प्रियंका जी, लॉटरी वाले वेलेंटाइन से निजात दिलवाओगी क्या?

आड़ा-तिरछा , , शुक्रवार , 15-02-2019


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वीना

किस लड़के से बात कर रही थी तेरी बेटी, तेरी बहन? पूछ इससे? ख़ानदान के किसी भाई ने घर उसके आ चुगली लगाई। 

और... जब वो घर आई... इंतज़ार में बैठा था कोट्ठे(कमरे) के दरवाज़े पीछे भाई के अधिकार का लट्ठ।

छोटे-बड़े बहन-भाई, चाची-ताई, दादा-ताऊ, मां-पिता सबके सामने कोट्ठे का दरवाज़ा बंद हुआ। मर्यादा के ठेकेदार भाई का लट्ठ शुरू हुआ।

बहुत रोई, चीख़ी-चिल्लाई, सबसे बचाने की गुहार लगाई।

सुन रहे थे सब...जम गए धरती पर सब क़दम। मुंह में

जीभ, हलक में आवाज़।

कुछ धरती सी माओं-दादियों, भाभियों, बहनों का दिल लट्ठ की तड़ाक-तड़ाक पर पिंघलता था... पर... पर... किसी ग़ैर लड़के के बात..! इतना बड़ा गुनाह.!! कैसे सूखे मुंह को हिम्मत से गीला करतीं। आख़िर तो लड़की ग़लत थी।

बहुत सी पत्थर के सीनों वाली खुश थीं - "हां ऐसा ही होना चाहिए इस कलूटी के साथ। शक़्ल न सूरत और हिम्मत देखो!"

उसकी चीखों से कांप रही थी धरती। पेड़ों की पत्तियां घबराहट में आंधियां उड़ाने लगी थीं। पर रूढ़ियों-मर्यादाओं, समाज-संस्कृति के ठप्पे लगे घूंघट गिरे रहे। मूछें अकड़ी रही।

जब उसकी चिल्लाने की शक्ति जाती रही। नीले-लाल बेसुद जिस्म ने लट्ठ से विनती छोड़ दी। तो लाल लट्ठ को विजय पताका की तरह हिलाता हुआ भाई, बाहर निकला।

ख़ानदान की इज़्ज़त को अब कोई ख़तरा नहीं के अंदाज़ में।

वो किसी लड़के से बात कर भी रही थी या नहीं। कर रही थी तो क्या बात कर रही थी। क्यों कर रही थी। कोई लड़का था भी अगर तो कौन था? ये किसी ने नहीं पूछा। बस किसी ने कहा और उसका जिस्म लाल-नीला कर दिया गया। उसका बस्ता छीन लिया गया।

सुना है वो दहेज प्रथा के ख़िलाफ़ स्कूल निबंध प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए अध्यापिकाओं की पहली पसंद हुआ करती थी।

सुना है उसकी गिनती क़ाबिल छात्राओं में हुआ करती थी। वो पढ़-लिख कर कुछ बनना चाहती है।

घर वालों की मिन्नतें करके जैसे-तैसे 12वीं पास हो गई है। पर आगे नहीं। घर बैठे पढ़ाई कर, पेपर देने की अर्ज़ी भी उसकी ख़ारिज है।

तो फिर अब..?

वो उस घर में बिखरे अपने लहू के क़तरों पर मुस्कराकर पांव धरते हुए चलती है। उसे घूरती-नफ़रत करती नज़रों से कहती है -"चलो छोड़ो तुम्हें माफ़ किया।"

उसकी आज़ादी, आगे पढ़ाई के सपने वो पेश करेगी उसके सामने, लांघ जाएगी ये ख़ूनी देहरी जिसके साथ। जो ब्याह कर ले जाएगा, उसके बाप-भाई की मर्ज़ी से।

वो कहती है -"शादी के बाद सबसे किये वायदे निभाएगी। मुझसे भी मिलने ज़रूर आएगी।"

"उसे हंसता-मुस्कराता देख कर कोई अपने ग़म याद न रख पाएगा।" जब मैंने कहा तो कहती है -"उसकी टीचर भी उससे यही कहती थी।"

