जुगनू शारदेय:अपनी शर्तों पर जीने वाला एक अनूठा शख्स

शख़्सियत , , सोमवार , 07-01-2019


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प्रदीप सिंह

(कई विशिष्टताओं और विरोधाभासों को एक में समेटने वाले व्यक्ति का नाम जुगनू शारदेय है। घुमक्कड़ी और फक्कड़ी का जीवन जीने वाले जुगनू शारदेय ने अपनी युवावस्था में प्रण किया था कि शादी नहीं करूंगा औऱ निजी संपत्ति नहीं बनाऊंगा। इस व्रत का उन्होंने अक्षरश: पालन किया। जीविका के लिए अखबारों और फिल्मों में लेखन किया। ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से लेखन-पत्रकारिता शुरू करने के बाद वे कई पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे। ‘स्टार न्यूज’ और ‘दैनिक भास्कर’ के साथ ही कई पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया। जरुरत से अधिक पैसा इकट्ठा हुआ तो धूमने निकल पड़े। घुमक्कड़ी ने उनके मन में प्रकृति, जंगल और वन्य जीवों के प्रति गहरा लगाव पैदा किया। सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब "मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़" (रेनबो पब्लिशर्स, 2004) हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है। इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा। पत्रकारिता, फिल्म और राजनीति के तमाम दिग्गजों से उनका नजदीकी संबंध रहा। जेपी मूवमेंट में सक्रिय रहे जुगनू शारदेय समाजवादियों को नजदीक से देखा-परखा है तो जनसंघ (अब बीजेपी) और संघ के हाल-चाल से भी अनजान नहीं हैं। आज के दौर में मंत्री-संतरी और राजनेताओं से जितने संबंधों पर ढेर सारे पत्रकार-संपादक अपने दामन को दागदार बना लेते हैं, उससे अधिक घनिष्ठता में भी जुगनू शारदेय का दामन बेदाग रहा- संपादक)

अभी हाल ही में दिल्ली/नोएडा के “दो टकिया नौकरी” से फुर्सत लेकर वह अपने पैतृक घर औरंगाबाद (बिहार) वापस चले गए। फिलहाल वह अभी औरंगाबाद स्थित अपने पैतृक घर में छोटे भाई के परिवार के साथ रह रहे हैं। औरंगाबाद जाने से पहले जुगनू शारदेय से प्रदीप सिंह की बातचीत का प्रमुख अंश:  

अपने शुरुआती जीवन और घर-परिवार के बारे में कुछ बतायें। समाजवाद और समाजवादियों से परिचय कब और कैसे हुआ?

बिहार के औरंगाबाद में मेरा जन्म हुआ। तब औरंगाबाद जिला न होकर गया जिले का सब डिवीजन था।1973 में औरंगाबाद जिला बना। इसको अलग जिला बनाने में मेरा भी थोड़ा सा योगदान है। केदार पांडे तब बिहार के मुख्यमंत्री हुआ करते थे, हमने कहा कि औरंगाबाद को जिला क्यों नहीं बना देते, मुख्यमंत्री जी ने मान लिया। उस समय बिहार में कुल 17 जिले थे। ये अलग बात है कि उस समय प्रदेश में नए जिलों के गठन की मांग चल रही थी और राज्य सरकार के नए जिलों की सूची में औरंगाबाद का नाम भी शामिल था।

दस्तावेजों में मेरी पैदाइश 13 दिसंबर, 1949 दर्ज है। साल दो साल यह आगे-पीछे हो सकता है। मैं अपने माता-पिता की सबसे बड़ी संतान हूं। मुझसे छोटे तीन भाई और दो बहने हैं। औरंगाबाद में मेरे दादा “बनारसी साहु” के नाम से मशहूर थे। वह व्यापार के सिलसिले में बनारस से औरंगाबाद आए थे। पहले भी परिवार में व्यापार होता था अब भी वही दस्तूर है। थोड़ा बहुत पढ़-लिख कर परिवार के सदस्य पीढ़ी दर पीढ़ी व्यापार में लग जाते थे। लेकिन मेरी रुचि व्यापार में नहीं थी। औरंगाबाद से ही इंटर पास करने के बाद मैं 1967-68 में पटना चला गया। पटना आने के पहले से ही मैं समाजवाद और समाजवादियों से परिचित हो गया था।

उस दौर में समाजवादी काफी सक्रिय थे। मेरे एक रिश्तेदार डॉ. गया प्रसाद गुप्ता थे। पेशे से तो वह डॉक्टर थे लेकिन सोशलिस्ट पार्टी में बहुत सक्रिय थे। वह काफी मजेदार आदमी थे। उनका मेरे घर पर आना-जाना था। संभव है पहली बार उनके ही मुंह से “समाजवाद” सुना हो। उनका एक नारा था जो अभी तक हमें याद है- “गुप्ता-जोशी का है ध्यान, कब होगा जनता का मान।” इसमें गुप्ता तो वे स्वयं थे और जोशी (प्रसिद्ध समाजवादी नेता एसएम जोशी थे।) 

इंटर के आगे की पढ़ाई के लिए पटना आए थे या और कोई काम था ?

