मगर अब हैरानी नहीं होती

आड़ा-तिरछा , , सोमवार , 24-12-2018


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अमोल सरोज

हैरत है तुमको देख कर मस्जिद में ऐ "ख़ुमार "

क्या बात हो गयी जो खुदा याद आ गया। 

शायर को मस्जिद में देख कर सब हैरत में हैं। आजकल हैरानी शब्द भी नॉस्टेल्जिया ले आता है। अहा, वो भी क्या दिन थे जब लोग हैरान  हो जाया करते थे! आगे शायद इस शब्द के लिए गूगल करना पड़े। ऐसा भी एक अहसास हुआ करता था। कुछ अस्वाभाविक, कुछ अलग देखने पर लोग हैरान हो जाते थे। हम ख़ुद कितने ख़ुशकिस्मत हैं कि हम उस आखिरी पीढ़ी से हैं जो हैरान हो जाया करती थी। अब भी कभी-कभी नॉस्टेल्जिया के चक्कर में हैरान होने की कोशिश करते हैं पर वो फीलिंग आती नहीं। दो तीन दिन पहले अख़बार पढ़ने की कोशिश की तो श्री नरेंद्र मोदी जी का बयान पढ़ने को मिला कि कांग्रेस को लोकतंत्र की परवाह नहीं है। संविधान के प्रति सम्मान नहीं है।

मुझे मोदी जी के गुरु गोलवरकर जी याद आ गए। वैसी हैरानी होनी चाहिए थी। कैसे चेले पैदा किये गोलवरकर भाई ने जो लोकतंत्र की रक्षा में अपना खून सुखाये जा रहे हैं! लोकतंत्र तो विदेशी चीज़ है। गोलवरकर जी की तरह ताजा-ताजा ब्रांड बने श्री दीनदयाल उपाध्याय जी भी यही मानते थे कि डेमोक्रेसी तो पश्चिम वालों की साजिश है और ये भारत के लिए ख़तरनाक है। खैर अब हैरानी के दिन ही ख़त्म हो गए तो क्या करें। कुछ वक्त पहले हंसी आ जाती थी, अब वो भी नहीं आती। ग़ालिब को भी ऐसे ही भाषणों से आजिज आकर हंसी आनी बंद  हुई होगी।  

अभी कुछ सालों पहले तक जब सवर्ण प्रगतिशील ये बोला करते थे कि देश को आरक्षण ने बरबाद कर दिया है या मुलायम, लालू, मायावती ने जातिवाद का जहर भर दिया तो हैरानी आ जाया करती थी। आजकल सुन रहा हूँ कि हरियाणा में बीजेपी पर जातिवाद का जहर भरने का आरोप लगाया जा रहा है। हैरानी तो यह भी कि जो ताकत पलती ही साम्प्रदायिकता और जातिवाद पर, उसे लेकर इलहाम के अंदाज़ में यह चिल्लाया जाए। असल में, हरियाणा के पांच बड़े शहरों में हुए मेयर के चुनाव में बीजेपी के सब उम्मीदवार जीत गए। तो जाट बुद्धिजीवी हैरान-परेशान हैं। 'जाट बुद्धिजीवी'। दस-बीस साल पहले शायद इस शब्द पर भी लोग हैरान हो जाते पर अब तो सब खेल खुला नंगा है। सबको पता है कि जाति बुद्धि से पहले आती है और बुद्धि का हर तर्क जाति से आगे ही शुरू होता है। आप बड़े आराम से बता सकते हैं कि कौन से बुद्धिजीवी किस जाति के हैं।

जो नैतिकता और ईमानदारी की बात करे वो लगभग पक्का ब्राह्मण  या बनिया ही मिलना है। ईमानदारी, नैतिकता जैसी मासूमियत भरी बातें करने का प्रीविलेज इन्हीं को है। बाकी अभी इतने बेशर्म नहीं हो पाए हैं। ये ऐसा वक्त है जब मासूमियत और बेशर्मी में फ़र्क़ करना बहुत मुश्किल हो रहा है। एक किस्सा याद आ रहा है मानेसर में फ़्लैट किराये पर लेने के लिए एक डीलर से मिले तो उसने बड़े गर्व से बताया था कि वो अग्रवाल हैं और अग्रवाल बेईमानी नहीं करते। मुझे हंसी आ गयी। उस वक्त तक आ जाती थी हंसी। मैंने उनसे पूछा कि भाई बेईमानी करने वाले सरनेम और बता दो, ज्यादा आसानी रहेगी। अब मुझे समझ आ रहा है, पाश ने क्यों लिखा होगा कि उन्हें प्यार करना कभी नहीं आएगा, ज़िन्दगी ने जिन्हें बनिया बना दिया। 

