बड़ा महीन है अखबार का मुलाजिम भी, खुद खबर हो के खबर दूसरों की लिखता है !

क़लमकार , , शुक्रवार , 01-02-2019


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मदन कोथुनियां

“खींचों न कमानों को न तलवार निकालो।जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो”- अकबर इलाहाबादी ने जब यह शेर लिखा तब भारत पर अंग्रेजों की हुकूमत थी और उनके सामने गुलाम जनता संसाधन विहीन थी। शायद यह शेर लिखते हुए उनके मन में अखबार की ताकत के प्रति कोई शंका नहीं रही होगी व क्रूर शासन से मुक्ति का रास्ता जागरूक जनता के रूप में ही महसूस हुआ होगा! नेपोलियन भी मानता था कि चार विरोधी अखबारों की मारक क्षमता के आगे हजारों बंदूकों की ताकत बेकार है। किसी भी देश या समाज की दशा का वर्तमान इतिहास जानना हो, तो वहां के किसी सामयिक अखबार को उठाकर पढ़ लीजिए, वह स्पष्ट कर देगा।

भारत में प्रथम समाचार पत्र जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 1780 ई. में “बंगाल गजट” नाम से प्रकाशित किया, किन्तु इसमें कम्पनी सरकार की आलोचना की गई थी, जिस कारण उसका प्रेस जब्त कर लिया गया।1818 ई. में ब्रिटिश व्यापारी “जेम्स सिल्क बर्किंघम” ने “कलकत्ता जनरल” का सम्पादन किया। बर्किंघम ही वह पहला प्रकाशक था, जिसने प्रेस को जनता के प्रतिबिम्ब के स्वरूप में प्रस्तुत किया व प्रेस का आधुनिक रूप उसी का दिया हुआ है।अभी देशभर में हजारों न्यूज़ चैनल, रेडियो, अखबार,पत्रिकाएं आदि हमारे बीच मौजूद है।

मीडिया जन सरोकार का मिशन होता है।आजादी के आंदोलन के समय मीडिया ने अपने मिशन को बखूबी अंजाम भी दिया मगर आज मीडिया मिशन से भटककर प्रोफेशन बन चुका है जहां टीआरपी की मंडी सजती है और किराए के कंठों से हाट बाजार वालों की तरह चिल्ला-चिल्लाकर खबरें बेची जा रही है।जनसाधारण का सकारात्मक दृष्टिकोण बनाने के सामाजिक उत्तरदायित्व से मीडिया भटकता नजर आ रहा है।

खबरों के अन्वेषण के स्थान पर उनका निर्माण किया जा रहा है। निर्माण में सत्यशोधन न होकर मात्र प्रहसन होता है और प्रहसन कभी प्रासंगिक नही होता। वो तो समाज को सत्य से भटकाता है और सत्य से भटका हुआ समाज कभी परम वैभव को प्राप्त नही होता।पहले निकलने वाले पत्रों के पीछे किसी व्यक्ति अथवा संस्था के कठिन प्रयास थे। और वर्तमान में निकलने वाले पत्रों के पीछे बड़े व्यवसायी की पूंजी और कोई सियासी पार्टी होती है। माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा था- ‘‘दुख है कि सारे प्रगतिवाद, क्रांतिवाद के न जाने किन-किन वादों के रहते हुए हमने अपनी इस महान कला को पूंजीपतियों के चरणों में अर्पित कर दिया है।”

भारत में मीडिया पूरी तरह पूंजीपतियों के हवाले हो चुका है। क्रोनी-कैपिटलिज्म का ऐसा गठजोड़ बन चुका है कि एकतरफ सियासी पार्टियों को चंदा देकर नीतियां अपने हिसाब से बनवाते हैं तो दूसरी तरफ मीडिया पर कब्जा करके जनता को भ्रमित किया जा रहा है। भारत में कारपोरेट मीडि‍या पूर्ण अंधभक्तिह‍ के साथ नव उदारवाद की हि‍मायत करता है,गरीबों को सब्सिडी दि‍ए जाने का वि‍रोध करता है,किसान कर्जमाफी को अर्थव्यवस्था के लिए घातक बताता है, सेज के बहाने कि‍सानों की जमीन लिए जाने का अंध समर्थन करता है। शिक्षा व चिकित्सा के निजीकरण की अंध हिमायत करता है। तमाम गरीब हितैषी योजनाओं को खराब बताता है। जन-कल्याण की योजनाओं को बदनाम करता है,उससे कारपोरेट मीडि‍या की गरीब वि‍रोधी छवि‍ सामने आ रही है।

आज पत्रकार कंठ व बुद्धि के किराए से अपनी आजीविका चलाने को मजबूर है। कभी अखबार मालिक के खिलाफ ही लिखने का हौसला रखने वाला पत्रकार जगत आज विविध भारती के फरमाइशी गीतों की तरह डिमांड पर खबरें बनाता और बेचता है।

             बड़ा महीन है अखबार का मुलाजिम भी,

             खुद खबर हो के, खबर दूसरों की लिखता है!

