कानून की भाषा-परिभाषा भी महिला को सुरक्षित कम आतंकित ज्यादा करती है: अरविंद जैन

विशेष साक्षात्कार , , शुक्रवार , 27-04-2018


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सुधांशु गुप्त

(हाल में कठुआ और उन्नाव में बच्चियों के साथ हुई बलात्कार की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। देश के लिए ये अपने तरह का दूसरा निर्भया मोंमेट था। सरकार ने मौके की गंभीरता को देखते हुए तुरंत कानून में संशोधन कर नया अध्यादेश जारी पारित कर दिया। लेकिन इसको लेकर भी कई तरह के किंतु-परंतु हैं। इससे और इन्हीं से जुड़े तमाम पक्षों पर सुधांशु गुप्त ने वरिष्ठ अधिवक्ता और महिला मामलों पर लिखने वाले अरविंद जैन से बातचीत की। पेश है पूरा साक्षात्कार- संपादक) 

सुधांशु गुप्त: अरविंद जी, हाल ही में बलात्कार की सज़ा को लेकर जो अध्यादेश जारी हुआ है उसे कब से लागू माना जाना चाहिए ?

अरविंद जैन: अध्यादेश के प्रावधान, अध्यादेश जारी होने के साथ ही फौरन लागू हो जाते हैं। यानी 20-21 अप्रैल 2018 की मध्य रात्रि 00 बजे के बाद हुए सब अपराधों पर यह अध्यादेश लागू होगा। लेकिन इससे पहले हुए अपराधों पर, अध्यादेश लागू नहीं माना जायेगा।

सुधांश गुप्त: जैन साहब, आपने ही लिखा है कि अध्यादेश पर मंत्री मंडल की बैठक तो 21 अप्रैल, 2018 को करीब 11-12 बजे हुई थी और इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हुए 22 अप्रैल को। ऐसे में 20-21 अप्रैल, 2018 की मध्य रात्रि 00 बजे से कैसे लागू हो सकता है?

अरविंद जैन: मुझे लगता है जल्दबाजी में अध्यादेश जारी हो गया है। अब इस असंवैधानिक कानून को तो  अदालत ही निरस्त कर सकती है। शायद पहली बार ऐसा हो रहा है कि बिना राष्ट्रपति की मंजूरी के पहले ही अध्यादेश जारी हो गया। यानी अध्यादेश पहले जारी हुआ और राष्ट्रपति ने बाद में हस्ताक्षर किए।

सुधांशु गुप्त: तो क्या अब 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार सिद्ध होने पर फाँसी हो पाएगी? या इसमें भी कोई आशंका है?

अरविंद जैन: आशंका इसलिए दिखाई पड़ती है कि अभी भी, 'दुर्लभतम में दुर्लभ' का न्यायिक सिद्धान्त लागू है..और रहेगा। कानून बना-बनाया गया है तो सज़ा भी होनी ही चाहिए, मगर यही देखना है कि नए कानून के अंतर्गत, कितने अपराधियों को फाँसी की सज़ा मिलती है। संभव है कि अदालतें, 'दुर्लभतम में दुर्लभ' मामला ही ढूँढती रहें और ऐसे अपराधों में सज़ा, पहले से भी कम हो जाये। अदालतों की संवेदनशीलता और गंभीरता के बिना तो, यह मिशन अधूरा ही रहेगा।

सुधांशु गुप्त: फिर इस अध्यादेश का हासिल क्या होगा या क्या माना जाए? कहीं इसका मकसद भी 'निर्भया कांड' की तरह, जानता का गुस्सा शांत करना तो नहीं?

