नेताओं की संवेदनहीनता पर रिसर्च की दरकार

सम-सामयिक , रायगढ़, सोमवार , 21-08-2017


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राजू पाण्डेय

गोरखपुर में हुई बच्चों की दुःखद मौतों के बाद दो और अनिवार्य प्रक्रियाएं हमेशा की तरह सम्पन्न की जा रही हैं, ताबड़तोड़ असंवेदनशील बयानों की झड़ी लगाने और धुआंधार ढंग से दोषियों की तलाश की प्रक्रियाएं। हमारे देश में विश्वविद्यालयीन शोध का स्तर इतना गिर गया है कि शोधकर्ताओं को शोध के बड़े माकूल विषय भी नजर नहीं आते। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं- स्वाधीनता के बाद सत्ता पर काबिज नेताओं के असंवेदनशील बयानों का अनुशीलन अथवा कांग्रेस एवं गैर कांग्रेस नेताओं द्वारा दिए गए असंवेदनशील बयानों का तुलनात्मक अध्ययन या फिर असंवेदनशील बयान और सत्ता परिवर्तन या असंवेदनशील बयानों के प्रिय विषयों का विवेचन भुखमरी, बेरोजगारी, कुपोषण, अकाल, महामारी और बलात्कार के विशेष संदर्भ में। इसी प्रकार कुछ अन्य विषय हो सकते हैं।

संवेदनशीलता का प्रतीक।

शोध के अनेक विषय

भयानक घटनाओं के बाद दोषियों की तलाश की परंपरा का विस्तृत विवेचन अथवा दोषियों की तलाश की परंपरा का जन आक्रोश को शांत करने में योगदान या फिर दोषियों की तलाश में चिन्हित दोषियों की निर्दोषिता अथवा दोषियों की तलाश में लगने वाले समय का सरकार वार अध्ययन।

कानून के विद्यार्थियों हेतु भी कुछ बड़े अच्छे विषय हैं यथा गोरखपुर जैसी घटनाओं का कानूनी परिप्रेक्ष्य जैसे गैर इरादतन हत्या या सदोष मानव वध या ईश्वरेक्षा अथवा न्यायालय के विवेक पर आधारित स्वतः संज्ञान की अपरिभाषेयता।

संवेदनशील मीडिया की भूमिका भी शोधार्थियों के लिए एक रोचक विषय हो सकता है, कुछ विषयों की बानगी प्रस्तुत है- अमानवीय घटनाओं पर टीवी चैनलों के महा खुलासों की सार्थकता अथवा अस्पतालों के कुप्रबंधन को दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के पूर्व उजागर करने में चैनलों की विफलता बनाम कारण और परिणाम।

स्पंदित कर देने वाली नजर। प्रतीकात्मक फोटो।

मसला भले व्यंग्यात्मक लगे लेकिन है असली

इन शोधों का विषय पाठकों को मनोरंजक और व्यंग्यात्मक लग सकता है। लेकिन यह सायास उत्पन्न किया गया व्यंग्य नहीं है। विसंगतिपूर्ण परिस्थितियों की लगभग यथातथ्य प्रस्तुति से इस व्यंग्य का जन्म हुआ है। सतह तक सीमित लंबे चैड़े आडंबरपूर्ण विश्लेषणों की भरमार में बुनियादी सवाल पीछे छूट गए हैं। बेकारी, बीमारी, अकाल, बाढ़ और महामारी से होने वाली मौतें तो भयानक हैं ही किन्तु इनसे भी अधिक भयानक है वह यांत्रिकता जो इन मौतों के बाद होने वाली घटनाओं में हम देख रहे हैं।

