साहित्यिक-सांस्कृतिक कर्म के साथ जन सरोकार के मुद्दों पर सड़क पर उतरने की ज़रूरत

सम्मेलन , नई दिल्ली, बुधवार , 11-04-2018


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अनुपम सिंह

नई दिल्ली। जन संस्कृति मंच, दिल्ली के तीसरे राज्य सम्मेलन के मौके पर “समाज परिवर्तन और वाम बहुजन सांस्कृतिक आन्दोलन” विषय पर विचारोत्तेजक परिचर्चा हुई। इस मौके पर संगठन का चुनाव भी हुआ जिसमें प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक को अध्यक्ष और राम नरेश राम को सचिव चुना गया। दो सत्रों में हुए इस सम्मेलन में संस्कृतिकर्म के साथ जन सरोकार से जुड़े हर मुद्दे पर सक्रिय हस्तक्षेप खासकर सड़क पर उतरने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया।  

 

  • जन संस्कृति मंच, दिल्ली इकाई का तीसरा राज्य सम्मलेन 
  • प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक अध्यक्ष और राम नरेश राम सचिव निर्वाचित
  • “समाज परिवर्तन और वाम बहुजन सांस्कृतिक आंदोलन” विषय पर परिचर्चा
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संगवारी थियेटर ग्रुप की प्रस्तुति। फोटो : जसम

 

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में शनिवार, 7 अप्रैल को हुए सम्मेलन का आरंभ ‘संगवारी थियेटर ग्रुप’ द्वारा “ये क्या हो रहा है, जो न होना था हमारे दौर में’’ गीत से हुआ।  सांगठनिक सत्र की शुरुआत करते हुए अशोक भौमिक ने जन संस्कृति मंच का परिचय दिया और कहा कि जसम केवल लेखको का संगठन नहीं है, यह सभी विधाओं का मंच है। यह केवल हिंदी भाषी राज्यों का  संगठन भी नहीं है।

राम नरेश राम ने की सांगठनिक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें जसम द्वारा किये गए हस्तक्षेप और काम का क्रमिक ब्योरा दिया गया। रिपोर्ट पर सघन बहस हुई, जिससे कई बातें निकल कर आईं। जैसे -जसम में युवाओं को अधिक नेतृत्व दिया जाय। संगठन को सांस्कृतिक हस्तक्षेप के साथ-साथ जनसरोकारी मुद्दों पर भी सड़क पर भी उतरना चाहिए। यह भी कि हमें अपरिचित दायरे में और असहमत लोगों के बीच जाकर भी संवाद स्थापित करना चाहिए। सदन में उपस्थित लगभग सभी लोगों ने बहस में हिस्सा लिया। 

 

सांस्कृतिक कर्म की चुनौतियां

सम्मेलन के इसी सत्र में विभिन्न कला माध्यमों में सांस्कृतिक कर्म की चुनौतियों पर अशोक भौमिक, आशुतोष कुमार, संजय जोशी और कपिल शर्मा ने बात रखी। आशुतोष कुमार ने कहा कि सांस्कृतिक हस्तक्षेप वर्चस्व के सौन्दर्यबोध के बरअक्स प्रतिरोध के सौंदर्यबोध का निर्माण करने से होता है। 

 

रंगकर्मी और संगवारी थियेटर ग्रुप के संयोजक कपिल शर्मा ने कहा कि आज का समय हमारे जैसे नाटककार के लिए जो जनसरोकारों को नाटक के माध्यम से उठाते हैं, चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। कहीं भी पुलिस द्वारा पकड़ लिए जाने और सामंती गुंडों द्वारा मारे जाने का ख़तरा बना रहता है। 

दस्तावेजी सिनेमा को लोगों के बीच एक अभियान की तरह दिखाने वाले 'प्रतिरोध का सिनेमा' के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने कहा, प्रबल आशंका है कि आने वाले समय में सिनेमा से संबंधित नियमों में बदलाव होगा और प्रोजेक्टर के जरिये सार्वजनिक स्थानों पर सिनेमा दिखाना कठिन हो जायेगा।

वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हमें यह देखना होगा कि अतिवादों के भीतर से लोकतंत्र को कैसे विकसित किया जाय।

चित्रकार अशोक भौमिक ने चित्रकला की चुनौतियों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि चित्रकला एक ठहरी हुआ विधा (कला) है। वह एक क्षण है कथा नहीं, लेकिन चित्रकला आज बाजार की विधा बन गई है।

 

सांगठनिक चुनाव

पहले सत्र के अंत में सांगठनिक निकाय का चुनाव हुआ जिसमें परिषद् और कार्यकारिणी चुनी गयी और अशोक भौमिक अध्यक्ष, आशुतोष कुमार, राधिका मेनन, कपिल शर्मा और कहानीकार योगेन्द्र आहूजा को उपाध्यक्ष चुना गया। राम नरेश राम सचिव और अनुपम सिंह, साक्षी सिंह तथा रघुनन्दन को सहसचिव चुना गया। 

 

इसके बाद नवनियुक्त सचिव राम नरेश राम ने संबोधित किया और कहा कि  नयी टीम के नेतृत्व में दिल्ली में सांस्कृतिक माहौल को बदलने की कोशिश की जाएगी।   

सम्मेलन के दूसरे सत्र की शुरुआत भी संगवारी थियेटर ग्रुप के द्वारा जनगीतों की सांगीतिक प्रस्तुति से हुई। इस सत्र में “समाज परिवर्तन और वाम बहुजन सांस्कृतिक आन्दोलन” विषय पर परिचर्चा हुई। 

