कुंदन शाह ने सिनेमा दर्शकों को पहले सोचना फिर हंसना सिखाया

श्रद्धांजलि , , शनिवार , 07-10-2017


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अल्पयु सिंह

द्रौपदी तेरे अकेले की नहीं है, हम सब शेयरहोल्डर हैं

मैंने चीरहरण का आइडिया ड्रॉप कर दिया है 

शांत गदाधारी भीम शांत

1982 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘जाने भी दो यारों’ का प्री क्लाइमेक्स सीन। नसीर, रवि वासवानी, पंकज कपूर और ओमपुरी जब द्रौपदी चीरहरण दृश्य में इन संवादों को दोहराते हैं तो फिल्म के अंदर दर्शक गैलेरी से हंसी और तालियों की मिली जुली आवाज़ सुनाई देती है लेकिन सिनेमाहॉल में फिल्म देख रहे असल दर्शक के लिए ये इतना आसान नहीं। वो सिनेमाहॉल में इन संवादों पर हंसता है तो बाहर निकलने पर उन्हीं संवादों की गहराई और गंभीरता पर सोचता भी है। डार्कआर्ट, ब्लैक कॉमेडी या कल्ट फिल्म जो कहें। ‘जाने भी दो यारों’ ने हिंदी सिनेमा के दर्शकों को पहले सोचना और फिर हंसना सिखाया और यही कुंदन शाह का फिल्म जगत को योगदान है।  

पढ़ाई के दिनों में मैक्यावेली और दूसरे पॉलिटिकल विचारकों के साहित्य को पल्प फिक्शन समझकर पढ़ने वाले कुंदन शाह समेत फिल्म के संवाद लेखकों ने बकायदा सड़क पर से द्रौपदी चीर-हरण का साहित्य खरीदा और वो डायलॉग्स लिखे जो फिल्म की यूएसपी बन गए। बकौल कुंदन शाह ''लिखने के लिए असंतोष होना बहुत जरूरी है। अगर मुझमें चीज़ों को लेकर असंतोष नहीं होगा, तो मैं लिखूंगा कैसे? लगता है वो लियो तॉलस्तोय के कहे उस वाक्य को बहुत शिद्दत से मानते थे जिसमें उन्होंने कहा था कि तब तक मत लिखो, जब तक लिखे बगैर रह नहीं सकते हो। 

कुंदन शाह जाने भी दो यारों के पोस्टर के साथ।

अपने इस असंतोष को अभिव्यक्त करने का उनका अंदाज़-ए-बयां व्यंग्य का था। यानि कहानी कहने की वो कला जिसमें दर्शकों को पहले गुदगुदाया जाए, फिर धीरे से सच्चाई की एक चिकोटी ऐसे काटी जाए, जिसकी टीस देर तक रहे। फिल्म निर्देशन के उनके इस अंदाज़ ने ‘जाने भी दो यारों’ नाम की ऐसी तीखी मिर्च हास्य के शहद में डूबोकर खिलाई है, जिसका तीखापन आज भी जनमानस की जुबां पर कायम है। 

जिस वक्त फिल्मी दुनिया रोमांस और एक्शन की धारा में बह रही थी, उसी वक्त कुंदन शाह महज सात लाख के छोटे से बजट पर बनने वाली ऐसी स्क्रिप्ट को कैसे कामयाब कर ले गए, जिसे सुनते वक्त अपर्णा सेन जैसी अदाकारा सो गईं थी। कुंदन शाह उन्हें कास्ट करना चाहते थे, बात बनी नहीं। कुछ सालों बाद ये  सवाल  जो है ज़िंदगी जैसे टीवी सीरियल्स की कामयाबी पर भी उठा। ‘वागले की दुनिया’ में किरदार अंजन श्रीवास्तव की जगह आप कुंदन शाह को भी रख सकते हैं। एक आम से दिखने वाले आम आदमी की आम कहानी। नुक्कड़ भी सड़क के आम आदमी की कहानी थी, जो आज तक लोगों के जहन में कायम है।

जाने भी दो यारों के कलाकार।

 दरअसल कुंदन शाह के बनाए जगत की खासियत यही थी। वो आम आदमी की आम ज़िंदगी को सत्ता के विरोधाभासी चमकीले बैकग्राउंड के विपरीत रखते थे, जिससे ये आम कहानियां भी खास दिखाई पड़ती थीं। रोजमर्रा के जीवन में आम आदमी के चेहरे की लाचारगी, बेबसी को सिनेमा के कैनवास पर साफगोई से पेंट किया गया। फिल्म ‘जाने भी दो यारों’ का ही एक सीन लें सुधीर और विनोद अपने फोटो स्टूडियो के उद्घाटन वाले दिन लोगों का इंतज़ार कर स्टूडियो के दरवाजे पर खड़े होते हैं, सहसा वो अपनी ओर एक भीड़ आता देख खुश हो जाते हैं, लेकिन उत्साह पर पानी तब पड़ जाता है, जब भीड़ दूसरे शोरूम में चली जाती है। 