1967-68 में जब मैं पटना आया तो उस समय देश में एक आंदोलन चल रहा था। गुजरात के कच्छ का एक बड़ा भू-भाग केंद्र सरकार ने पाकिस्तान को दे दिया था। समाजवादी पूरे देश में हाय-तौबा मचाये हुए थे। हम लोग रेल से भुज गये। जनसंघ के लोग भी साथ थे। जनसंघियों के स्वागत में जगह-जगह तमाम लोग खाने-पीने की सामग्री लिए प्लेटफार्म पर खड़े रहते थे। हम लोग लपक कर उसे ले लेते थे। शैलेंद्र भट्टाचार्य और शिवानंद तिवारी के नेतृत्व में हम लोग वहां गए थे।

दिल्ली आकर हम लोगों ने नारा दिया कि “देश की जनता इंदिरा गांधी को गिरफ्तार” करेगी। इस नारे के साथ छात्रों-नौजवानों का हुजूम संसद भवन की तरफ बढ़ा। पुलिस ने हम लोगों को गिरफ्तार कर लिया।

उस समय “जन” पत्रिका का दफ्तर 7,गुरुद्वारा रकाबगंज में होता था, मैं वहां चला गया। वहीं पर अशोक सेकसरिया, बालकृष्ण गुप्ता आदि से मुलाकात हुई। उसी दौर में रवि राय, जार्ज फर्नांडिस, लाडली मोहन निगम, आरिफ बेग, कर्पूरी ठाकुर और मधु लिमये के सुपुत्र अनिरुद्ध लिमये (तब पोपट) से भी मुलाकात हुई। भुज-अहमदाबाद-दिल्ली होते हुए पटना लौटे। वहीं से हमारे घुमक्कड़ी जीवन की शुरुआत हुई। पटना में विधायक सच्चिदानंद और एमएलसी इंद्र कुमार के सरकारी आवास में रहता था। पटना से औरंगाबाद आता-जाता रहता था। औरंगाबाद में मैं जन पत्रिका को बेचता था। 1969 में मेरी मुलाकात अज्ञेय से हुई। अज्ञेय से बिहार के राजकाज के संबंध में कुछ बातचीत हुई। उसके बाद उन्होंने कहा कि बाहर जाकर विश्वभंर जी से कागज कलम लेकर जो हमसे बातचीत हुई, उसे लिख डालिये। हमने लिखकर दे दिया। वह दिनमान में प्रकाशित हुआ और मुझे साठ रुपये का चेक भी मिला। मुझे लगा कि यह तो अच्छा धंधा है। इसके बाद लेखन की शुरुआत हो गई।

अज्ञेय, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय और मनोहर श्याम जोशी जैसे संपादकों को आपने नजदीक से देखा औऱ उनके साथ काम करने का सौभाग्य मिला, तब की पत्रकारिता और संपादक, और आज की पत्रकारिता और संपादकों में क्या फर्क देखते हैं। आज किस अखबार और संपादक को उस मानक पर खरा पाते हैं ?

देखिए ! पत्रकारिता और राजनीति के लिए कोई आदर्श समय या आदर्श व्यक्ति कभी नहीं था। हम एक भ्रम में रहते हैं कि पहले सब सही था। पहले भी तमाम तरह की दिक्कतें थीं अब भी हैं। लेकिन एक उदाहरण से मैं आपको उस समय की पत्रकारिता का असर और संपादकों को मिलने वाली स्वतंत्रता को बताना चाहता हूं।

1972-73 के किसी महीने में सुबह-सुबह मुझे बिहार मुख्यमंत्री कार्यालय से फोन आया कि मुख्यमंत्री साहब आपसे मिलना चाहते हैं। उस समय केदार पांडे बिहार के मुख्यमंत्री थे। तब मैं दिनमान में नियमित लिखता था। जब मैं मुख्यमंत्री आवास पहुंचा तो वहां का नजारा अलग ही था। एक तरफ बेनेट कोलमैन एंड कंपनी यानी टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक साहू शांति प्रसाद जैन मुख्यमंत्री से मिलने के इंतजार में बैठे थे और मुख्यमंत्री के अर्दली से अंदर भेजने के लिए सिफारिश कर रहे थे। अर्दली उन्हें भभकी देते हुए कह रहा था कि, “रूकिये मुख्यमंत्री साहब अभी दिनमान के संवाददाता जुगनू शारदेय से मिलेंगे, उसके बाद आपको भेजता हूं।” फिलहाल मैं अंदर गया, मुख्यमंत्री ने कहा कि बाहर तुम्हारा मालिक बैठा है। डालमिया नगर में उनकी कंपनी पर दस करोड़ का बकाया है, माफ कर दूं कि रहने दूं। मैंने कहा कि इससे मेरा क्या मतलब। आप की इच्छा हो तो माफ करिये या न करिये। यह कह कर मैं बाहर आया और वहीं से दिनमान के संपादक रघुवीर सहाय को फोन पर सारी बात बतायी। सहाय ने कहा कोई बात नहीं। उस मामले में अंतत: क्या हुआ यह मुझे नहीं पता। लेकिन मैं पहले की तरह ही दिनमान में लिखता रहा। अब आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं कि आज पत्रकारों की क्या हालत और कितनी साख है। जहां तक “संपादक संस्था” की बात है तो हिंदी में आज संपादक संस्था खत्म हो गयी है। सुरेंद्र (स्व. एसपी सिंह) हिंदी का आखिरी संपादक था।  