वाम का नैरेटिव 

पहले वक्ता के रूप में लक्ष्मण यादव ने कहा कि धर्म सत्ता ने शास्त्रों के जरिये जो घोर अवैज्ञानिक, घोर अमानवीय था उसको पुष्ट किया। राजनीति के क्षेत्र में तो उनको चुनौती मिलती रही लेकिन सांस्कृतिक रूप से उनको कोई चुनौती नहीं मिली। वाम का जो नैरेटिव है वह तब पूरा होता है जब उसमें जाति और जेंडर का सवाल जुड़ता है।

वाम बहुजन एकता ज़रूरी

प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल ने रामविलास शर्मा के हवाले से कहा -‘जैसे जैसे वर्ग संघर्ष बढ़ेगा जाति की संरचना टूटती जायेगी’, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वाम बहुजन एकता ज़रूरी है लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। जिसका कारण इतिहास के अंधेरे में कहीं छुपा हुआ है। 

जाति आधार का हिस्सा है या अधिरचना का?

युवा आलोचक कवितेंद्र इंदु ने कहा कि –आज वामपंथी आंदोलन अवसाद में है, यह बात शिद्दत से महसूस की जा रही है कि नीतियों और रणनीतियों में बदलाव हो। आज के समय में संस्कृति का सवाल बहुत महत्वपूर्ण है अब सिर्फ मंदिर और मस्जिद का सवाल नहीं रह गया है,बात यहां तक पहुंच गयी है कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना है ,क्या पहनना है। आज जाति के सवाल पर सब बात कर रहे हैं, मार्क्सवादी भी और दक्षिणपंथी भी। जाति आधार का हिस्सा है कि अधिरचना का हिस्सा है इस बात को स्पष्ट किये जाने की ज़रूरत है? जाति की उत्पादन संबंधों में कोई हिस्सेदारी है कि नहीं है? जिस तरह जाति के सवाल को मार्क्सवादियों ने नहीं उठाया उसी तरह जेंडर के सवाल को भी उपेक्षित किया।

फैज़ के एक शे'र से उन्होंने अपनी बात को समाप्त किया –

दिल ना-उम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है 

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है 

 

‘एक ही तो हैं हमारे लक्ष्य’

जनवादी लेखक संघ के राज्य सचिव प्रेम तिवारी ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में अरुण कमल के कविता की कुछ पंक्तियों के माध्यम से अपनी बात रखी - 

एक ही तो हैं हमारे लक्ष्य,

एक ही तो है हमारी मुक्ति।

और कहा कि वाम और बहुजन के लक्ष्य एक ही हैं भले ही साधन अलग-अलग हों। 

नज़रिये का अंतर गतिविधियों से कम करना होगा

दलित लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हीरालाल राजस्थानी ने भारत के वर्तमान परिदृश्य में घट रही घटनाओं पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अम्बेडकर और मार्क्स दोनों शोषण और शोषित की बात करते हैं, बस दोनों के नज़रिये में अंतर है। हम वर्तमान दौर में इस अन्तर को अपनी गतिविधियों से कम करेंगे।  

उदार मूल्यों को बचाना ज़रूरी

शिक्षिका राधिका मेनन ने उच्च शिक्षा में हो रहे परिवर्तनों पर अपनी बात केन्द्रित रखी। उन्होंने कहा कि आज उदार विचार और नवउदार विचार में बहुत अंतर नहीं रह गया है। उदार मूल्यों को बचाना आज सबसे ज़रूरी हो गया है। 

वाम बहुजन आंदोलन को जोड़ने वाले सूत्र 

इस मौके पर जन सस्कृति मंच के राष्ट्रीय महासचिव मनोज सिंह ने कहा कि हम जैसा समाज बनाना चाहते हैं उसकी रूपरेखा बुद्ध, मार्क्स, अंबेडकर और भगत सिंह ने पहले ही रख दी है। वाम बहुजन आंदोलन को जोड़ने वाले सूत्र बहुत अधिक हैं और असहमति के सूत्र कम हैं। यह कोई चीन की दीवार नहीं है जिसे गिराया नहीं जा सकता है, बल्कि एक काल्पनिक और दार्शनिक रेखा है जिसे हम अपनी कार्रवाईयों से मिटा सकते हैं। इसलिए इस दिशा में हमें ठोस कार्यभार लेने की ज़रूरत है। डॉ. अंबेडकर ने संविधान को सौंपते हुए ये बात कही थी कि, भले हम एक लोकतांत्रिक देश की ओर आगे बढ़ रहे हैं लेकिन भारतीय समाज की ज़मीन गैरबराबरी की है, इसलिए संविधान कभी भी खतरे में पड़ सकता है। आज उस खतरे को हम अधिक देख पा रहे हैं। आज के फासीवादी समय में भाजपा और आरएसएस इसी सामाजिक विषमता और आर्थिक विषमता से ताकत लेकर और मजबूत हुए हैं। अंबेडकर का कहना था कि यह जो हिन्दू सामाजिक व्यवस्था है उसका विनाश किये बिना, जातियों का खात्मा किये बिना एक लोकतांत्रिक देश की नींव मजबूत नहीं हो सकती।

सम्मेलन के अंत में नवनिर्वाचित सचिव राम नरेश राम ने सभी का आभार व्यक्त किया।

(लेखिका एक कवि और संस्कृतिकर्मी हैं।)








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