबरी मस्जिद को गिरा कर। किसी ने खुलेआम रथयात्रा निकाली। तलवार-त्रिशूल बांटे। खड़े होकर मस्जिद तुड़वाई। किसी ने जैकेट के बगल में हाथ डालकर मुस्करा-मुस्करा कर लोगों को मस्जिद तोड़ने को उकसाया। सारी योजना बनाई और जब अदालत पहुंचे तो दो साल के बच्चे की तरह मासूम बन गए। जैसे अभी ठीक से बोलना भी न सीखा हो। तोड़ने वाले अपने मन की कर गए। रोकने वाले तुड़वा गए।

फिर जब हमारे बाबरी मस्जिद तुड़वाने वाले एक गुरु ने जताया कि गुजरात 2002 उन्हें पसंद नहीं आया तो मैं समझ गया कि कैसे नौ सौ चूहे खाकर हज़ पर जाया जाता है। और बस... यूं ही मैं इस कला में पारंगत होता गया... और आज जहां हूं आप देख ही रहे हैं।

वाह! क्या बात है! अच्छा बड़े ग़ुलाम, आका की नौकरी बजाने की एवज में कानून-अदालत, संविधान, फ़ौज, अफ़सरान, आदि-आदि को अपनी जेब में लेकर घूमना कैसा लगता है? मसलन पूरा देश समझ चुका है कि जज लोया की हत्या हुई है। और किसने, क्यों करवाई है ये भी। पर सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीमों को कोई नहीं समझा पाया। 

वो दलित चंद्रशेखर आज़ाद रावण पुलिस वालों की गवाही पर देशद्रोही बना दिया गया। और नरोदा पाटिया नरसंहार मामले में बेटे, मां-बहन, बेटी खोने वाले चश्मदीद गवाहों की गवाही हाईकोर्ट ने नहीं मानी। जिन्होंने देखा था कि कोडनानी ने खुले आम हथियार बांटे, मार-माट करने वाले टोले बुलाये। 97 लोगों को मौत के घाट उतरवाने की दोषी करार दी गई कोडनानी आज बाइज़्ज़त बरी है! ग़रीब, पिछड़ों को शिक्षा बांटने वाला चंद्रशेखर अंदर। अपनी इस ताकत को कैसे महसूस कर रहे हैं, आप?

मुझे नहीं पता था एक कवि के भीतर पत्रकार भी छुपा है। क्या सवाल किया है! बहुत मज़ा आता है...बहुत...मैंने हाथ जोड़कर आकाओं से सारे देश की संपत्ति जल-जंगल-जमीन, मेहनतकश सबको उनके हवाले करने की एवज में ये मज़ा ही तो मांगा है। मैंने वायदा किया था कि मैं पुराने ग़ुलामों से कहीं ज़्यादा फास्ट आर्डर मानने वाला ग़ुलाम बन कर दिखाऊंगा। इसका ट्रेलर मैंने गुजरात में उन्हें दिखा भी दिया था। दौलतख़ोर आकाओं ने मुझ पर विश्वास किया और मैं मज़े में हूं। इतने मज़े में हूं कि अपना नाम तक भूलने लगा था। सूट पर लिखवाना पड़ा!

मेरे मुख्य आका के पापा ने एक मंत्र दिया था - ‘‘कर लो दुनिया मुट्ठी में।’’ मैंने इसे अपने लिए थोड़ा बदला है - ‘‘कर लो जनता मुट्ठी में’’ बस...इस विदेशी धरती से फिर शुरुआत कर रहा हूं जनता को मुट्ठी में करने की। 

क्या बात है! बड़े आका, अब मैं आपसे थोड़ी दूर हटकर सवाल पूछने जा रहा हूं। गोरखपुर अस्पताल में बच्चों की मौत के ज़िम्मेदार देशभक्त बने बैठे हैं। और जान बचाने वाला डॉक्टर कफ़ील सलाख़ों के पीछें? ये भी आप ही का जादू है या आपके मुख्यमंत्री की मुट्ठी भी मजबूत है?

अरे नहीं जी! देश के हर कोने में मेरी ही छाया है। ईश्वर की तरह मैं जहां प्रकट नहीं हूं वहां भी मौजूद हूं। देखों भई, सीधी सी बात है, हीरोपंती का ठेका जब इन दिनों अपन के पास है तो ये अल्पसंख्यक डॉक्टर-फॉक्टर क्यों अपनी नाक घुसेड़ रहे हैं। अब ग़लती करोगे तो सज़ा तो मिलेगी!

वाह! क्या बात है! क्या बात है! बड़े ग़ुलाम जी! कितनी आसानी से आप सबको निपटाने का हुनर रखते हैं। वाह! बेहद ढिठाई से आप देश की सारी धन-संपदा आकाओं के घर और विदेशी एकाउंटों में पहुंचा रहे हैं। और देश की जनता को तैयार कर रहे हैं कि वो रसोई के धुएं, शौचालय के सपने और बिजली-पानी, रोड-रेल के झूठे वायदों के नशे में वोटों से आपकी झोली भर दे।

सही समझे छोटे ग़ुलाम! आज मज़ा आ गया..! अब से कवि पत्रकारों को ही इंटरव्यू दिया करूंगा। ये थापर-वापर बेकार हैं। मूड ऑफ कर देते हैं।

बड़े ग़ुलाम, कवि पत्रकारों को नहीं मेरे जैसे छोटे ग़ुलाम कवि पत्रकारों को कहिये। ध्यान रहे, सिर्फ कवि पत्रकारों को बुलाएंगे तो उनमें कोई कैफ़ी आज़मी, अवतार सिंह पाश, धूमिल जैसा भी निकल सकता है!!

(वीना पत्रकार-व्यंग्यकार और फिल्मकार हैं)




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Himmat Singh :: - 04-22-2018
बहुत मारक व्यंग्य है. लेकिन इन निर्लज्जों को शरम कहाँ आने वाली.