समरसता के लबादे में शोषण की पैरोकारी

हमारा समाज , , मंगलवार , 05-12-2017


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डॉ. राजू पाण्डेय

रायगढ़। कवि और राजनीतिज्ञ कुमार विश्वास ने सोचा भी न होगा कि जाति प्रथा पर उनके विचार विवाद उत्पन्न कर देंगे। कदाचित वे अपने वक्तव्य में अन्तर्निहित विसंगतियों का बोध ही न कर पाए। यह प्रकरण इस तथ्य को बड़ी सशक्तता से रेखांकित करता है कि जातिवाद से मुकाबला करना कितना कठिन है। वह हम सबके अवचेतन में समाया हुआ है, चाहे हम शोषक कही जाने वाली जातियों के हों या फिर शोषित कही जाने वाली जातियों के। कुमार विश्वास के संस्मरण में उनकी दादी जी के साथ दहेज के सामान के रूप में आई सफाई कामगार लक्ष्मी अम्मा भी अपनी नियति और अपने जीवन को अपरिवर्तनीय मानती हैं, इसीलिए वह दासत्व से व्यथित नहीं हैं बल्कि दासी होते हुए भी अपनी मालकिन पर टिप्पणी कर सकने के अपने अधिकार को लेकर आनंदित भी है। लक्ष्मी अम्मा की डांट तभी तक मीठी लगती है जब तक वह वर्णाश्रम धर्म के अनुसार मल-मूत्र की सफाई का कार्य प्रसन्नचित्त होकर करे। कुमार विश्वास की तरह हममें से बहुत सारे लोग यह विश्वास करते हैं कि जातिवाद का जहर सामाजिक समरसता का अंत कर देगा। किन्तु कुमार विश्वास की सामाजिक समरसता का आधार यही है कि शोषक, शोषण करते रहें और शोषित स्वेच्छा से इसका शिकार बनते रहें। यदि निचली जातियां, उच्च जातियों के समान अधिकार मांगने लगें तब यह सामाजिक समरसता भंग हो जाती है क्योंकि अब उच्च जातियां इनका दमन करने लगती हैं और इनके मध्य संघर्ष प्रारंभ हो जाता है।

कुमार विश्वास

पारंपरिक धार्मिक विमर्श करते कुमार विश्वास 

कुमार विश्वास उस पारंपरिक धार्मिक विमर्श को ही आगे बढ़ाते दिखते हैं जो बहुत विद्वत्तापूर्ण ढंग से चार वर्ण और वर्णाश्रम व्यवस्था को गुण, कर्म, संस्कार एवं स्वभाव पर आधारित मानता है न कि इसे व्यक्ति पर जन्मना थोपी गई शोषण मूलक व्यवस्था के रूप में स्वीकार करता है।

गोलवलकर के अनुसार समाज में - यह जो ऊंच और नीच जैसी असमानता का भाव वर्णाश्रम व्यवस्था में घर कर गया है वह हाल की बात है। अंग्रेजों ने इसमें और जहर घोला है। बांटो और राज करो की अपनी नीति के तहत अंग्रेजों ने इस जातिभेद को बढ़ावा दिया है लेकिन वर्णाश्रम व्यवस्था में मूल रूप से कोई भेद भाव नहीं है।वास्तव में गीता में तो यह कहा गया है कि जो व्यक्ति अपना निर्धारित काम जो उसे सुपुर्द किया गया है निःस्वार्थ भाव से करता है तो वह ऐसा करके ईश्वर की पूजा करता है।(बंच ऑफ थॉट्स,वन्स द ग्लोरी, पृष्ठ 98)। 

महात्मा गांधी भी अपने जीवन के अधिकांश भाग में -वर्ण व्यवस्था को परिपूर्ण मानते रहे और जातिगत अस्पृश्यता का उपचार उसी भांति करते रहे मानो यह वर्ण व्यवस्था को लगा कोई संक्रामक रोग हो। इस पारंपरिक धार्मिक विमर्श के पांडित्यपूर्ण तर्कों के बावजूद कोई अतिसामान्य व्यक्ति भी बहुत आसानी से वर्ण व्यवस्था और जातिवाद के गहरे संबंध को समझ सकता है और यह प्रत्यक्ष देख सकता है कि वर्ण व्यवस्था किस प्रकार सामाजिक गतिशीलता में बाधक रही है।

