“अबकी अगर लौटा तो मनुष्यतर लौटूंगा”

स्मृतिशेष , , बृहस्पतिवार , 16-11-2017


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रमाशंकर सिंह

अबकी अगर लौटा तो 

बृहत्तर लौटूंगा


चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं 

कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं 

जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को 

तरेर कर न देखूंगा उन्हें 

भूखी शेर-आँखों से

 

अबकी अगर लौटा तो 

मनुष्यतर लौटूंगा

जिन्होंने यह कविता पढ़ी होगी, उन्हें अपने मनुष्य होने पर ज्यादा यक़ीन हुआ होगा। आत्मजयी कुंवर नारायण ऐसे ही साहित्यकार थे जिनकी फिल्म समीक्षा, आलोचना, डायरी और कविता पढ़कर मनुष्य के अंदर मनुष्यता थोड़ी सी और अंखुआ आती है।

15 नवम्बर को कुंवर नारायण ‘दिवंगत’ हो गए। वे उपनिषदों के उस जिज्ञासु विद्यार्थी की तरह थे जिसकी शिक्षा कभी पूरी न हुई हो। वे नचिकेता के तरह अपने समय और समाज से सवाल पूछते रहे। चूँकि वे जानते थे कि एक दिन देह को दिवंगत हो जाना है और (शायद) लौट भी आना है तो उन्हें मृत्यु से कभी डर नहीं लगा। उनके लिए साहित्य साधना मनुष्य होने की दिशा में एक प्रयाण था।

उपनिषदों को भारतीय शिक्षा और दर्शन को समझने का आधार स्थल माना जाता है। आत्मा, परमात्मा, मृत्यु और उसके बाद के जीवन को समझने के लिए उपनिषद जरूरी हैं ही, वे भारत में संन्यासियों, परमहंसों, भिक्षुकों के बारे में भी बताते हैं। वे ऐसे लोगों से भरे पड़े हैं जो सवाल उठाते हैं।

कुंवर नारायण कठोपनिषद के नचिकेता के आख्यान के द्वारा मृत्यु और जीवन की शाश्वत समस्या पर सवाल उठाते हैं। इससे पहले नचिकेता अपने पिता की सत्ता पर सवाल उठा देता है। इतिहासकार राधाकुमुद मुखर्जी ने प्राचीन भारत की शिक्षा व्यवस्था पर अपनी किताब ‘एंशियेंट इण्डियन एजुकेशन’ में लिखा है कि औपनिषदिक काल में गुरू और पिता की बड़ी महिमा थी। विद्यार्थी अपने शिक्षक/पिता से सवाल-जवाब करते थे। उस दौर के गुरू भी आज के गुरुओं की तरह न थे जो ‘ज्यादा बोलने’ के लिए फेल करने की भावभंगिमा बनाते हैं जिससे विद्यार्थी उनसे कुछ पूछे ही न। संरचनागत स्तर पर यह विचार समाज में न बोलने वालों का एक बड़ा तबका तैयार कर देता है। कुंवर नारायण की आत्मजयी उन्हीं गूंगे लोगों के लिए थी जो अपनी आत्मा पर पत्थर धरकर कोई भी सवाल उठाने से डरते हैं। 

अपन समय के लेखकों को भी वे इस नज़रिये से देखते हैं। उनकी आलोचना की एक पतली सी किताब है: रूख़-समीक्षा-संस्मरण-टिप्पणी। इसमें गोरख पाण्डेय की आत्महत्या पर लिखते हुए वे अलवरेज़ को उद्धृत करते हैं कि आत्महत्या एक हताश व्यक्ति की मदद के लिए अंतिम चीत्कार है..’ वे आगे लिखते हैं कि धूमिल और पाश की कविताएँ राजनीतिक-सामाजिक संवेदना को पूरे जीवन-संदर्भ में रखकर विस्तृत करती हैं। गोरख पाण्डेय की कविताएं भी शायद ऐसे ही किसी बृहत्तर संदर्भ की ओर बढ़ रही थीं। विचित्र संयोग है कि इन तीनों ही कवियों की अत्यंत क्रूर मौतें किसी न किसी रूप में समाज के उस सबसे नृशंस रूप को नंगा करती है, जिसके ख़िलाफ़ उनकी कविताएं लगातार विद्रोह हैं।

