लिप्सटिक अंडर माय बुरक़ा-स्त्री आज़ादी की घिसी-पिटी अवधारणाएं

सिनेमा , , सोमवार , 07-08-2017


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कुमुदिनी पति

किसी ने कहा कि ‘लिप्सटिक अंडर माय बुरक़ा’ देखना चाहिये क्योंकि इस फिल्म में पहली बार महिला के जीवन के उन अन्तरंग पहलुओं को खोलकर लाया गया है जिन पर कभी बात नहीं होती। पहली बार महिला की यौनिकता के प्रश्न को किताबों से बाहर, भोपाल की चार साधारण महिलाओं के दैनिक जीवन प्रसंगों से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है। समझदार व संजीदा किस्म के लोग-खासकर पढ़ी-लिखी मध्यम वर्गीय युवतियां, इस फिल्म को इसी दृष्टिकोण से देखना चाहेंगी कि अपने जीवन के अंतरविरोधों को वे बेहतर तरीके से समझ सकें। पर पिक्चर हॉल में नौजवान लड़कों की काफी संख्या दिखी, जो बड़े पर्दे पर मानो किसी पॉर्न फिल्म का मज़ा लेने आए हों। पितृसत्ता का बोलबाला व महिलाओं की बेबाकी और खुलेपन का मज़ाक उड़ाते,कमेंट करते,यहां तक कि उनके अपमान व उत्पीड़न को ठहाकों और तालियों में उड़ाते,वे अपने अंदर के क्रूर मर्द को तुष्ट कर चले जाते-पैसा वसूल। ऐसे माहौल में महिलाएं या लड़कियां बहुत ‘ऑकवर्ड’ और अजीब सा महसूस करतीं- जैसे कि जो कुछ दिखाया जा रहा था वह सार्वजनिक जगह पर उनके साथ ही हो रहा हो। निर्देशक-लेखिका अलंकृता ने सच्चाई को छिपाया नहीं है,पर आज के दौर में यह ज्यादा ज़रूरी है कि फिल्में महिलाओं के जीवन में आशा की एक किरण जगाएं और पुरुषों को कुछ संवेदनशील भी बनाएं।

लिप्सटिक अंडर माय बुर्का का एक दृश्य।

पर, कहीं-न-कहीं स्टोरी में सच्चाई को दिखाने के नाम पर फिल्म सकारात्मकता-रहित हो जाती है और चित्रण में भी भोंड़ापन हावी हो जाता है। कहानी की चारों महिला पात्र भोपाल की निम्न मध्यम वर्ग की औरतें हैं। एक 65-वर्षीय विधवा ऊषा बुआजी का किरदार निभाने वाली रत्ना पाठक शाह मिठाई की दुकान चलाती हैं और हिम्मती भी हैं। वो स्विमिंग कोच से आकर्षित होती हैं, उसके साथ फोन पर उन्हें सेक्सी बातें करते हुए दिखाया जाता है पर उनकी भावनाओं को सस्ती अश्लील कहानी की ‘रोज़ी’ से जोड़ दिया जाता है। और,यह अजीब है कि वह सोच नहीं पाती कि एक सुन्दर हट्टा-कट्टा नौजवान,जो जवान ‘रोज़ी’ से मिलना चाहता है उस जैसी बुजु़र्ग विधवा से कैसे प्रेम करेगा? उम्दा अदाकारी के बावजूद ऊषा केवल कॉमेडी की पात्र बनकर रह जाती है। जब उन्हें धक्के मारकर सड़क पर सामान सहित फेंक दिया जाता तब वह असली दुनिया में आती है लेकिन उनसे दर्शकों को सहानुभूति नहीं होती; यहां तक कि महिलाओं को भी नहीं! दूसरी पात्र शिरीन असलम बनीं हैं एक कुशल अदाकारा कोनकोना सेन शर्मा। कोनकोना का किरदार बहुत स्वाभाविक है पर कहीं-न-कहीं उनका ऐक्टिंग टैलेंट कम प्रयुक्त रह जाता है क्योंकि न ही वह सेल्स गर्ल के काम में कुछ अलग करके दिखा सकती हैं न दबी हुई, डरी हुई, मैरिटल रेप की शिकार बीवी के रूप में; यहां तक कि पति के जीवन में दूसरी औरत को देखकर भी उसे गुस्सा नहीं आता। न ही वह उससे अपनी नौकरी को लेकर कभी लड़ती-झगड़ती हैं। यह कुछ विरोधाभास सा लगता है कि एक ईनाम जीतने वाली कुशल सेल्सगर्ल घर में सहमी हुई मौन सेक्स डॉल और बच्चा पैदा करने वाली मशीन के अलावा कुछ नहीं रहती।