अरविंद जैन: बेशक़ अध्यादेश से निश्चित रूप से 'कठुआ' और 'उन्नाव' बलात्कार कांड के बाद उभरा जनाक्रोश, जरूर ठंडा पड़ेगा। जनता विशेषकर महिलाओं का गुस्सा शांत होगा। मकसद के बारे में कुछ भी कहना कठिन है मगर याद रहे कि अध्यादेश (और बाद में कानून बनने पर) का अगर सही से अनुपालन हुआ, तो मुझे लगता है कि यह अध्यादेश (कानून ) स्वयं (पितृ)सत्ता के गले में, फाँसी का फंदा भी सिद्ध हो सकता है।

सुधांशु गुप्त: अरविंद जी, क्या फांसी के अलावा भी कोई विकल्प है? फांसी ही होगी तो अपराधी हर हाल में बच्ची की हत्या ही कर देंगे।

अरविंद जैन: नहीं, ऐसा नहीं है कि हर केस में फाँसी ही होगी। अध्यादेश के अनुसार, 12 साल से कम उम्र की बच्ची से बलात्कार की सज़ा उम्र कैद या फाँसी हो सकती है। और हाँ!  न्यूनतम सज़ा  20 साल कैद भी हो सकती है। निस्संदेह फाँसी के फंदे से बचने के लिए, अबोध बच्चियों की हत्या की संभावना बढ़ेगी। अपराधी अपने ख़िलाफ़ सारे सबूत और गवाह मिटाने का भरसक प्रयास करता रहा है..करेगा। बाकी तो अदालत और जज का न्यायिक विवेक ही फैसला करेगा की उचित सज़ा क्या हो।

सुधांशु गुप्त: जैन साहब, पीड़िता की उम्र 16 से कम हुई तो अग्रिम जमानत नहीं मिलेगी और जमानत के लिए भी 15 दिन का नोटिस अनिवार्य होगा। इस बारे में आपकी क्या राय है?

अरविंद जैन: देखिए बात यह है कि संसद कानून बना सकती है लेकिन अग्रिम जमानत के बारे में दलित कानून में सुनाए, सुप्रीम कोर्ट फैसले की तरह क्या इस कानून का भी  विश्लेषण या व्याख्या करेंगे। यदि हाँ, तो फिर इस कानून की संवैधानिक वैधता पर ही, सालों बहस होती रहेगी।

सुधांशु गुप्त: इधर कुछ समय से किशोर उम्र के लड़के भी यौन हिंसा के अपराधों में पकड़े जाते रहे हैं, क्या उन्हें किशोर न्याय अधिनियम का लाभ मिलेगा?

अरविंद जैन: मेरी जानकारी में किशोर न्याय अधिनियम में कोई संशोधन नहीं किया गया है। सो लाभ ना मिलने का सवाल ही नहीं उठता। अगर 16 साल से कम उम्र के किशोर को भी सज़ा देनी है तो, किशोर न्याय अधिनियम में किशोर की परिभाषा (16 साल से घटा कर 12 साल) भी बदलनी पड़ेगी।

सुधांशु गुप्त: जैन साहब यह प्रावधान भी बना है कि छह महीने में जांच, फैसला और अन्य सब प्रक्रिया पूरी करनी होगी। क्या यह हो सकता है...हो पाएगा?

अरविंद जैन: हो सकता है छह माह में जांच से सजा तक की प्रक्रिया पूरी हो जाये, पर यह सब बिना नए ढांचे के नहीं हो  पायेगा। हम जानते हैं कि 'फ़ास्ट ट्रैक', कब और कैसे धीरे-धीरे 'स्लो ट्रैक' में बदल जाता है। 'निर्भया केस' (2012) को ही देख लो...फाँसी का फैसला होने के बाद भी, अभी तक ना जाने कहाँ अटका-लटका हुआ है। 

सुधांश गुप्त: अरविंद जी, बलात्कार के मुकदमों में पीड़िता से जिस तरह सवाल पूछे जाते हैं,  क्या वो स्त्री को बार-बार अपमानित नहीं करता या अपराधबोध से नहीं भरता?