अम्बेडकर का विचार था कि -टूटे फूटे मकान की रंगाई पुताई करके उसकी दुर्दशा को तो छिपाया जा सकता है किंतु सुधारा नहीं जा सकता। ऐसी अवस्था में उसे गिराकर नया मकान बनाना ही उपयुक्त होगा। अम्बेडकर ने इस बात को जान लिया था कि वंचित समाज को यदि कानूनन बराबरी का दर्जा और उसके अधिकार नहीं दिए गए तो हिंसक विद्रोह और खूनी संघर्ष के तूफान में हमारे देश के लोकतंत्र का महल ध्वस्त हो जाएगा। 

हमें अम्बेडकर का ऋणी होना चाहिए कि उन्होंने अपनी दूरदर्शिता से हमें हिंसा के भंवर में पड़ने से बचा लिया। सामाजिक समानता हेतु किए गए अनेक संवैधानिक प्रावधानों में एक आरक्षण भी था जिसे वंचित समाजों के विकसित होते तक उनके लिए एक सहयोगी उपाय के रूप में अपनाया गया था। किन्तु आरक्षण अपने उद्देश्य में अल्प सफलता ही अर्जित कर पाया। आश्चर्यजनक रूप से यह देखने में आया कि आरक्षण का लाभ पाकर उच्च पदों में पहुँचने वाले लोगों ने अपनी जड़ों को भुला दिया और जिन सवर्णों द्वारा वे अभी तक उपेक्षित किए गए थे उनकी मैत्री, समकक्षता,सम्मान और आदर प्राप्त कर वे इन शोषक सवर्णों की भांति ही व्यवहार करने लगे। हमारी आरक्षण व्यवस्था ने जिन नव सवर्णों को जन्म दिया उनकी प्रतिबद्धता अपने मूल समाज के प्रति नगण्य रह गई है। ये जाति से दलित हैं किंतु इनकी सोच मनुवादी है। इस स्थिति ने अम्बेडकर को अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बहुत पीड़ा पहुंचाई।

इधर सवर्णों की एक ऐसी पीढ़ी बड़ी होने लगी जो यह अनुभव करती थी कि उसे उन गुनाहों का दंड दिया जा रहा है जो उसने किए ही नहीं। यदि चन्द सरकारी नौकरियों की प्राप्ति को लाखों सुशिक्षित युवाओं का एकमात्र लक्ष्य न बनाया गया होता और स्वरोजगार एवं अन्य उद्यमों के विकल्प विकसित किए गए होते तो यह असन्तोष शायद इतना तीव्र न होने पाता क्योंकि तब आरक्षण के कारण सवर्ण बेरोजगारी का प्रश्न गौण हो जाता किंतु दुर्भाग्य से ऐसा हुआ नहीं।

बाद के वर्षों में ओमप्रकाश वाल्मीकि समेत अनेक विचारकों ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि आरक्षण का लाभ प्राप्त कर संपन्नता और उच्च पद अर्जित करने वाले दलित अधिकारी सवर्णों द्वारा बदस्तूर उपेक्षा और अपमान का शिकार होते रहे हैं। इसी प्रकार धर्मान्तरण के बाद भी परिवर्तित धर्म में भी दलितों के साथ भेदभाव किया जाता रहा है।

यह जानना भी अत्यंत दुःखद है कि इस विवादित आरक्षण पद्धति से वंचित समाज के लिए आरक्षित पद अनेक कारणों से पूरी तरह से भरे नहीं जा पाते हैं। रिक्त आरक्षित पदों और उनके विरुद्ध भर्ती के इस अंतर को बिना दूर किए जब राजनीतिक दलों द्वारा निजी क्षेत्र में आरक्षण का एक नया मुद्दा चर्चा में ला दिया जाता है तो उनकी नीयत पर शंका स्वाभाविक है। जब एसोचैम जैसी संस्थाएं ऐसी किसी भी पहल का विरोध करती हैं और बड़ी ही तकनीकी और शिष्ट भाषा में बताती हैं कि ऐसे कदमों से देश में निवेश का माहौल बिगड़ेगा, अंतराष्ट्रीय मानकों पर खरे उतरने वाले वर्क फोर्स में कमी आएगी, गुणवत्ता ह्रास होगा और नवाचारों को लागू न किया जा सकेगा तो सरल भाषा में इसका अर्थ यही होता है कि आरक्षित वर्ग के अयोग्य लोगों की भर्ती से निजी क्षेत्र का भट्ठा बैठ जाएगा। किन्तु यह आकलन हमारी शिक्षा व्यवस्था पर एक विशाल प्रश्न चिन्ह भी खड़ा करता है? हम स्वतंत्रता के सत्तर वर्षों बाद भी इन वर्गों को ऐसी शिक्षा क्यों नहीं दे पाए हैं जो इन्हें प्रतिस्पर्धा की मुख्य धारा का सामना करने के योग्य बना सके? हमारी नीति और नीयत पर उठने वाला यह सवाल सवर्ण नेतृत्व की उस मानसिकता को उजागर तो करता ही है जो वंचित समुदायों को आगे बढ़ने से रोकना चाहती है किंतु इससे वंचित समुदायों के नेतृत्व की वह मनोवृत्ति भी उजागर होती है जो इन समुदायों को पिछड़ा बनाए रखने में ही अपने अस्तित्व को फलता फूलता देखती है। निजी क्षेत्र में आरक्षण का विचार सामाजिक न्याय की दृष्टि से आवश्यक और राजनीतिक लाभ की दृष्टि से आकर्षक अवश्य है किंतु इसे हड़बड़ी में लागू कर हम इसके मूल उद्देश्य को क्षति ही पहुंचाएंगे। इन अनेक बुनियादी सवालों को छोड़ कर हमारा बौद्धिक नवनीत -आरक्षण का प्रतिशत कितना हो -जैसे लोक लुभावन प्रश्नों पर अपनी ऊर्जा जाया कर रहा है।