इसलिए कहानी, किरदार, सीन-दर सीन सब सच लगता है, फिल्म में रिलेटिबिटी वैल्यू है। फिल्म का सबसे ऑथेंटिक पहलू ये है कि ये कुंदन शाह के दो दोस्तों की कहानी है, राजेंन्द्र शौरी और रवि ओझा। इन दोनों एफटीआईआई छात्रों को जब बॉलीवुड में काम नहीं मिला तो उन्हें अपना एक फोटो स्टूडियो खोलना पड़ा।

सड़क के आदमी की कहानी का थ्रिल ही कुंदन शाह की फिल्मों और टीवी सीरियल्स की यूएसपी रहा। उनके क्राफ्ट में व्यंग्य कॉमेडी और थ्रिल के कॉकटेल की शक्ल में सामने आता है। थ्रिल का फैक्टर तो बचपन से ही उन्हें प्रभावित करता रहा, बचपन से ही रहस्य कहानियां पढ़ने का शौक था। तेरह साल की उम्र तक अदन में जीवन बीता, जहां गुजराती मीडियम में पढ़ाई होती थी। बकौल कुंदन '' स्कूल की किताबें बोरिंग लगती थीं, इसीलिए कहानियों में मन लगता था। बाद में परिवार के मुंबई आने और कुंदन के अंग्रेजी मीडियम में पढ़ने के दौरान मैक्यावेली और प्लेटो को वो पल्प फिक्शन की तरह पढ़ने लग गए। महाभारत के दृश्य को इस तरह फिल्मों में मनोरंजक तरीके से दिखाने के पीछे थ्रिल और रोमांच की यही कहानियां जहन में काम कर रही होंगी।

अवार्ड वापस करते हुए कुंदन शाह।

ये अलग बात है कि साल 2005 में उनकी लिखी एक फिल्म तीन बहनों में कहानी व्यंग्य ना होकर भी सच्चाई के बहुत करीब थी। इस फिल्म में भी सच्ची घटनाओं को पर्दे पर दिखाया गया था। जिसमें तीन बहनें इसलिए खुदकुशी कर लेती हैं क्योंकि परिवार दहेज नहीं जुटा पाता।

खुद को हालातों से हमेशा असंतुष्ट रहने वाला क्रिएटिव शख्स बताने वाले कुंदन ने दो साल पहले अपना राष्ट्रीय पुरस्कार भी लौटा दिया था। अभिव्यक्ति की आज़ादी को वो बहुत अहम मानते थे। उन्होंने कहा भी था कि क्या आज के जमाने में ‘जाने भी दो यारों’ जैसी फिल्म बनाना मुमकिन है, इसका जवाब भी खुद ही दिया था, खुद कहा नहीं, नहीं बन सकती। ज़ाहिर है, फिल्म का सिक्वेल बनाने का इरादा बनाकर भी उन्होंने पीछे कदम हटा लिए। उस वक्त देश में असहिष्णुता पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा था कि हम अंधकार की ओर बढ़ रहे हैं। कहते हैं कलाकार बहुत संवेदनशील होते हैं, वो आने वाले

समय की चाप बाकी लोगों से पहले ही सुन लेते हैं, ऐसे में देश को दो साल पहले कही उनकी बात को सुनना चाहिए। अगर उनकी फिल्म का ही उदाहरण दें तो ऐसा लगता है कि वो उन लोगों को संदेश दे रहे हैं,जो इस अंधकार के लिए जिम्मेदार हैं। वो कह रहे हैं कि बहुत हुआ, अब जाने भी दो यारों।

(अल्पयु सिंह पत्रकार होने के साथ डाक्यूमेंट्री फिल्में भी बनाने का काम करती हैं। और आजकल दिल्ली में रहती हैं।)










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Khushdeep Sehgal :: - 10-07-2017
'जाने भी दो यारों' तो कल्ट फिल्म थी लेकिन 'कभी हां, कभी ना' भी लाजवाब थी, शाहरुख़ का इससे ज़्यादा 'नेचुरल परफेक्ट' रोल फिर देखने को नहीं मिला...

Khushdeep Sehgal :: - 10-07-2017