उसने, जिस्म के ज़ख्मों से अपनी रूह को बचा कर रखा है अब तक। अब तक..? हां, तब तक, जब तक उसकी ये उम्मीद क़ायम है कि शादी नाम की लॉटरी उसके सभी दुःखों को खा जाएगी। उसकी आज़ादी लेकर आएगी। उसे उसका वेलेंटाइन दिलवाएगी।

"क्यों नहीं तुम्हें पढ़ने दिया जा रहा?" पूछो तो फूलों सी मुस्कराहट के साथ बड़ी मासूमियत से ज़वाब देती है -"पता नहीं। शादी के बाद अपनी पढ़ाई पूरी करुंगी। अगर करने दी गई तो।"

अरेंज मैरिज की लॉटरी में उसके हाथ क्या लगेगा?

जब से उससे मिलकर आई हूं भीड़ में हर पुरुष-नौजवान के चेहरों को देख कर एक ही सवाल मन में आता है -"इनमें से कौन उसके जैसियों की उम्मीद की लॉटरी बनने वाला होगा। और कौन आज़ादी की आख़री लौ में फूंक मारने वाला।

वो अभी ब्याह की उम्मीद का दामन थामे ख़ुद को संभाले हंसती-खिलखिलाती घूम रही है। पर मैं...बेबस, घबराई हुई  लगातार दर्द से कराह रही हूं। ख़ुद को उस कमरे से बाहर नहीं निकाल पा रही हूं। जैसे हर पल तड़ातड़-तड़ातड़ अब मेरे जिस्म पर वो लट्ठ पड़ रहे हैं। जो कभी उसने झेले थे।

वो 21 साल की है। 12 तक पढ़ी है। उसे पढ़ाया गया होगा कि 18 साल की उम्र में वो वोट देने का अधिकार रखती है। यानि देश का मुखिया चुन सकती है।

क्या उसे ये भी बताया गया होगा कि वो प्यार कर सकती है? जीवन साथी अपनी मर्ज़ी से चुन सकती है? पिता-भाई या समाज-ख़ानदान उसके इस हक़ को लट्ठ के ज़ोर पर छीन नहीं सकते। ये अधिकार उसे संविधान ने दिये हैं।

वो किसी परिवार का हिस्सा होते हुए भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंन्त्र भारत की एक आज़ाद नागरिक है। और न सिर्फ़ अपने जात-धर्म में ही बल्कि उससे बाहर भी प्यार और शादी का अधिकार रखती है।

शायद वो ना जानती हो। क्योंकि भारत में हर धोती का दायरा संविधान से श्रेष्ठ है। सो संविधान कुछ भी कहे समाज अपने तरीक़े से अपनी मर्यादा की धोती खोलता लपेटता है। यानी मर्दवादी लट्ठ से हांकता है। और इसीलिए संविधान-अधिकार, क़ानून की ज़्यादा जानकारी जान के लिए ख़ासकर स्त्रीजाति के लिए जोख़िम हो सकती है। सो स्कूली किताबों में मौजूद अधिकारों की जानकारी को शिक्षकों की ओर से ही ओके, टाटा, बाय-बाय कह दिया जाता है।

सो, वो यक़ीनन नहीं जानती। इसीलिए धीरज धर विवाह लॉटरी का इंतज़ार कर रही है।

पर मैं! मैं क्या करूं? जिसे सब पता है। क्या, कैसे, किस बिनाह पर कहूं उसे कि तुम आज़ाद हो... तोड़ दो पिंजरा। उस पिंजरे से निकल कर उसे कहां पनाह मिलेगी? बिहार के मुजफ्फरपुर जैसे बालगृहों में? ऐसे नारी-निकेतनों में, जहां मानसिक रूप से विक्षिप्त लड़कियों तक का बलात्कार करने मंत्री-संत्री पहुंच जाते हैं? उन महिला आयोगों में, जहाँ क़ानून-अधिकार को दराज़ में रखकर परिवार-समाज से समझौता करने की सलाह दी जाती है? उन आश्रमों में, जहां देश के हर हिस्से से बटोर-बटोर कर लड़किया धार्मिक संतों-बाबाओं, नेताओं-अफ़सरों की मौज-मस्ती, व्यापार का साधन बनाई जाती हैं? उन पुलिस-अदालतों में, जहाँ अधिकतर उसके पिता-भाईयों के पैरोकार बैठे हैं?

