हल करने से ज्यादा सवाल खड़े करती है राज़ी

सिनेमा , , सोमवार , 21-05-2018


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दीपांकर यादव

काफी कुछ कहा जा चुका है फिल्म के बावस्ता। मैं भी कुछ जुरअत करता हूं। अव्वल तो कोई मुगालता मत पालिए। फिल्म को प्रोड्यूस किया है धर्मा प्रोडकशन्स और जंगली पिक्चर्स ने। विभाजन की विभीषिका, युद्ध की त्रासदी, पहचान का संकट, रिश्तों की क्षणभंगुरता, और सियासी शह-मात फिल्म के मुख्य मज़मून हैं। साथ ही फिल्म जासूस की ज़िंदगी की नियति, विसंगति और विद्रूपता के उन तमाम पहलुओं से तआर्रुफ़ करवाती है जो उनके महिमामंडन में दब-छिप जाते हैं। और यह भी कि प्रयोजन पूरा हो जाने के बाद जासूस उनके लिए भी असुरक्षा की वजह और रिसता हुआ नासूर बन जाता है जिनके लिए उसने अपनी सारी निजी ख्वाहिशें, ख़्वाब, खुशियां और रिश्ते दफ्न कर डाले थे।

मिशन खतम होते ही मुख़बिर का अस्तित्व मात्र सत्ता प्रतिष्ठान के लिए डायनामाइट बन जाता है क्योंकि उसके सीने में सत्ता के अवैध, अनैतिक और अमानवीय तौर तरीकों के राज़ जज्ब होते हैं, वो भी सिलसिलेवार सुबूत और शिनाख्त सहित। इसीलिए ऑपरेशन के बाद मुख़बिर का ‘बंदोबस्त’ जरूरी हो जाता है।

जासूस मिशन में इस्तेमाल किए जाने वाला सिर्फ एक यंत्र होता है। एक मंसूबे को पूरा करने का हथियार भर। एक दफा मिशन में शामिल होने के लिए ‘राज़ी’ हो जाने के बाद उसकी गैरत, गरिमा, मर्ज़ी, निजता, यहां तक कि कोई अपना निर्बाध वजूद तक नही बचता।

युद्ध की भयावहता तो हर दृश्य में लरजती ही रहती है। जंग रिश्तों को बर्बाद करती है, वर्गों को विभाजित करती है, और समूचे समाज की सामूहिक चेतना को भ्रष्ट करती है। दांव पर रहता है सिर्फ सियासी हासिल।

सहमत (आलिया) की ट्रेनिंग के दौरान खालिद मीर (जयदीप) उसे समझाता है कि अगर उसे लगे कि उसका राज़ फ़ाश हो रहा है तो समझे कि राज़ फ़ाश हो चुका है।

सहमत का पति इक़बाल (विकी), जो अपनी बीवी की भारतीयता को संरक्षण देता है, जब सहमत की सच्चाई से दो चार होता है तो सारी रूमानियत मानो फर्श पर बिखर जाती है। वो बेख़ुद सा यंत्रवत पूछता है कि क्या हमारे बीच सब झूठ था!

जब इक़बाल के पिता टूटकर अपनी बहू की लानत मलामत करते हैं तो इक़बाल कहता है कि उसने वही किया जो एक हिन्दुस्तानी को करना चाहिये। मुख़बिर के रिश्ते तो मिशन का ज़रिया होते हैं। मिशन इतना महान होता है कि व्यक्तियों और रिश्तों का कोई मानी नहीं बचता!

राष्ट्रवाद और मुल्कों के दरम्यान गहराती दुश्मनी के इस दौर में जासूस और मुखबिर की भूमिका और भी प्रासंगिक हो जाती है, क्योंकि जंग के हालात में खुफिया सूचनाएं बेहद महत्वपूर्ण हो जाती हैं। जासूस और मुखबिर इन सूचनाओं के प्राइम टूल होते हैं।

फिल्म के आखिरी दृश्य में हारी और क्लांत सी सहमत एकटक बैठी बाहर की तरफ ताक रही है, चेहरे पे सिर्फ गर्भ की पीड़ा लिये। उसका खालीपन इतना आक्युपाइड है कि दर्शक द्वंद में पड़ जाते हैं कि इसमें दर्द की भी कोई जगह है!

