उन्नाव और कठुआ कांड: हिंदुत्व पर पुतती कालिख

धर्म-सियासत , , शनिवार , 14-04-2018


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मदन कोथुनियां

उन्नाव व कठुआ बलात्कार कांड जैसे शर्मनाक कृत्य देश के सामने आए तो देशभर में आक्रोश व उतेजना का माहौल सा पैदा हो गया। आम जन के आक्रोश को देखते हुए सरकार को ऐसा संदेश जरूर देना चाहिए जिससे आमजन के दिल मे यह विश्वास हो सके कि जिन वहशी दरिंदों ने दरिंदगी की हदें लांघीं थी उनको जल्द से जल्द न्याय के कठघरे में खड़ा करके सजा दी जाएगी! इन दोनों घटनाओं का दुःखद पहलू यह है कि उन्नाव कांड में सत्ताधारी पार्टी का विधायक आरोपी व उसका प्रशासन कठघरे में है। पॉक्सो एक्ट में मामला दर्ज होने के बाद भी विधायक खुला घूम रहा था और बीजेपी के अन्य विधायक आरोपी के समर्थन में शर्मनाक बयान दे रहे थे! मतलब पूरी सरकार ही आरोपी को बचाने में लगी प्रतीत होती थी! इससे आमजन में आक्रोश की तीव्रता बढ़ती जा रही थी। तमाम लोग योगी सरकार की बेशर्मी भरी हठधर्मिता से नाराज थे। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के तहत चुनी सरकार द्वारा जनमत का उपहास इस तरह नहीं उड़ाना चाहिए।

मानते हैं कि किसी जघन्य अपराध के बाद पैदा हुए जनाक्रोश को ढंकने की जल्दबाजी में कोई नया कानून बना देने मात्र से समस्याओं का समाधान नहीं निकलता है लेकिन जब इलाहाबाद हाइकोर्ट यह पूछे कि "एक घंटे के भीतर सरकार बताए कि वो कार्रवाई करने जा रही है या नहीं? "कानून बनाने वाली विधायिका खुद के बनाये कानूनों को सुचारू रूप से लागू करने में कोताही बरत रही है और न्यायपालिका आगे आकर कहती है कि आप कानून लागू कर रहे हो या नहीं! इस तरह की घटनाओं के प्रति चुने हुए जनप्रतिनिधियों की संवेदनहीनता सबके सामने प्रकट हुई है जो एक सभ्य समाज व लोकतंत्र के लिए कतई शुभ नहीं है।

एक बलात्कार के आरोपी को न्याय के कठघरे में खड़ा करने के लिए, प्रशासन को काम करने के लिए, सरकार पर दबाव बनाकर आरोपी को गिरफ्तार करवाने के लिए जनता सड़कों पर उतरे और देशभर में लोग आक्रोशित हों तो समझिए राज्य में लोकतंत्र नहीं तानाशाही की तूती बोलने लग गई है! जिस राज्य में जाति देखकर 1000 से ज्यादा आरोपियों का एनकाउंटर करने का आरोप लोग लगा हो, आरोपी को ठोंकने की ठसक लखनऊ की सत्ता के गलियारों में सुनाई देती हो और जब आरोपी खुद की पार्टी का विधायक निकले तो तमाम तरह के दबाव समूहों को किनारे करके बेलगाम सत्ता मदमस्त हाथी की तरह चलती नजर आती हो तो समझिए वो सत्ता जनता में बगावत का बीजारोपण कर रही है।

कठुआ की घटना इस मायने में थोड़ी हटकर है कि यह कोई वहशी दरिन्दों द्वारा सिर्फ हवस की भूख मिटाने का कुकृत्य मात्र नहीं है! यह जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद व अलगाववाद के कारणों की जड़ों में ले जाकर खड़ा करने की कोशिश करती है तो सदियों से स्थापित मंदिरों की व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, यह घटना ब्राह्मणधर्म की घिनौनी देवदासी प्रथा की याद दिला देती है तो विराट हिंदुत्व के उन झंडा बरदारों के मुंह पर कालिख पोतती नजर आती है जो कुछ दिनों पहले आतंकियों के जनाजे में उमड़ी पूरी भीड़ को आतंकी कहती थी! जब एक 8साल की मासूम के बलात्कारी-हत्यारों के समर्थन में हिन्दू एकता मंच बनकर समर्थन में उतरता है, वकीलों की जमात जांच टीम को चार्जशीट दाखिल करने से रोकती है, कुछ लोग स्वतंत्र जांच की मांग की आड़ में सड़कों पर हाथों में तिरंगा झंडा लेकर आरोपियों के समर्थन में भारत माता की जय का नारा गुंजायमान कर रहे हैं तो हिंदुओं के लिए बेहद चिंतनीय हालात हो जाते है।

जब कुछ चरमपंथी मुसलमानों ने निर्दोषों पर बम फोड़े तो ज्यादातर मुसलमान उनसे सहमत नहीं थे लेकिन ज्यादातर मुसलमान उनके खिलाफ बोलने से भी कतराते रहे हैं जिसके कारण दुनियाँ में इस्लाम को इतना बदनाम किया गया कि आज इस्लाम को आतंक का पर्यायवाची समझा जाने लगा है! म्यांमार की घटना को लेकर मुम्बई के आजाद मैदान में तोड़फोड़ व हिंसा हुई तो देशभर का ज्यादातर मुसलमान खामोश था! जब मुम्बई में एक आतंकी के जनाजे में हजारों लोग शामिल हुए तो इक्के-दुक्के मस्लिम समाज के लोगों ने ही विरोध किया था! कुछ मौलवियों ने हिंदुस्तान की सरजमीं पर न दफन करने की बात की थी लेकिन ज्यादातर मुसलमान मौन रहा और उसी चुप्पी को मौन समर्थन मान लिया गया!