उस देश में किसके पास गुहार लगाई जाए? जहां देश का चुना हुआ मुखिया, अपनी धर्म पत्नी को छोड़ने के शर्मनाक-अपराधिक कर्म पर इतराता फिरता है। और मुल्क़, इस क्रूर-बेशर्मी पर तालियां बजाता है!

पर सब तो बेचारी जसोदाबेन नहीं। यहां प्रियंका गांधी भी है।

कुछ बुद्धिजीवी और मीडिया वाले प्रियंका के करिश्माई व्यक्तित्व को कांग्रेस की जीत के लिए तुरुप का पत्ता मान रहे हैं।

और इस करिश्माई व्यक्तित्व में क्या-क्या तत्व शामिल हैं? उनका तथाकथित ऊंचे राजनितिक घराने से संबंध। गोरी-चमड़ी, ख़ूबसूरत, रौबदार क़द-काठी। दादी की तरह बढ़िया घड़ी-साड़ियां पहनती हैं। बेचारे, ग़रीब लोगों से घुलमिल जाती हैं। दादी की तरह भाषण करती हैं। आदि-आदि।

पर वो भाषण क्या करती हैं? उसमें कांग्रेस-भाई की विजय प्राप्ति के आलावा बदहाल जनता के हिस्से-पल्ले क्या आएगा?

जैसे वो अमेठी की जनता को डाट पिलाती हैं कि आपकी हिम्मत कैसे हुई चाचा अरुण नेहरू को यहां घुसने देने की। जिसने मेरे पिता की पीठ में छुरा घोंपा है वो आपके प्रति कभी निष्ठावान नहीं हो सकता। जैसे दहाड़-दहाड़ कर अपने भाई-मां की सीट बचाती हैं। क्या उनके ऐसे ही तेवर  देश की औरतों-बेटियों के अधिकारों को दिलवाने के लिए भी होंगे?

क्या प्रियंका उनके आगे शीश नवाने वाले और अपने घर की औरतों के लिए कसाई बने भाई-बाप की अपनी जनता फ़ौज से कहेंगी - "ख़बरदार! अगर किसी ने अपनी बहन-बेटी को अपनी पसंद के किसी भी जात-धर्म के लड़के से शादी, प्यार करने से रोका...

"जैसे मुझे, मेरी दादी, मां, चाची और बाक़ी बड़े लोगों, नेताओं और उनके बच्चों को हक़ है वैसे सबको देश का क़ानून-संविधान ये अधिकार देता है। मैं वादा करती हूं कि मेरी तरह देश की हर बेटी को सम्मान और आज़ादी से जीने का अधिकार मिलेगा। जो देश अपनी बेटियों को अधिकार नहीं दे सकता वो कभी तरक़्क़ी नहीं कर सकता।"

पर सयाने कहते हैं इन सब बातों पर माथा-पच्ची करने का अभी वक़्त नहीं है।

हे मेरे देश के बुद्धिजीवियों! तथाकथित जाति-रुतबे, स्टाइल के आभाचक्र से ख़ुद को आज़ाद करवाइये।

क्या देश का युवा और महिलाएं कांग्रेस को सिर्फ़ इस लिए जिताएं कि उसके पास स्टाइलिश प्रियंका है?

अगर देश के श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों की मानसिक ग़ुलामी का ये आलम है तो अनपढ़-अबूझ जनता का क्या क़ुसूर! इनकी शान-औ-शौकत के आगे जिनका मुंह खुला का खुला रह जाता है। आमजन तो भरमा जाएं। ख़ासजनों, कुछ आप ही करम फरमाएं। लोकतंन्त्र है जी, लोकतंन्त्र। कुछ कर्मक्षेत्र के पहाड़े भी इनसे पढ़वाएं।

जैसे प्रियंका दीदी को पढ़ने, अपनी मर्ज़ी से शादी करने का मौक़ा मिला है, इस बार कम से कम इतनी ही कोशिश कर दें कि देश की हर कन्या इनकी तरह भाग्यवान हो जाए। और अरेंज मैरिज के भरोसे लॉटरी वाले वेलेंटाइन के लिए सोमवार के व्रत से निजात पा जाएं...

       (वीना फिल्मकार, व्यंग्यकार और पत्रकार हैं।)





 








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