अरविंद जैन: बहुत टेढ़ा सवाल है मगर मैं जवाब में सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि कोई अपमानजनक सवाल ना भी पूछा जाए, तो भी सचमुच बलात्कार के हर मुकदमें में स्त्री शिकायतकर्ता/पीड़िता नहीं, सिर्फ एक गवाह है। वो अपने ही साथ हुए दुष्कर्म की गवाह है, चश्मदीद गवाह। उसे बताना है, वो सब कुछ कब, कहाँ, कैसे और क्यों! स्मृतियों के सब छाया-चित्र दिखाने हैं, घटना-दुर्घटना के, जिसकी वो गवाह है। एक बार फिर दोहराना है, बलात्कार अध्याय। बार-बार दोहराना है दिमाग में, कि कहीं कुछ छूट ना जाए और न्यायधीश उसे ही 'झूठी' ना समझ बैठे। गवाह इतने दबाव-तनाव में और बाकी सब यह जानने की प्रतीक्षा में कि आगे क्या हुआ, कब हुआ और कैसे हुआ! इस तरह, हाँ इसी तरह होती है अपने ही खिलाफ़, स्त्री की गवाही। हालांकि कानूनन किसी अभियुक्त को भी, अपने ही खिलाफ गवाही देने के लिए, विवश नही किया जा सकता।

सुधांशु गुप्त: अरविंद जी, कानून से इतर एक सवाल जेहन में आता है कि महिलाओं और बच्चियों के विरुद्ध अपराध बढ़ने के क्या कारण हैं और ये अपराध कम क्यों नहीं हो रहे?

अरविंद जैन: स्त्रियों और बच्चों के विरुद्ध अपराध बढ़ रहे हैं चूंकि कानून आधे-अधूरे हैं, कानून व्यवस्था कमजोर है, कोर्ट-कचहरी बोझ से लदी पड़ी है, न्याय व्यवस्था बहुत महंगी है, पुलिस संवेदनशील नहीं है। स्त्री की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक सत्ता में बराबर की भागीदारी नहीं है। सांस्कृतिक संस्कार और स्त्री के खिलाफ खड़ा उसका अपना परिवार भी है। मीडिया और तमाम मनोरंजन मतलब 'आनंद बाज़ार' में महिलाओं को सिर्फ एक वस्तु, एक ऑब्जेक्ट के रूप में पेश कर रहे हैं। छोटे पर्दे से लेकर बड़े पर्दे तक और अखबारों के चिकने पन्नों तक, औरतों को तमाम आकर्षक उत्पादों की तरह ही पेश किया जा रहा है। एक ऐसे बेपर्दा उत्पाद के रूप में जिसे भोगा जाना बहुत स्वभाविक है। ऐसे में इस सबका नतीजा अंततः महिलाओं के विरूद्ध अपराध के रूप में ही सामने आता रहा है। समय रहते इसके बारे में भी गंभीरता से विचार करना पड़ेगा, हालांकि पहले ही बहुत देर हो चुकी है। कारण और भी होंगे...हो सकते हैं...पर क्या हमनें कभी गंभीरता और ईमानदारी से, सोचने-समझने की कोशिश की है? 

सुधांशु गुप्त: क्या यौन हिंसा के अपराधी मानसिक रूप से बीमार या यौन कुंठित होते हैं जो सज़ा होने के खतरे के बावजूद ऐसे कुकर्म कर बैठते हैं?

अरविंद जैन: मेरा साफ तौर पर मानना है कि यौन हिंसा (बलात्कार) सिर्फ यौन हवस या तृप्ति का मामला नहीं है। इसके लिए तो (बाल) विवाह, सहजीवन, विवाहेतर सम्बन्ध, लाल बत्ती क्षेत्र, कॉल गर्ल्स, एस्कॉर्ट्स और अन्य अनेक रास्ते हैं। यौन हिंसा मूलतः शक्ति या सत्ता द्वारा स्त्री और उसके परिवार को अपमानित-उत्पीड़ित कर अपना वर्चस्व बनाए-बचाए रखना है। घर में भी और बाहर भी। हत्यारे-बलात्कारी मानसिक रोगी या बीमार नहीं हैं। एक स्त्री या बच्ची के साथ यौन हिंसा, बाकी सब स्त्रियों के लिए  भय-धमकी-चेतावनी है कि अगर उसने विरोध किया, तो उसका भी यही परिणाम होगा। पति को अपनी पत्नी से बलात्कार का कानूनी अधिकार (हथियार) मिला हुआ है, सो 'बलात्कार कि संस्कृति' अजर-अमर बनी हुई है। घर में स्त्री का सम्मान नहीं, तो बाहर कैसे होगा!

