पुरानी सामाजिक-सांस्‍कृतिक विसंगतियों की कमर तोड़ेगा एंटी ट्रैफिकिंग बिल

बदलाव , , बृहस्पतिवार , 02-08-2018


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पंकज चौधरी

नई दिल्ली। लोकसभा ने ह्यूमन ट्रैफिकिंग (मानव तस्करी रोकथाम, संरक्षण और पुनर्वास ) विधेयक 2018 को 26 जुलाई को पास कर दिया है। और अब इसका राज्य सभा से पास होना शेष है। राज्य सभा से भी यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो ह्यूमन ट्रैफिकिंग (मानव तस्करी) जैसे संगठित अपराध पर प्रभावी रोक के साथ-साथ अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को यह एक हथियार साबित होगा। यह वही विधेयक है जिसको सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर तैयार किया गया है और जिसकी नोबेल विजेता कैलाश सत्यार्थी समेत अनेक मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता दशकों से मांग कर रहे थे। 

अभी तक हमारे देश में ट्रैफिकिंग को सिर्फ चकलाघरों के नाम पर होने वाली खरीद-फरोख्त तक ही सीमित माना जाता रहा था। लेकिन सत्यार्थी ने ट्रैफिकिंग को व्यापकता में देखने और उसे संगठित अपराध के रूप में व्याख्यायित करने का जो प्रयास किया है उसका ही परिणाम है कि अब जबरिया मजदूरी, गुलामी, यौन कर्म के लिए खरीद-फरोख्त किए जाने वाले बच्चों को ट्रैफिकिंग का हिस्सा मानते हुए उसे परिभाषा में शामिल किया गया है। एग्रीवेटेड फॉर्म ऑफ ट्रैफिकिंग के रूप में इस कानून पर विस्तार  से बात की गई है और इसके लिए सजा का प्रावधान किया गया है। 

कैलाश सत्यार्थी लंबे समय से सड़क से लेकर अदालत तक इसके लिए संघर्ष करते रहे हैं। पिछले साल 12 लाख लोगों के साथ ट्रैफिकिंग और बच्चों के यौन शोषण के खिलाफ सख्त कानून बनाने और इस बारे में लोगों को जागरुक करने के लिए उन्होंने देशव्यापी “भारत यात्रा” का आयोजन किया था। यह यात्रा 11 हजार किलोमीटर की दूरी तय कर 23 राज्यों से गुजरी थी। उन्होंने  सन् 2007 में एंटी ट्रैफिकिंग दक्षिण एशियाई यात्रा का और 2011 में असम में एंटी ट्रैफिकिंग यात्रा का भी आयोजन किया था। सुप्रीम कोर्ट में दायर ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ की एक याचिका पर सन् 2011 में पहली बार भारत में ट्रैफिकिंग को परिभाषित किया गया था।

गौरतलब है कि ट्रैफिकिंग ऑफ पर्सन्स का अर्थ होता है,मनुष्य  की गैर कानूनी खरीद-फरोख्त करके उसका शोषण। भारत में सबसे अधिक शोषण बच्चों एवं महिलाओं का होता है,जहां बच्चों के मामले में मां-बाप को अच्छी मजदूरी का प्रलोभन देकर उनको गांव से शहरों में लाया जाता है और फिर उनका शोषण बदस्तूर जारी रहता है। उनका शोषण इसलिए भी सबसे ज्यादा होता है क्योंकि वे विरोध नहीं कर सकते। ऐसे बच्चे जगह-जगह काम करते हुए दिख जाएंगे, जैसे घरों में, होटल और ढ़ाबों में, बड़े-बड़े फार्म में, कारखानों में, चाय की दुकानों पर आदि।इसके अलावा घरेलू नौकरी-नौकरानी के रूप में बेचे गए बच्चों के यौन शोषण की घटनाएं भी बड़े पैमाने पर सामने आई हैं।

संसद में खुद सरकार ने बताया है कि देश में 2016 में पिछले वर्षों की तुलना में बच्चों की ट्रैफिकिंग में 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने संसद को बताया कि एक ओर जहां 2015 में 15,448 लोगों की ट्रैफिकिंग हुई थी, वहीं यह आंकड़ा 2016 में बढ़कर 19, 223 हो गया। यहां हर 8 मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है और हर 1 घंटे पर 1बच्चे  की ट्रैफिकिंग कर ली जाती है। ट्रैफिकिंग का धंधा भारत सहित सम्पूर्ण दक्षिण एशियाई देशों में सबसे ज्यादा फल-फूल रहा है और इसके पीड़ितों की दशा अत्यंत सोचनीय है। 

ट्रैफिकिंग के खिलाफ पेश  विधेयक को जब अमल में लाया जाएगा, तो इससे अपराधियों को सजा देने के साथ-साथ पीडि़तों को मुआवजा और पुनर्वास की सुविधाएं भी मिलेंगी। इस प्रस्तावित कानून में पुनर्वास को अधिकारमूलक बनाया गया है, जोकि भारत में पहली बार होगा। इससे पीडि़तों का एक ओर जहां सामाजिक और मनोवै‍ज्ञानिक उपचार संभव होगा, वहीं दूसरी ओर उनको आर्थिक मदद भी मिलेगी।