मुस्लिम समाज की चुप्पी ने हिन्दू चरमपंथी संगठनों के लिए खाद का काम किया और एकाएक मृत पड़े इन संगठनों में जान आ गई और देशभर में मुस्लिम चरमपंथियों के खिलाफ खुद को देशभक्त संगठनों के रूप सफलतापूर्वक प्रचारित कर दिया और हिंदुत्व के नाम पर सदियों से चले आ रहे वसुधैव कुटुम्बकम के सिद्धांत को दफनाते हुए "हिंदुस्तान में रहना होगा तो वंदे मातरम कहना होगा! भारत माता की जय आदि नारों से ध्रुवीकृत कर दिया कर दिया गया। गंगा-जमुनी तहजीब के रफूगरों को एक झटके में किनारे करके इतनी बड़ी खाईं खोद डाली कि आमजन को दाढ़ी टोपी वाला व भगवाधारी/तिलकधारी आतंक का पर्याय सा महसूस होने लग गया! जिस काम की शुरुआत इंडियन मुजाहिदीन व सिमी जैसे चरमपंथी संगठनों ने की थी उसको हिंदुत्व की दुहाई देने वाले संगठनों ने आगे बढ़ाने का काम किया है!

राजसमंद में जिस प्रकार शंभूनाथ के समर्थन में उमड़ी भीड़ ने किया वही काम मुम्बई में आतंकी के जनाजे को समर्थन देने वाले लोगों ने किया था! जोधपुर में रामनवमी के दिन शंभूनाथ की झांकी निकालकर जो काम हिंदुत्व के झंडा उठाने वाले लोगों ने किया वो ही काम अफजल गुरु को शहीद बताने वाले तथाकथित इस्लाम के अनुयायियों ने किया था! जिस तरह बहुसंख्यक मुसलमानों की चरमपंथियों की करतूतों पर चुप्पी को मौन समर्थन समझा गया उसी प्रकार बहुसंख्यक हिंदुओं की चुप्पी को क्यों न मौन समर्थन समझा जाए! आसिफा को न्याय दिलाने के लिए आरएसएस व उनके सहयोगी झंडों को छोड़कर जिस तरह हिन्दू समुदाय ने समर्थन जताया है वो सुकून प्रदान करने वाला है।

जम्मू पुलिस की जांच में जो तथ्य सामने आए हैं वो चौंकाने वाले हैं। पुलिस के मुताबिक यह घुमंतू बकरवाल समाज के लोगों में भय पैदा करके भगाने की सोची समझी साजिश के तहत किया गया है! इस साजिश में कोई आम अपराधी नहीं बल्कि राजस्व सेवा का पूर्वाधिकारी व वर्तमान पुजारी पर षड्यंत्रकारी होने का आरोप लगा है। नब्बे के दशक में एकाएक जब अलगाववादी गतियों ने जोर पकड़ना शुरू किया तो उस समय की घटनाओं का गहराई से विश्लेषण करते हैं तो अपरिहार्य रूप से मंदिर व मस्जिद ही साजिशों के अड्डों के रूप में उभरे और वहीं से आपराधिक गतिविधियों की शुरुआत होती है! कश्मीर घाटी में हिन्दू जातियों में एकमात्र पंडितों को निशाने पर लिया गया और बाद में पंडितों को घाटी छोड़नी पड़ी थी। किसी भी घटना का कारण स्थानीय क्रिया होती है व फिर प्रतिक्रिया में बाहरी ताकतें शामिल हो जाती हैं।

आज हिन्दू समाज ही विभिन्न धड़ों में बंटा हुआ है। शीर्ष पर बैठा ब्राह्मण अतीत की अय्याशियों को छोड़ने को तैयार नहीं है! जातीय भेदभाव की जड़ बना ब्राह्मण देवदासी व नियोग जैसी घिनौनी प्रथाओं की निंदा नहीं करता है! हिन्दू शास्त्रों में खड़ी विभेद की दीवारों को खत्म करना नहीं चाहता है! आज ब्राह्मण धर्म में सुधार की सख्त जरूरत है लेकिन जड़ता में सिमटा पंडित न इतिहास से सबक ले पा रहा है और न वर्तमान के साथ अनुकूलन बना पा रहा है जिसके कारण हिन्दू धर्म को लोग छोड़कर जाते ही हैं कोई आता नहीं है। इस्लाम तो बाहर से आया प्रचार प्रसार किया लेकिन बौद्ध, जैन, सिख, जसनाथी, विश्नोई आदि लोगों ने ब्राह्मणधर्म को क्यों छोड़ा इस पर देशभर के पंडितों को आत्ममंथन करना चाहिए!

आज जिस तरह अपराधियों के समर्थन में हिन्दू चरमपंथी संगठन व लोग सड़कों पर उतर रहे हैं वो ही हिन्दू समुदाय के महान सिद्धांतों को तिलांजलि दे रहे हैं! आज दुनियाभर के देश पुरानी दकियानूसी परंपराओं, कुरीतियों को, शोषण की दीवारों को ध्वस्त करते हुए आगे बढ़ रहे हैं तो भारत मे देवदासियों के रूप में शोषण की पराकाष्ठा लांघने वाले लोग दुबारा अन्याय व अत्याचारों की पुरानी खेती पर लौटना चाहते हैं जो बेहद चिंताजनक है!

(मदन कोथुनियां स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)

(लेखक के निजी विचार हैं। इससे जनचौक का सहमत होना जरूरी नहीं है।)








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