बेलगाम सत्ता, प्रतिरोधहीन जनता, आरोप-प्रत्यारोपों से घिरा निजी और दलीय स्वार्थों से संचालित विरोध, मौतों की खबर के सनसनीखेज होने का आनंद लेते मीडिया की कवरेज -सब के सब- किसी पुराने नाटक के पुनः प्रदर्शन का आभास देते हैं जिसकी एकरसता और अपरिवर्तनीयता से दर्शक और कलाकार सभी ऊब चुके हैं। फिर भी आदतन इसका मंचन किया जा रहा है। मौत के इस तमाशे में मरने वाले किरदार और उनकी मौत के लिए जिम्मेदार किरदार इतने संतुष्ट हैं कि कभी अपनी भूमिकाओं में हेरफेर नहीं चाहते। इस यथास्थितिवाद के ठंडेपन और इसमें निहित बेइंतहा आत्मपीड़क एवं परपीड़क क्रूरता की कल्पना भी असम्भव है।

संवेदनशीलता सत्ता की सीढ़ी

प्रशासन और राजनेताओं के व्यवहार को समझना बहुत मुश्किल नहीं है। इसके बीज- The king does no wrong- जैसी उक्तियों की ऐतिहासिकता में छिपे हैं। यह राजतंत्रयुगीन मानसकिता है जो शासक वर्ग का वर्ग चरित्र बन गई है। असंवेदनशील होना सरकार का विशेषाधिकार है। संवेदनशील होकर कहीं प्रशासन चलता है। संवेदनशीलता विपक्ष का अस्त्र है। संवेदनशीलता सत्ता की सीढ़ी भी है। सत्ता प्राप्ति के बाद इसका कोई उपयोग नहीं रह जाता। इसलिए सत्तासीन होते ही राजनेताओं को सत्तापक्ष के परम धर्म असंवेदनशीलता को धारण करना होता है। प्रायः यह समझ लिया जाता है कि सरकार का लक्ष्य जनकल्याण करना होता है जबकि सरकार का वास्तविक लक्ष्य तो अपने अस्तित्व की रक्षा करना होता है। किन्तु क्या भूख, गरीबी, बाढ़ और महामारी से कीड़े मकोड़ों की तरह मरना जनता के एक बड़े भाग की नियति है? क्या बेआवाज अपने शोषण को सहन करना जनता का गुणधर्म है? स्थितियां तो ऐसा ही सिद्ध करती हैं।

बच्चों के साथ उनके परिजन।

मुख्यमंत्री का पुराना राग

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जापानी बुखार या इन्सेफलाइटिस पूर्वी उत्तर प्रदेश में 1978 से एक महामारी के रूप में मौजूद है और इससे अब तक लाखों शिशु कालकवलित हो चुके हैं। इसी प्रकार हैजा, मलेरिया, डेंगू, स्वाइन फ्लू चिकनगुनिया आदि महामारियां निरंतर अपना प्राणघातक अस्तित्व बनाए हुए हैं। जिन क्षेत्रों में जिन मौसमों में जिन कारणों से ये महामारियां फैलती हैं उनका ज्ञान माध्यमिक स्तर के एक औसत विद्यार्थी को भी है। नेशनल वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम का व्यापक नेटवर्क भी मौजूद है। फिर भी मौतों की अशुभ परंपरा बन्द नहीं होती है।

इसी प्रकार बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, केरल, असम, बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा वे प्रदेश हैं जहां लगभग प्रत्येक वर्ष निश्चित क्षेत्रों में बाढ़ अवश्य आती है और धन जन की व्यापक हानि होती है। हमारे देश के प्रमुख बाढ़ संवेदनशील क्षेत्र रावी, यमुना, गंडक, सतलज, गंगा, घग्गर, कोसी, तीस्ता, ब्रह्मपुत्र, महानदी, महानंदा, दामोदर, गोदावरी, मयूराक्षी, साबरमती आदि के तटीय किनारे एवं डेल्टा हैं।

बाढ़ से लेकर महामारी हजार संकट

देश के भौगोलिक क्षेत्रफल के लगभग आठवें भाग(40 मिलियन हेक्टेयर) पर बाढ़ का खतरा हमेशा बना रहता है। बाढ़ नियंत्रण के लिए केंद्रीय जल आयोग के अलावा राज्य सरकारों का अपना लम्बा चौड़ा आर्गेनाइजेशनल सेट अप है। इसके बाद भी जब बाढ़ आती है, अनगढ़ ढंग से इसका मुकाबला किया जाता है। व्यापक जनहानि होती है। लाखों लोग बेघर हो जाते हैं। फसलें नष्ट हो जाती हैं। जिंदगी अभी ठीक से पटरी पर आ भी नहीं पाई होती है कि अगली बाढ़ का समय हो जाता है।