आपका दिग्गज समाजवादियों से नजदीक का संबंध रहा है। पुराने समाजवादियों और आज के समाजवादियों में क्या फर्क देखते हैं ? 

पहली बात तो यह है कि आज समाजवाद और समाजवादी पार्टी के नाम पर जो लोग अपनी दुकान चला रहे हैं वे समाजवादी नहीं हैं। उस दौर में भी समाजवादी पार्टी में भी कुछ कम पचड़े नहीं थे।

समाजवादी एकता के लिए डॉ. राममनोहर लोहिया ने जेपी को एक पत्र लिखा था। पत्र में लोहिया ने लिखा कि, “नीति हमारी, नेतृत्व आपका।” अब आप बताइये ये कैसे संभव होगा? व्यवहार में तो यह देखा जाता है कि जिसका नेतृत्व होता है उसी की नीति भी चलती है। उस समय राजनारायण और जार्ज में अक्सर फर्जी सदस्यों को लेकर बहस होती थी। जार्ज का कहना था कि राजनारायण पार्टी में फर्जी सदस्य बनाते हैं। 1971 तक मेरा समाजवाद से मोहभंग हो गया था।

अब मैं इस निष्कर्श पर पहुंचा हूं कि समाजवाद एक संगठन के तौर पर नहीं चल सकता है। विचार के तौर पर चल सकता है। आज विचार और संगठन, दोनों रूपों में समाजवाद का नितांत अभाव है। 

फिल्मी दुनिया से कैसे जुड़े ? 

पटना में रहते हुए ही 1972-73 में मेरा परिचय फणीश्वर नाथ रेणु से हुआ। पटना के इंडिया काफी हाउस में मुलाकात हुई। रेणु भी समाजवादी थे। 1974 में बिहार आंदोलन शुरू हुआ। मैं भी उसमें सक्रिय था। गिरफ्तारी हुई और एक-डेढ़ महीने के लिए जेल गया। उस समय सतीश आनंद नुक्कड़ नाटक करते थे। नुक्कड़ नाटक में भाग लिया। उसी के आस-पास रेणु के मैला आंचल पर फिल्म बन रही थी। रेणु जी के साथ पहले कलकत्ता और फिर मुंबई गया। वहां पर रेणु ने केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट में व्याख्यान दिया।

इसी दौरान अचानक इमरजेंसी लग गयी। मैं डिप्रेशन में आ गया और पटना नहीं लौटा। रेणु जी ने अपने कुछ मित्रों से परिचय करा दिया और फिर मैं मुंबई में ही रूक गया। इसके बाद बीआर इशारा साहब का असिस्टेंट हो गया। 1976-79 तक उनका असिस्टेंट रहा। मैं थर्ड असिस्टेंट था। उस दौरान फिल्मी खबरों की एजेंसी- शाशा कंपनी खोली। मुंबई में रहते हुए धर्मयुग के संपादक डॉ. धर्मवीर भारती से घनिष्ठता हुई। धर्मयुग में लिखकर देश भर में नाम कमाया। दिनमान में अज्ञेय और रघुवीर सहाय ने खूब लिखवाया। साप्ताहिक हिंदुस्तान में मनोहर श्याम जोशी ने लिखवाया। एक तरह से उस समय के दिग्गज संपादकों, साहित्यकारों और पत्रकारों से पत्रकारिता को समझने का अवसर मिला।

लेकिन 1978 आते-आते मेरा वाइल्ड लाइफ की तरफ झुकाव बढ़ गया। और मैं देश भर के जंगलों में जाकर प्रकृति और वन्य जीवों को देखने-समझने लगा। 

आप नीतीश कुमार के घनिष्ठ रहे, उनके कृषि, रेल और मुख्यमंत्री रहने के दौरान आप उनके साथ रहे। ऐसा क्या हो गया कि आपने उनका साथ छोड़ दिया। मतभेद की वजह क्या थी ?

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मेरा पुराना संबंध है। उन्होंने मुझे वाइल्ड लाइफ कमेटी का मेंबर सेक्रेटरी बनाया था। उनसे कभी कोई मतभेद नहीं रहा। मैं अपना काम कर रहा हूं। ये सिर्फ कयास है कि हमारे और उनके बीच मतभेद हो गया और मैंने उनका साथ छोड़ दिया।  

 








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