स्वामित्व नहीं पहले बाबरी मस्जिद विध्वंस का मुकदमा सुने सुप्रीम कोर्टः न्यायमूर्ति लिबरहान

धर्म-सियासत , नई दिल्ली , शनिवार , 02-12-2017


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट 5 दिसंबर से राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद मुद्दे की सुनवाई करने जा रहा है। सर्वोच्च अदालत विवादित जमीन के स्वामित्व को लेकर सुनवाई करेगी। ऐसा लगता है कि इस मामले में बाबरी मस्जिद विध्वंस का कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है। बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच करने वाले न्यायमूर्ति मनमोहन सिंह लिबरहान ने इस पर एतराज जाहिर किया है। उनका कहना है कि “सर्वोच्च न्यायालय को स्वामित्व मामले के पहले बाबरी मस्जिद विध्वंस का मुकदमा सुनना चाहिए था।’’ साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘बाबरी मस्जिद का विध्वंस ‘‘सावधानीपूर्वक नियोजित’’ तरीके से किया गया था। 

न्यायमूर्ति लिबरहान की यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के 5 दिसंबर से अंतिम सुनवाई शुरू होने से पहले आई है। इंडियन एक्सप्रेस अखबार में छपी खबर के मुताबिक न्यायमूर्ति लिबरहान ने सुप्रीम कोर्ट के इस रवैये पर तंज कसा है।  उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच रिपोर्ट जून 2009 में सौंपी थी।   

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए लिबरहान ने कहा, ‘‘सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या मामले के स्वामित्व संबंधी मामले की दिन-प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई करने से इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2010 निर्णय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। ऐसा करने का क्या मतलब है? यदि यह निर्णय लिया गया कि यह वक्फ संपत्ति है, तो एक तरफ यह स्थापित होता है कि लोग विध्वंस के दोषी हैं। और यदि हिन्दू पक्ष इसे प्राप्त करते हैं, तो अपनी संपत्ति को पुनः प्राप्त करने के लिए विध्वंस का कार्य ‘‘उचित’’ कैसे ठहराया जा सकता है?  लिहाजा उनका कहना था कि सबसे पहले बाबरी मस्जिद के विध्वंस मामले की सुनवाई होनी चाहिए। इसमें कुछ सप्ताह या कुछ महीने लग सकते हैं।  

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले का मुकदमा लखनऊ में चल रहा है। जिसमें लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और अन्य लोगों के खिलाफ आपराधिक साजिश रचने का केस दर्ज है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट ने मुकदमे पर फैसला करने के बजाय तीनों में जमीन का विभाजन कर दिया। उन्होंने कहा, ‘‘इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला जवाब नहीं है। संपत्ति का मालिक कौन है इसका फैसला करना था और उन्होंने जाकर जमीन का विभाजन कर दिया।’’

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि को मुख्य देवता रामलला, सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े के बीच विभाजित किया था।

लिबरहान का कहना है कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था, सत्तारूढ़ दल और विपक्ष दोनों परिस्थितियों के प्रति उदासीन हैं, जिसके तहत मस्जिद को दरकिनार कर दिया गया। कोई भी राजनीतिक दल आज कुछ नहीं करना चाहता है। वास्तव में ये भी महसूस नहीं करते हैं कि उन्हें बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर कुछ करना चाहिए। वे केवल अपने तरीके से तात्कालिक लाभ चाहते हैं। वर्तमान राजनीतिक वातावरण में, तथाकथित धर्मनिरपेक्ष समाज की कल्पना करने का दार्शनिक विचार भी नहीं है, यह सिर्फ नारेबाजी तक ही सीमित है।

उन्होंने कहा कि मुसलमानों का न्यायिक व्यवस्था में फिर से विश्वास स्थापित होना बहुत जरूरी है। समस्या ये है कि यहां ऐसे सिविल सोसाइटी संगठनों का बहुत अभाव है जो इस मामले में खुद को शामिल करें।

 






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