तब के राष्ट्रपति से पुुरस्कार लेते कुंवर नारायण।

फिल्म समीक्षक कुंवर नारायण

कुंवर नारायण ने लगभग पचास साल पहले फिल्मों की समीक्षा शुरू की थी। वे उस दौर में लखनऊ गए थे जब लखनऊ की शाम सिनेमा के बिना पूरी नहीं होती थी। फिर उनके पास मनुष्यता के लिए एक सपना भी था जिसे पूरी दुनिया के फिल्मकार परदे पर उतार रहे थे। कवि कुंवर नारायण मनुष्यता के इन्हीं साझे सपनों को अपने साहित्य में खोज रहे थे। उन्होंने भारत सहित पूरी दुनिया के फिल्मों के बारे में वह लिखा जिसे उन्होंने फिल्मों में देखा था और समझ बनायी थी। वर्ष 2017 में उनकी किताब ‘लेखक का सिनेमा’ आयी जो 1977 से शुरू होती है। इसमें एक छोटा सा लेख है – फिल्मों की दुनिया और दुनिया की फ़िल्में। यह किताब बताती है कि जब एक निर्देशक से पूछा गया कि वह अपनी फिल्म में क्या संदेश देना चाहता है तो उसने कहा- ‘मनुष्यत्व’। इस पर टिप्पणी करते हुए कुंवर नारायण कहते हैं- ‘समारोह की उत्कृष्टतम फिल्म देखते हुए मुझे बराबर यह लगा, मानो हर फिल्म उस उत्तेजित सवाल का एक अनुत्तेजित मगर उतना ही निश्चयात्मक उत्तर था- कि बिना मनुष्यत्व के राजनीति के क्या मायने’?

जो लोग कुंवर नारायण को अ-राजनीतिक किस्म का कवि मानते हैं, उन्हें अपनी स्थापना पर विचार करना चाहिए। उनके लिए राजनीति मनुष्यता के सबसे खूबसूरत और बेहतरीन पलों में है। 1980 में आयी सत्यजित रे की फिल्म ‘हीरक राजार देशे’ के हास्य को विश्लेषित करते हुए कुंवर नारायण उसे बालकथा के माध्यम से राजनीतिक तानाशाही को बेनक़ाब करने वाली फिल्म बताते हैं और बच्चों के सौहार्द्रपूर्ण हास्य में छिपे सत्यजित रे की राजनीतिक आंख की पहचान करते हैं। फरवरी 1981 में सारिका में लिखे एक लेख ‘अति ही अति: हिन्दी फिल्मों की दुर्गति’ में कहते हैं- अधिकांश भारतीय, विशेषकर हिंदी, फिल्मकार अपने समय और समाज की महत्वपूर्ण साहित्यिक कोशिशों में बहुत ही सतही और रियायती दिलचस्पी रखते हैं। यह कमी छिप नहीं पाती- खासकर एक ऐसे उत्सव में जहाँ दुनिया की श्रेष्ठतम फ़िल्में दिखाई जा रही हों और जहाँ ज्यादा दबाव अब ग्लैमर पर नहीं, एक खास तरह की सादगी और आडम्बरहीनता पर हो।’ अब इस उद्धरण को दुबारा पढ़िए और संजय लीला भंसाली की फिल्मों के बारे में सोचिए। आप चाहें तो कोई दूसरा नाम ले सकते हैं। आप चाहें तो टीवी पर आने वाले अकबर या चन्द्रगुप्त के चरित्रों पर बात कर सकते हैं। यहाँ तक कि विजयदान देथा की कहानियों पर जो फ़िल्में बनीं, उनमें से कुछ फ़िल्में आस्कर की दावेदार बतायी गयीं लेकिन ‘सतही और रियायती दिलचस्पी’ ने उन्हें बर्बाद कर दिया। मुझे लगता है कि कुंवर नारायण ने जो फिल्मों पर लिखा है वह न केवल उनके गद्य का सबसे बेहतरीन नमूना है बल्कि यह उनके इस पूरी कायनात के प्रति जो नजरिया है, उसे भी प्रकट करता है जैसे उनके पसंदीदा फ़िल्मकार इंगमार बर्गमैन, आंद्रे तारकोव्सकी, अकीरा कुरोसोवा और सत्यजित रे अपनी-अपनी दुनिया के प्रति प्रकट करते थे। 

  (रमाशंकर सिंह शोध छात्र हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)










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