कबीर के मन की बात:“एक ही बार परखिये ना वा बारम्बार”

आड़ा-तिरछा , , सोमवार , 02-07-2018


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वीना

एक देशद्रोही पत्रकार को एक चैनल पर विकास की दौड़ में सरपट दौड़ती मोदी भक्त जनता की स्पीड पर ब्रेक लगाने की कोशिश करते देखा। जनाब बता रहे थे कि उत्तर प्रदेश के पच्चीसा गांव में 200 बच्चों ने स्कूल का मुंह तक नहीं देखा। पच्चीसा गांव के बच्चे जानते ही नहीं कि स्कूल किस बला का नाम है। वो कैसा है, वहां होता क्या है! साथ ही साथ इस देशद्रोही ने ये भी उगल दिया कि इस गांव में बिजली भी नहीं है। 

और हिम्मत तो देखो इसकी कि उसी दिन ये सब अला-बला गा-बजा रहा है जिस दिन सबके, सब दुख हरता, विश्व प्रिय प्रधानमंत्री मोदी उसी उत्तर प्रदेश में गला फाड़-फाड़ चिल्लाकर आए हैं कि उनकी सरकार ने सिर्फ चार साल में देश के सारे गांवों का अंधियारा दूर कर दिया है। मोदी ने चुटकी बजायी और 18वीं सदी के अंधेरे से निकल कर सभी गांव 21वीं सदी के मोदी प्रायोजित उजियारे से चमचमा गए।

अब जहां तक बात है इस पच्चीसा गांव में बिजली की तो अठारहवीं सदी के घुप्प अंधेरे से जब अचानक चमत्कारी रोशनी टकराती है तो ज़रूरी थोड़े ही है कि सबकी आंखें इस चमत्कार को झेल जाएं। बहुत से लोगों की आंखें चैंधिया जाती हैं। बहुत से अंधे भी हो सकते हैं। मुमकिन है पच्चीसा गांव के सभी परिवार अंधे हो गए हों। इसलिए उन्हें बिजली की जगह अब भी अंधेरा ही नज़र आता है। अब साहेब ने तो भलाई के लिए बिजली दी है। कुछ और हो जाए तो इसमें उनका क्या कुसूर!

रही बात स्कूल की। ये बड़बोला देशद्रोही पत्रकार… अगर इसमें ज़रा भी देशभक्ति होती तो ये अलापने की जगह कि 200 बच्चों के भविष्य की चिंता किसी को नहीं है ये भी तो कह सकता था कि स्कूल नहीं तो क्या हुआ, आज हमारे प्रधानमंत्री कबीर अकादमी को 26 करोड़ देने का वादा करके आए हैं। अब अनपढ़ संत कबीर की वाणी देश के कोने-कोने, घर-घर पहुंचेगी। ज़ाहिर है पच्चीसा गांव भी जाएगी।

जैसाकि सब जानते हैं, दुनिया में अपनी अक्ल का लोहा मनवाने वाले संत कबीर भी अनपढ़ थे। उस समय कितने कम पढ़े-लिखे लोग होंगे, फिर भी उन्होंने अपनी वाणी लिखवाई भी और छपवाई भी। इन 200 बच्चों और इन जैसे बहुतों को प्रधानमंत्री कबीर बनने का मौक़ा देने पहुंचे हैं कि नहीं। कबीर बनने के लिए स्कूल की क्या ज़रूरत।

चुनाव होने के थोड़ा पहले और चार साल के बाद पहुंचे तो क्या हुआ?  गए तो सही। मनमोहन सिंह से तो इतना भी न हुआ। अब राहुल आकर वो टोपी पहन ले जिसे मोदी-योगी ठुकरा आए हैं तो भी होगी तो वो नकल ही ना। 

इस पत्रकार को ‘‘विकास की थोड़ी भी परवाह होती तो कहता - ‘‘अनपढ़ हुआ तो क्या हुआ, तू बनेगा संत कबीर, इक दिन तेरे नाम पर 26 करोड़ का चेक काटने आएगा एक फेंकू करोड़पति फ़कीर।’’