सुधांशु गुप्त: कानून स्त्री को पूरी तरह रक्षा-सुरक्षा क्यों नहीं दे पाता, कानून हैं..पुलिस है...अदालत है..फिर भी महिलाओं की स्थिति में कोई विशेष बदलाव नहीं हो पा रहा। आखिर ऐसा क्यों है?

अरविंद जैन: हमें नहीं भूलना चाहिए कि पुलिस-कानून- अदालत-संसद, सब पर तो, मर्दों का ही क़ब्ज़ा है। कानून की भाषा-परिभाषा भी स्त्री को सुरक्षा कम देती है, आतंकित और भयभीत अधिक करती है. आधी दुनिया सिर्फ 'वोट बैंक' है। वोट देने का अधिकार है लेकिन सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक सत्ता में, समान भागेदारी ना होने के कारण हाशिये पर खड़ी है। स्त्री जितना विरोध करती हैं, उतना ही दमन और बढ़ जाता है. युवा स्त्री को काबू करना थोड़ा मुश्किल होता जा रहा है, तो कम उम्र की बच्चियों का शिकार बढ़ता गया. सिखा लो 'मार्शल आर्ट'! चारों तरफ बेबस अँधेरा- क्या करें, कहाँ जाएं, किस से कहें, कौन सुनेगा.... धरना-प्रदर्शन- आन्दोलन ! ये तमाम सुरक्षा प्रहरी और कानून के रखवाले भी तो, उनके (अपराधियों) ही बचाव में तो अड़े-खड़े हैं. ऐसे में कौन-क्यों चीख रहा है, सड़क पर या छोटे पर्दे पर? कोई है! बचाओ! या हमें इंसाफ चाहिए!

सुधांशु गुप्त: अरविंद जी, क्या आपको नहीं लगता कि फाँसी की सज़ा, मानवाधिकारों के विरुद्ध है? अरविंद जैन: क्या ये सारे 'मानवाधिकार' आतंकवादियों, हत्यारों और बलात्कारियों के ही पक्ष में खड़े रहेंगे या कभी यौन हिंसा की शिकार बच्चियों, तेज़ाब हमलों की पीड़ितों और दहेज़ हत्या की बलि चढ़ी-चढ़ाई गई बहुओं के साथ भी खड़े होंगे? (यौन) हिंसा के अपराधी (मर्दों) को सज़ा के सवाल पर, सब मानवतावादियों, उदारवादियों और सुधारवादियों को क्यों लकवा मार जाता है और बड़बड़ाने लगते हैं।

सुधांशु गप्त: अरविंद जी, आप तो लगभग 40 साल से कानून, न्याय, अदालतें, राजनीति और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े हैं, कुल मिला कर आपके दिमाग में क्या तस्वीर बनती है?

अरविंद जैन: सच कहूँ तो भयावह है ...कानून और न्याय व्यवस्था अभी भी "घटनाघाट से न्यायपुरम के बीच कानून की कच्ची सड़क पर, गहरे गड्ढे और थोड़ी-थोड़ी दूरी पर 'टोलटैक्स'। सालों बैठे रहो धूप में और करते रहो बहस या फैसले का इंतज़ार। फैसला हो जाए तो, अपील दर अपील। सदियों पुराने खंडहर से वातानुकूलित खंडहर तक की अंतहीन यात्रा।








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