वाम राजनीति में दखल देती एक पुस्तक

नई किताब , , बुधवार , 14-02-2018


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जनचौक ब्यूरो

 

नई दिल्ली।अरुण माहेश्वरी स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। उनकी पहचान मार्क्सवादी आलोचक एवं लेखक की है। सामाजिक,आर्थिक एवं राजनीतिक विषयों पर धारदार लेखन के साथ ही दलीय राजनीति में चलने वाली उठापटक भी उनकी नजरों से बच नहीं पातीं। ‘अनामिका प्रकाशन’ से प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘वाम राजनीति की समस्याएं’ में वामदलों के आज की राजनीति में उपस्थिति का गहाराई से विश्लेषण किया गया है। इसके पहले उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इस किताब के ब्लर्ब की सामग्री में कहा गया हैः

“किसी भी व्यवहारिक राजनीति की सबसे पहली समस्या है कि उसे राष्ट्र के राजनीतिक जीवन में अपनी उपस्थिति को हर दिन साबित करना। राजनीतिक परिस्थितियों की विवधताओं से भरी हुई जो हमेशा जो एक एकीकृत तस्वीर होती है, उसमें उसकी उपस्थिति का होना अनिवार्य होता है। कोई भी वजह क्यों न हो, अपने समय की राजनीतिक तस्वीर से पूरी तरह से अनुपस्थित रह कर किसी दल की और कोई भी भूमिका हो सकती है, राजनीतिक नहीं। सामाजिक परिवर्तन के दूरगामी लक्ष्य का क्षितिज मात्र राजनीति में दैनन्दिन उपस्थिति का कोई विकल्प नहीं है।’’ 

इसीलिये, वाम राजनीति के रणनीतिगत लक्ष्यों का कोई महत्व नहीं रह जाता है, यदि उसके दैनन्दिन कार्यनीतिक काम पूरी तरह से असंबद्ध या अप्रासंगिक साबित हो रहे हो। आज सारी दुनिया में वाम राजनीति की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह नजरों के सामने प्रगट हो रहे गतिशील सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को जगत-मिथ्या मान कर किसी ईश्वरीय विधान पर परम आस्था के साथ एक योगी की असीम-अनंत की साधना में लीन हो जाती है। राष्ट्र की तात्कालिक आर्थिक विपदा से मुक्ति के किसी फौरी समाधान के बजाय यदि कोई पूंजीवाद के अनिवार्य संकट का पाठ पढ़ाता हुआ दिखाई देने लगे, तो जनता के जीवन का संकट कितना भी गहरा क्यों न हो, राजनीति के मौजूदा ढांचे में उसका कोई स्थान नहीं हो सकता है।

“यह समस्या कुछ दूसरी बद्धमूल सैद्धांतिक अवधारणाओं से भी पैदा होती है। जब हम उदार जनतंत्र और फासीवाद को तत्वतः एक ही मानेंगे तो स्वाभाविक तौर पर फासीवाद से लड़ाई के लिये जरूरी व्यापकतम लामबंदी के प्रति अपनी निष्ठा को खोयेंगे,अपने समय की जरूरी प्रगतिशील राजनीति से अपने को अलग करेंगे।’’

अरुण माहेश्वरी की इस पुस्तक में भारत की राजनीति के वर्तमान चरण में वाम राजनीति की ऐसी ही बहु-आयामी समस्याओं पर विचार किया गया है, जिसे उनकी पुस्तक ‘समाजवाद की समस्याएं’ की अगली कड़ी के रूप में भी देखा जा सकता है।


 






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