वैसे भी इस देश के पढ़े-लिखे हैं किस काबिल? जिस जनता के विकास को साहब गोदी में लाड लड़ाते लाए थे उसे साहब ने अडानी-अंबानी की तरफ उछाल दिया! रह गए देखते सब। किसी में है हिम्मत जो साहब के कान ऐंठ दे या अंबानी के एंटीलिया के शीशे तोड़ कर विकास को आज़ाद करवा लाए।

वैसे 2019 के चुनाव तक साहब कोई न कोई विकास जनता को भी थमा ही देंगे। विकास वाला विकास नहीं तो अनपढ़ कबीर का हरि विकास ही सही। कौन भूल सकता है उन ऐतिहासिक पलों का सीधा प्रसारण। जब साहब ने संत कबीर से कबीर गुफा में गुप्त गुफ्तगू फ़रमाई और किसी को भनक भी न लगी कि कब साहब ने कबीर के विकास के साथ-साथ उसके हरि को भी धर दबोचा और बाहर आकर अपने कंधों से विकास  और  हरि  का बोझ उतार कर जनता के सामने ला पटका। 

मैं सोच रही हूं अगर कबीर को मोदी की चादर से मॅाब लिंचिंग की बू आने लगे। कोई 2002 की भटकती रूह (अगर रूह होती है तो) कबीर के कान में साहब की करतूत फूंक जाए और कबीर, भाषण देते मोदी की आवाज़ में अपनी वाणी बर्दाश्त न कर सकने की सूरत में मोदी से रूबरू हो जाएं तो शायद उनका पहला वाक्य कुछ ऐसा होगा -  ‘‘तू है तो हट्टा-कट्टा रे! दमे के मरीज की तरह क्यों मेरे दोहे का दम निकाल रहा है?’’ फिर मोदी को जांचते-परखते हुए कुछ यूं सलाह दे रहे हैं - ‘‘मैंने सुना है आजकल तू बामणों की संगत में इंसान को इंसान नहीं समझ रहा है! सुन, इन बामणों ने जैसे मेरा मर्डर करवा दिया था और लाश गायब करवाकर चादर के नीचे फूल सजाकर जग में फैला दिया था कि मैं महान आत्मा था, शरीर समेत स्वर्ग सिधार गया। वैसे ही तेरा स्वर्ग में वास का वीज़ा कब लगा देंगे तुझे पता भी नहीं चलेगा... समझा। इसलिए कह रहा हूं सुधर जा। 

और ये जो तू ग़रीब के कच्छे-लंगोट खोल-फाड़ कर बनियों के सिर पे तरक़्क़ी की पगड़ी बांध रहा है ना, एक दिन इस पगड़ी से तेरा गला नाप लेंगे ये। वक़्त रहते संभल जा।’’ और फिर कबीर मुस्कराते हुए ख़ुद से ये कहते हुए आगे बढ़ जाते हैं - ‘‘कुत्ते की पूंछ कभी सीधी हुई है!’’

और...साहब ने जाते हुए कबीर से गर्दन झटकते हुए मन में कहा - ‘‘अरे जा... आम चूसकर जेब में नहीं रखा जाता।’’ और तभी कबीर मुड़ते हैं, जैसे उन्होंने मोदी के मन की बात पकड़ ली है। वो मुड़े और मुस्कराकर बोले - ‘‘मैं भी यही कह रहा था!’’  कहते हुए कबीर आगे बढ़ गए और कबीर के मगहर की मोदी सभा में चारों दिशाओं से बार-बार ये पंक्तियां गूंजने लगीं -

एक ही बार परखिये ना वा बारम्बार।

बालू तो हू किरकिरी जो छानै सौ बार।।

(वीना पत्रकार, व्यंग्यकार और फ़िल्मकार हैं)

 








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