ऐसा नहीं है कि इस कड़वी सच्चाई पर किसी का ध्यान नहीं गया। मजीठिया आयोग से लेकर न जाने कितने आयोग आये और चले गए किंतु नहीं बदले तो अखबार के मुलाजिम के हालात। इन्हीं दुरूह हालातों में खबरनवीस अपने कार्य को अंजाम देते हुए जीवन से हाथ धो बैठते हैं।पत्रकारों की हत्या के मामले तो सुर्खियों में रहते हैं,मगर गुत्थियां अनसुलझी ही रह जाती हैं।पत्रकारों को सुरक्षा देने में भारत बांग्लादेश व पाकिस्तान से भी पीछे हांफ रहा है।वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम की सूची में भारत लोकतंत्र को शर्मसार करने वाले 136वें नंबर पर है।

सूचना सम्प्रेषण की गतिशीलता व प्रमाणिकता का संयुक्त उपक्रम पत्रकारिता कहलाता है। जन सरोकार युक्त व उत्तरदायित्व पूर्ण सूचना सम्प्रेषण की विभिन्न विधाओं अर्थात अखबार, टीवी, रेडियो, पत्रिकाओं आदि के समुच्चय को मीडिया कहा जाता है। लोकतांत्रिक देशों में सूचना सम्प्रेषण की स्वतंत्रता तत्कालीन सत्ता की मानवीय व लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति आस्था को मापने का पैमाना होता है।विचारों का सहज प्रवाह लोकतांत्रिक समाज के लिए उर्वरा शक्ति का काम करता है।तमाम सामाजिक परिवर्तनों में सूचना सम्प्रेषण मुख्य भूमिका निभाता है चाहे वो सकारात्मक परिवर्तन हो या नकारात्मक परिवर्तन हो।

आज के संदर्भ में भारतीय मीडिया खुद ही पूर्ण दिग्भ्रमित है।एक तरफ पूंजीवाद की जकड़न में फंसा हुआ है तो दूसरी तरफ जातिवादी दंश झेल रहा है।मीडिया पर एक वर्ग विशेष का कब्जा है जो जाति देखकर कलम उठाता है व जाति देखकर कलम रखता है।दिल्ली की निर्भया पर जन-आंदोलन खड़ा करने वाला मीडिया बिहार के अनाथाश्रम में 35बच्चियों के यौन शोषण व कत्ल पर खामोशी बरत लेता है।शोषितों/वंचितों को मिले आरक्षण को देश के विकास में अवरोधक मानता है व आर्थिक आधार पर सवर्णों को मिले आरक्षण को सामाजिक न्याय की तरफ मजबूत कदम बताता है!

भारत की बहुसंख्यक जनता रोटी,कपड़ा,मकान, शिक्षा,चिकित्सा,बिजली,पानी सरीखे बुनियादी मुद्दों पर संघर्ष कर रही है।मीडिया ने सामाजिक सरोकारों को भुलाते हुए एक प्रच्छन्न उद्योग का स्वरूप ग्रहण किया है, जिसमें समाचार उत्पाद बन गए हैं। अखवारों के रंगीन पन्नों में विचार-शून्यता साफ झलकती है। नव मीडिया में जहां फिल्मों, अपराध, स्कैंडल,लजीज व्यंजन और सेक्स संबंधित ऐसी तमाम सामग्री बहुतायत में परोसकर एक ऐसी काल्पनिक दुनिया का निर्माण किया जा रहा है जिसका अधिकतम जनता से  कोई सरोकार नहीं है।

मीडिया पहले जन-आंदोलन को गतिशीलता देते नजर आता था अब मीडिया जन-आंदोलनों का हत्यारा बन चुका है! पहले अखबार में खबर आ गई मतलब सूचना की प्रामाणिकता स्वत साबित हो जाती थी और अब आ गई मतलब टीआरपी के लिए सनसनी,खाली पन्ना भरने की कवायद,पेड न्यूज आदि होती है। हर जरूरी व प्रभावित करने वाले मुद्दे को दूसरे एंगल पर रखकर मज़लूम को ही ज़ालिम और ज़ालिम को जायज़ ठहराने का खेल सत्ता के इशारे पर दिन-रात मीडिया द्वारा खेला जा रहा है।आज आजादी के 70साल बाद देशद्रोह के प्रमाणपत्र मीडिया द्वारा बांटे जा रहे है।

                  कौम के गम में डिनर खाते हैं, हुक्काम के साथ!

                  रंज लीडर से बहुत हैं, मगर,आराम के साथ!!

 








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Umesh Chandola :: - 02-01-2019
2008 me Nagrik akhbaar ke pathako Ko LIU CBI ne daraya that ki ye Mao vicharo ka paper he Dekhe pudr.org / reports year wise / 16 February 2009/ Uttarakhand Me police Daman /page 19 and onwards..(. enagrik.com )Rs 100 per year by Post