उन बेचारों को ईमानदारी से ही फुर्सत नहीं मिली होगी। प्यार करने का वक्त ही कहां मिला होगा? ये देश उन्हीं की ईमानदारी के दम  पर ही तो टिका हुआ है।) खैर बात हैरानी की हो रही थी। जाट बुद्धिजीवी बीजेपी पर जातिवाद फैलाने का आरोप लगा रहे हैं। भाईचारा ख़राब करने का आरोप लगा रहे हैं। प्रदेश के एक जाट नेता ने कुछ वक्त पहले मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को पाकिस्तानी कहा था। ये लोग अब भाईचारे की बात कर रहे हैं। 1947 का बंटवारा एक बड़ी त्रासदी थी इस देश की। 

विस्थापन आज के समर्थ लोगों की तरह कोई अमेरिका-कनाडा वगैरह जा बसने की मौज़ नहीं थी। जो जाट बंधु अपनी राष्ट्र रक्षा की, धर्म रक्षा की जाट मिसालें देते नहीं थकते, वे ही आज़ादी के 70 साल बाद भी उन लोगों को रिफ्यूजी, शरणार्थी, पाकिस्तानी कहने से बाज नहीं आते जो उसी देश धर्म के कारण अपना सब कुछ गंवा कर भारत आए थे। ये कोई एक नेता के मुंह से फिसले हुए अल्फाज नहीं हैं, रोजमर्रा की बात है।

किस मुंह से ये लोग भाईचारे की बात करते हैं जिनसे न तो अपने पड़ोसी के पक्ष में ही खड़ा हुआ गया कि ये तुम्हारा भी उतना ही देश है जितना हमारा। तुम्हें हम कहीं नहीं जाने देंगे। ना आने वालों को ही बाहें फैलाकर गले लगाया गया। उलटे आने वाली नस्लों में भी यह जहर भरने से बाज नहीं आये । देश का बंटवारा पंजाबियों ने तो नहीं ही करवाया था। ना वो अपनी मर्जी से अपना सब कुछ छोड़कर हरियाणा रहने आये थे। जो  सांगवान साहब मनोहर लाल खट्टर को पाकिस्तानी कह रहे थे, उनमें अपने अंदर झांकने की हिम्मत हो तो क्या वो बता सकते हैं, ऐसा कौन सा काम है जो 1947 में पकिस्तान में रहने वालों ने किया और हरियाणा की तथाकथित भाईचारे वाली कौम ने नहीं किया?

बीजेपी का काम तो जगजाहिर है। उसे तो ज़रूरत पड़ेगी तो जाटों को भी इस्तेमाल कर लेगी। वेस्ट यूपी में उन्हें 'हिन्दू-मुसलमान' के लिए टूल बना लेगी और हरियाणा में जाटों को बाहुबली बताकर ग़ैर जाटों के वोट लामबंद कर लेगी। सगी तो वो किसी की भी नहीं है। ये तो नोटबंदी और जीएसटी से सबको पता चल ही गया है कि उसने अपने परम्परागत वोटर को भी नहीं बख़्शा। पर सवाल ये है कि बीजेपी पर भाईचारा बिगाड़ने और जातिवाद फैलाने का आरोप लगाने वालों ने क्या किया ? उनका दर्द तो इतना ही है ना कि किसी जाट को सीएम नहीं बनाया? वर्ना बाकी तो  उनको भी बीजेपी के अलावा कहां जगह है ? जननायक कहे जाने वाले नेता से लेकर विकास पुरुष तक किसी को न बीजेपी से परहेज रहा औए न उसके फासिज्म से।

हैरानी कि नॉस्टेल्जिया में मैं क्या-क्या कह गया। खैर, हमारे पास अपने बच्चों को बताने को यह भी है कि हमारे पास हैरानी भी हुआ करती थी। बहुत सी बातें हमें हैरान करती थीं। हम उस पीढ़ी से थे जब लोग बबूल का पेड़ बोते थे और जब बबूल से आम नहीं होते थे तो हम हैरान हो जाया करते थे। ऐसे करामाती लोग थे हम।

 








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Preeti Singh :: - 12-25-2018
उम्दा लेखन

Alok :: - 12-24-2018
मैं चला था राजनीति में जनकल्याण ढूँढने, जिस भी दिल को थामा, धड़कन ना मिली।