फिल्म के अलग-अलग दृश्य।

यह एक मुस्लिम औरत की बेहद नकारात्मक छवि है कि औरतें बुरक़े का इस्तेमाल कर,आर्थिक स्वतंत्रता पाकर भी बहशिया पति की गुलाम रहती हैं। तीसरी कैरेक्टर है लीला नाम की ब्यूटीशियन के रूप में आहाना कुमरा,जिसे एक निहायत ही भ्रमित, अपरिपक्व युवती के रूप में चित्रित किया गया,जो खुद नहीं जानती कि वह चाहती क्या है। क्या दर्शक बता सकते हैं कि लीला को आज़ादी चाहिये, पैसा या मन पसंद जीवनसाथी अथवा सेक्स? लीला की मां को ऐसा मजबूर दिखाया गया है कि मकान के लिए वह न्यूड मॉडल बनती है। यह भी अजीब है, क्योंकि न्यूड मॉडेलिंग तो उच्च वर्ग की महिलाएं भी करती हैं। लीला की एक ही बात अच्छी लगती है,जो क्षणिक है-कि वह पार्लर आई शिरीन के आंसू देखकर चिंतित होती है। यहां फोर्सड् या जबरदस्ती विवाह के मुद्दे को बहुत सरलीकृत किया गया है-बस एक अदद मकान का सौदा और मां की मजबूरी। यहां भी दर्शक लीला की मां के साथ ही खड़ा होता है, न कि ज़िद्दी लीला के साथ! जहां तक रेहाना आबिदी के रूप में प्लबिता बोरठाकुर की बात है, उसका चरित्र काफी रियलिस्टिक लगता है और कट्टर मुस्लिम परिवार में ऐसी लड़कियां होती भी हैं। पर उसके बॉयफ्रेन्ड के साथ ब्रेकअप का मामला अजीब से झटके की तरह आता है। 

फिल्म के एक दृश्य में कोनकाना सेन।

यह समझ पाना मुश्किल है कि एक भी पुरुष को अच्छा दिखाने में अलंक्रिता को क्या दिक्कत आई ? क्या पितृसत्ता की अभिव्यक्ति वास्तव में हमेशा इतने ‘क्रूड फॉर्म’में आती है? दरअसल,प्यार करने वाले पुरुष और यहां तक कि महिलाएं भी पितृसत्ता को प्रतिपादित करती हैं। शिरीन का पति उसे घरेलू हिंसा का शिकार बनाता है,पर रेप सीन को पॉर्न फिल्म की तरह दोहराते रहना जरूरी नहीं था-वह घिन पैदा करता है, संवेदना नहीं। लीला का बॉयफ्रैन्ड उसे इस्तेमाल कर अपमानित करता है, रेहाना का दोस्त मतलब का साथी है, प्रेमी नहीं, और स्विमिंग कोच तो बिना बात के उसके एकतरफा प्यार को इतना बड़ा इज्जत का मुद्दा बना लेता है। कुल मिलाकर यह फिल्म स्त्रीवादी तो किसी ओर से नहीं, बल्कि पुरुषसत्तावादी मूल्यों को पुर्नस्थापित करती है। महिलाएं बोल्ड बनने में सिगरेट-शराब पीने वाली, लाल लिपस्टिक लगाने वाली, चोर, बदचलन, सेक्स की भूखी और मैरिटल रेप की मौन विक्टिम व चोरी से नौकरी करती दिखाई गई हैं। उनके दुस्साहस को बेतुकी बेवकूफी और उत्श्रृंखलता साबित किया जाता है। अल्टीमेट विनर यानि अंतिम विजेता घटिया सोच का मैशो पुरुष है। रोज़ी हार जाती है और चारों महिलाएं अंत में एक कमरे में सिगरेट पीती हुई मृग-मरीचिका सी आज़ादी की तलाश में बैठी मिलती हैं। पर फिल्म ‘हॉट सीन्स’ के चलते बॉक्स आफिस में अच्छी कमाई कर रही है-10 करोड़ पार। अवार्ड भी 10 मिल चुके और मीडिया ने काफी सराहा है। 16 कट करके सेंसरों को पार कर गई यह ‘‘लेडी ओरिएन्टेड’ फिल्म जो महिलाओं की ‘‘फैंटेसी’’ को दर्शाती है। सही कहें तो फिल्म अलग से विषय को छूने की हिम्मत तो करती है पर न्याय करने से चूक जाती है। लिप्सटिक बुरक़े से बाहर तो पहले से ही आ चुका है, उसके चटक रंग को बर्दाश्त अभी भी नहीं किया जा रहा।

(लेखिका की राजनीतिक और महिला आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी रही है। आजकल इलाहाबाद में रहकर लेखन का काम कर रही हैं।)










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