इसके लिए एक पुनर्वास कोष भी बनाया जाएगा और जिससे यह कानून अधिक प्रभावी हो जाएगा। इस कोष के लिए तत्काल 10 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिसे बाद में बढ़ा दिया जाएगा। कोष का गठन इसलिए किया गया है ताकि धन का आवंटन सुनिश्चित हो सके। ट्रैफिकिंग की रोकथाम, पीडि़तों की सुरक्षा एवं पुनर्वास के लिए कानून का त्रिस्तरीय ढांचा प्रस्तावित है,जो राष्‍ट्रीय, राज्य  एवं जिला स्तरीय होगा।1 महीने के अंदर इसके तहत पीड़ितों को अंतरिम राहत देने की बात है जबकि 2 महीने के अंदर पूरी राहत। 

दूसरी और ट्रैफिकिंग जैसे संगठित आर्थिक अपराध को रोकने के लिए हरेक जिले में विशेष अदालत का गठन किया जाएगा और एक निश्चित अवधि में इस पर सुनवाई करते हुए ट्रैफिकर्स के लिए सख्त सजा का प्रावधान करेगा। ट्रैफिकिंग के दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को सश्रम कारावास और कम से कम 1 लाख रुपये का जुर्माना भरना होगा। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रैफिकर्स के गठजोड़ को तोड़ने के लिए उनकी संपत्ति की कुर्की-जब्ती होगी। उनके बैंक खातों को भी जब्‍त किया जाएगा। यह कानून संगठित अपराध को निष्‍प्रभावी बनाने के लिए अंतर-राज्यीय और अंतरराष्‍ट्रीय सहयोग की जरूरत पर भी बल देता है और सीमा पार से होने वाले आर्थिक, राजनीतिक और आपराधिक गठजोड़ को खत्म करेगा। 

प्रस्तावित  विधेयक से जुड़ी एक याचिका में सवाल उठाया गया था कि कानून बन जाने की स्थिति में अपनी मर्जी से सेक्स ट्रेड में शामिल वयस्कों का क्या होगा? इस स्थिति में उन्हें जबरन काम से हटाए जाने की आशंका बनती है। इस बाबत अभियान चलाने वालों की स्पष्ट राय है कि इस कानून के क्रियान्वयन से सिर्फ ट्रैफिकिंग पीड़ित लोगों को बाहर निकाला जाएगा। जो सेक्स  वर्कर अपनी मर्जी से शामिल हैं वे इस कानून के प्रावधानों से बाहर के विषय होंगे। सरकार को उनके हितों की रक्षा का दायित्व भी लेना होगा। सरकार ‘बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ’, ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा बुलंद करती है। उसी भाव के तहत उसे पीड़ित बच्चों और महिलाओं की समस्या का समाधान करना होगा और इस संभावित कानून को सख्ती से लागू करना होगा।     

विधेयक में पीडि़तों, गवाहों और शिकायतकर्ताओं की पहचान को हर स्तर पर गुप्त रखते हुए उनकी सुरक्षा का प्रावधान किया गया है। यदि पीड़ित की पहचान का किसी भी न्यूज एजेंसी, समाचार पत्र या किसी अन्य माध्यम में खुलासा होता है तो इसे एक आपराधिक कृत्य मानते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का प्रावधान है। यदि अदालत पीड़ित के सर्वोतम हित में पहचान को उजागर करना चाहती है तो वह अदालत को लिखित में बताना होगा कि इसकी आवश्यकता क्‍यों है औरयह कैसे बच्‍चों के हित में है। इस विधेयक के अनुसार ट्रायल की प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित किया जाएगा की पीडि़त का सामना अभियुक्त से किसी भी हाल में नहीं हो सके।

अभी तक यही होता आ रहा था कि प्रभावी संस्थाओं, प्रक्रियाओं और अधिकारियों के अभाव में ट्रैफिकिंग के शिकार बच्चों को मुक्त कराने में दुश्वारियां पेश आती थीं। लेकिन नए कानून में इस कमी की ओर पर्याप्त ध्यान  दिया गया है और इसके पर्याप्त समाधान भी पेश किए गए हैं।

नोबेल विजेता कैलाश सत्यार्थी लगातार देश के राजनेताओं से अपील कर रहे हैं कि ‘’संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसे कुछ ही अवसर आते हैं, जब सदियों पुराने सामाजिक-सांस्कृतिक विसंगतियों से पनपे अपराधों को रोकने के लिए प्रभावी कानून पारित किए जाते हैं। संसद के इस मानसून सत्र में ऐसा ही अवसर आया है, जिसे लोकसभा ने पास कर दिया है और अब राज्य सभा को इस पर मुहर लगा देनी है।‘’

नए कानून के राज्य सभा से भी पारित हो जाने और उसके लागू हो जाने से सामाजिक न्याय  के लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। ट्रैफिकिंग के शिकार समाज के कमजोर वर्गों के बच्चे ही होते हैं इसीलिए सामाजिक न्याय का नारा बुलंद करने वाली पार्टियों के नेताओं को चाहिए कि वे इसका बढ़-चढ़ कर समर्थन करें। दूसरी ओर इस संगठित अपराध की रोकथाम के लिए यदि देर से ही सही, एक समग्र और व्यापक कानून पारित होने जा रहा हो, तो उसमें अड़चन डालने की बजाय उसका समर्थन करना चाहिए। इस बात को हमें नहीं भूलना चाहिए कि कई विकसित देशों में ट्रैफिकिंग को रोकने के लिए बहुत ही प्रभावी कानून हैं। और इस दिशा में अगर हमारा देश भी आगे बढ़ रहा है और उसके लिए वर्षों से शोध करते हुए कानूनी लड़ाई लड़ रहा है तो उसको जाया नहीं होने देना चाहिए। नए और स्‍मार्ट इंडिया का सपना तब तक साकार नहीं होगा जब तक ट्रैफिकिंग जैसे अपराध की कमर नहीं तोड़ दी जाए।








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