जब यह देखा गया कि केवल जाति विशेष का होना, किसी व्यक्ति को अविकसित, दमित और शोषित मानने का आधार बन सकता है तो हमारे समाज में व्याप्त ढेरों जातियों में इस बात की होड़ लग गई कि कौन कितना पिछड़ा है।

चुनावी राजनीति में वोट बैंक को सुरक्षित करने के लिए इन जातियों के आरक्षण आंदोलनों को हवा दी गई और इनकी मांगों को पूरा भी किया गया। इनमें से अनेक जातियां वास्तव में पिछड़ी थीं और इन्हें इस प्रकार इनका हक भी मिला। किन्तु उत्तरोत्तर इन आंदोलनों में सशक्त और विकसित जातियों को देखा जाने लगा तथा इनके आंदोलनों के उग्र और हिंसक स्वरुप ने हमें चकित भी किया।

स्थिति अब ऐसी हो गई है कि सरकारी महकमे में भी जातीय आधार पर अधिकारियों की लॉबीज बन गई हैं। समाज में भी निरंतर संख्या वृद्धि कर रहे जातीय संगठनों  द्वारा जातीय पहचान को पुख्ता करने वाले पर्वों, उत्सवों और त्यौहारों को उत्तरोत्तर उत्साह और उग्रता से मनाया जा रहा है। औद्योगिक विकास के प्रवाह और नगरीकरण की आपाधापी के कारण जाति के जो बंधन शिथिल हो रहे थे उन्हें स्वेच्छा से पुनः कसा जा रहा है। यदि इन परिवर्तनों का स्वरुप किसी जाति में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने और विभिन्न जातियों के मध्य स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता को प्रोत्साहित करने वाला होता तो इनसे हर्षित हुआ जा सकता था किन्तु आज जब  जातीय अस्मिता ने एक पके फोड़े का रूप ले लिया है जिसे स्पर्श करने पर चीखें निकल जाती हैं और मवाद बहने लगता है तो इन परिवर्तनों से डरना पड़ता है और इन्हें पश्चगामी भी कहना पड़ता है।

वी पी सिंह के युग के बाद से जातीय राजनीति के अनेक पाठ देखने में आते हैं। मायावती और लालू प्रसाद जैसे नेताओं की राजनीति को हम आधुनिक जातीय राजनीति का पारंपरिक पाठ कह सकते हैं जिसमें जातीय जनसंख्या के आधार चुनाव जीते और हराये जाते हैं।

कन्हैया कुमार का जय भीम लाल सलाम वाला एक अलग पाठ है जिसमें आर्थिक शोषण और सामाजिक पिछड़ेपन को जातीय पहचान से संयुक्त करने का प्रयास किया गया है। एक अन्य पाठ जो दक्षिणपंथी शक्तियां गढ़ रही हैं वह अन्य धर्मावलंबियों के कथित खतरे से मुकाबला करने के लिए हिंदुओं को संगठित करने से सम्बंधित है। इसके अनुसार जब तक हिन्दू जातियों में विभक्त रहेंगे तब तक वे इस्लामिक और ईसाई शक्तियों का सामना नहीं कर पाएंगे। 

अपनी अपनी राजनीतिक सुविधा के आधार पर गढ़े गए और मनुस्मृति के खंडन या मंडन के आधार पर स्वयं को विन्यस्त करने वाले इन पाठों से जातिवाद के नए स्वरुप अवश्य गढ़े जा सकते हैं किंतु उसे समाप्त नहीं किया जा सकता और यही इनका उद्देश्य भी है।

                                                                                                                                                                 (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)






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