आखिर में सहमत का ज़िंदा रह जाना खलता है। विद्रूपता की चरम परिणति न होने से जरूरी कैथार्सिस नहीं हो पाता या सहमत का जिंदा रह जाना ज्यादा विद्रूप है। सहमत को जिंदा रखने की एक वजह वो ह्यूमनिस्टिक नज़रिया भी हो सकता है जिसमें स्टोरीटेलर दिखाना चाहता हो कि सहमत अपने गर्भ में आए पाकिस्तानी बाप के बच्चे को न गिराने का फैसला करती है। हिंदुस्तानियत और पाकिस्तानियत पर इंसानियत को तवज्जो।

और हां, ‘तलवार’ के बाद विशाल भारद्वाज का मेघना के साथ स्क्रीन राइटिंग में कोलैबोरेट न करना भी खलता है। तलवार को आलोचक के तौर पर हिंदुस्तान में बनी सबसे बेहतरीन सस्पेंस थ्रिलर फिल्मों में से एक मानता हूँ। बाज़ दफ़े राज़ी के संवाद कमजोर और नीरस मालूम पड़ते हैं। फिल्म पहले हाफ में तो बांधे रखती है मगर दूसरे हाफ में ढीली पड़ जाती है।

राज़ी हिन्दुस्तानी मुख्य धारा की फिल्म है। ज्यादातर कहानी भारतीय दर्शक और प्रतिष्ठान के नजरिये से कही गई है। फिर भी कहीं कहीं निर्देशिका उलझन में मालूम पड़ती हैं कि कथ्य को हिंदुस्तानी नजरिये से कहा जाए या फिर वैश्विक और मानवीय दृष्टिकोण से। और यह द्वंद सहमत के पाकिस्तानी परिवार के संवादों और क्लाईमैक्स के दृश्यों में साफ तौर पर ज़ाहिर होता है।

विकी कौशल की साधारण, सहज दिखने वाली सूरत और देह भाषा उनकी ताकत है। विकी जैसी मेधा वाले अभिनेता के लिये इक़बाल की भूमिका में ज्यादा कुछ था नहीं करने को। आलिया ने कालेज़ की चुलबुली और मासूम लड़की से फौजी परिवार की संजीदा बहू और शातिर जासूस का सफर बख़ूबी तय किया है। सोनी राज़दान, जयदीप अहलावत, राजित कपूर, और शिशिर मिश्रा ने अपने किरदार बखूबी निभाए हैं।

शंकर-एहसान-लाय का बैकग्राउंड स्कोर और म्यूजिक और सदाबहार गुलज़ार के बोल ‘ऐ वतन’, ‘दिलबरो’, और ‘राज़ी’ फिल्म के मूड के हिसाब से हैं। ‘ऐ वतन’ में अल्लामा इक़बाल का ‘लब पे आती है दुआ’ भी शामिल है, जो पाकिस्तान का राष्ट्रगान भी है।

कुछ सवाल भी हैं। क्या पाकिस्तान के बड़े फौजी अफसर का परिवार अपनी कश्मीरी बहू को हिन्दुस्तानी समझता है? सवाल इसलिए भी मौजूँ है कि लड़की का बाप अफसर की नजर में पाकिस्तानपरस्त और उनका खबरी रहता है। दूसरा यह कि घर का क्या मामूली नौकर नयी ब्याहता बहू की वफादारी पर इस कदर शक कर सकता है और इतनी कठोरता से पेश आ सकता है? हालांकि निर्देशिका स्वीकार करती हैं कि अपने किरदारों के ‘अच्छा दिखने’ कि गरज से पीरियाडिकली ज्यादा रीयलिस्टिक नही दिखाया है।

(दीपांकर यादव इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र हैं।)

 








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