बिल्कुल ऐसी ही स्थिति दुर्भिक्ष के बारे में है। महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना, राजस्थान, मध्यप्रदेश, झारखंड, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अनेक क्षेत्र पिछले कई वर्षों से सूखे की चपेट में रहे हैं। देश के लगभग 68 प्रतिशत भूभाग में दुर्भिक्ष का न्यूनाधिक असर होता है। इसमें से 35 प्रतिशत भाग स्थायी रूप से सूखा ग्रस्त माना गया है। दुर्भिक्ष की भयानकता को देश ने आजादी के पहले भी बड़ी शिद्दत से अनुभव किया है और उसके बाद भी। लेकिन दीर्घकालिक कार्यनीति के अभाव में इसके दुष्प्रभाव यथावत बने हुए हैं।

चक्रवात नई आफत

भारत की 7516 किलोमीटर लंबी कोस्टल लाइन में से 5700 किलोमीटर में चक्रवात आने की आशंका निरंतर बनी रहती है। विश्व में उत्पन्न होने वाले उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के लगभग 10 प्रतिशत चक्रवात भारत के हिस्से में आते हैं। चक्रवात संवेदनशील क्षेत्रों में गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल तमिलनाडु, पुदुचेरी, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल प्रमुख हैं। जब भी चक्रवात आते हैं हमारी लचर तैयारियों की पोल खोल जाते हैं। जबकि अब तो सारी मानवकृत और प्राकृतिक आपदाओं के लिए नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी की विशिष्ट व्यवस्था मौजूद है।

देश के पूर्वी और पश्चिमी घाट के अनेक क्षेत्रों तथा हिमालयन क्षेत्र में भी भूस्खलन एक बड़ी आपदा के रूप में उभरा है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, असम, मेघालय और मिजोरम के अनेक भागों में इससे धन जन की व्यापक हानि होती है। देश के लगभग 60 प्रतिशत भूभाग में विभिन्न तीव्रताओं के छोटे बड़े भूकम्पों का खतरा हमेशा बना रहता है किन्तु इनसे होने वाली हानि को रोकने के लिए कोई कार्य योजना बनती नहीं दिखती।

इन प्राकृतिक आपदाओं के पीछे पीछे महामारियों और भुखमरी तथा कुपोषण का कारवां चलता है। स्वच्छ पेयजल की कमी, खाने का अभाव, गंदगी, चिकित्सा सुविधाओं का न पहुंच पाना आदि वे कारक हैं जो किसी प्राकृतिक आपदा की भीषणता को और बढ़ा देते हैं।

हमारा दुर्भाग्य है कि देश के शीर्षस्थ पदों पर बैठे मदोन्मत्त और आत्ममुग्ध लोगों के लिए इन विभीषिकाओं के कोई खास मायने नहीं हैं। लोकतंत्रात्मक जनतंत्र में एक निश्चित प्रतिशत मत प्राप्त करना सफलता की कसौटी है और प्रत्येक दल का राजनीतिक नेतृत्व यह जानता है कि इन कठिन बुनियादी मुद्दों से उलझने के बजाए भाषा, प्रान्त, जाति, धर्म और मजहब के सस्ते, सुंदर और टिकाऊ मुद्दों को हवा देना आसानी से वोट दिलाने वाला है। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि जो जनता सबसे ज्यादा प्रभावित है वह भी अपने दुःखों और कष्टों के प्रति संवेदनहीन हो गई है। वह न केवल इनकी अभ्यस्त हो गई है बल्कि इनके बीच छोटे छोटे सुख ढूंढ निकालने की कला भी उसने साध ली है। और कहीं सहिष्णुता हो या न हो किन्तु इस मामले में हमारी सहिष्णुता आश्चर्यजनक है।

(राजू पाण्डेय समसामयिक विषयों पर लिखते रहते हैं और आजकल रायगढ़ में रह रहे हैं।)

 










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