जब मधु मंसूरी का गीत सुनकर एक युवती ने गंवाई थी अपनी जान

शख़्सियत , , मंगलवार , 14-08-2018


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मो. असगर खान

उस रात... मुसलसल एक बार में कई रागों में गाए  44 गीतों का जिक्र करते हुए मशहूर लोकगायक मधु मंसूरी हंसमुख का बदन सिहर उठता है। ये बात बहुत कम लोग और मधु मंसूरी के करीबी ही जानते हैं कि 2अक्टूबर1987 की रात को गुमला बिशुनपुर थाना के बनारी चौक पर रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना हुई थी।

मंसूरी के मुताबिक,मौका संस्कृतिक कार्यक्रम का था और मंच पर मंसूरी के साथ रामदयाल मुंडा, बीपी केसरी मौजूद थे। उन्होंने ने जब गाना शुरू किया तो सामने बैठी खचाखच भीड़ झूमने लगी। तभी अचानक आखिरी पंक्ति में बैठी एक जवान युवती लोगों को रौंदते हुए मंसूरी की तरफ दौड़ने लगी। वह दौड़ती हुई मंच से महज बीस कदम की दूरी पर पहुंची ही थी कि उसके भाई धिरजू बड़ाईक ने बरछा से (धारधार तलवार) उसकी गर्दन पर वार किया। वार ऐसा था कि युवती का सर धड़ से अलग होकर जमीन पर गिर गया और चार कदम आगे जाकर वो भी गिर पड़ी। मंसूरी ये सब देख बेहोश हो गए। मंसूरी याद करते हैं-

“उस युवती को एकाएक मेरी तरफ दौड़ता देख लोग हैरान थे स्वयं मैं भी। अचंभित दृश्य देख शांत भीड़ भगदड़ में तब्दील हो गई। जब मुझे होश आया तो वहां के थानेदार ने फिर से मंच पर आकर गाने को कहा। मैंने इंकार किया तो उन्होंने कहा कि लोगों की जान बचाने का यही एक रास्ता है। क्योंकि अगर भीड़ जंगल की तरफ भागती है तो कई लोग जंगली जानवर के शिकार हो सकते हैं। फिर बहुत मुश्किल से लोगों को शांत किया गया। मंच के सामने युवती की लाश खून के धब्बे से भरी पड़ी हुई सफेद चादर में ढ़की रखी थी। तभी मैंने दिल पर पत्थर रख आंख बंद किया और सुबह छह बजे तक एक बार में मुसलसल 44 गीत गाया।”

संयोग से घटना के समय मंच पर मंसूरी के बगल में बैठे रामदयाल मुंडा और बीपी केसरी दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उस कार्यक्रम में शामिल रहे विकास भारती के पूर्व सचिव भिखारी भगत को ये घटना आज भी याद है। वे इसकी पुष्टि करते हुए कहते हुए कहते हैं, घटना वास्तव में दर्दनाक थी। वह लड़की मधु मंसूरी की तरफ बढ़ रही थी, जो उसके भाई को नागवार गुजरा और उसने अपनी बहन की हत्या कर दी।

मंसूरी इसे अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी घटना मानते हैं। वे कहते हैं कि उन्हें कई साल बाद गांव वालों ने बताया कि वह लड़की उनके गीत से काफी प्रभावित हुई थी। इसलिए भेंट में इनाम और उनसे हाथ मिलाने के लिए उनकी तरफ दौड़ी थी। गांव छोड़ब नहीं..., नागपुर कर कोरा..., जैसे लोकप्रिय गीत गाने वाले मधु मंसूरी के प्रति लोगों का ये लगाव कोई एक नहीं है, ऐसी दिवानगी के कई किस्से कहानियां हैं।

मधु मंसूरी का गीत

सात साल में ही कंठ का कमाल

मधु मंसूरी झारखंड की वह शख्यियत हैं जिन्होंने दो हजार से भी अधिक लोकगीत गाया और लिखा है। इन्होंने मर्दानी झूमर, अंगनई (जनानी झूमर), पावस, उदासी, फगुवा जैसे राग में सैकड़ों शिष्ट और ठेठ नागपुरी गीत गाए हैं, जिसमें झारखंडी संस्कृति की विरासत को समेटा और दर्शाया गया है। झारखंड आंदोलन में भी सर्वाधिक प्रेरक गीत गाने का रिकॉर्ड भी इन्ही के नाम बताया जाता है।

रातू प्रखंड के सिमलिया गांव में 1948 में जन्में मंसूरी बचपन से ही गांव में पर्व त्योहार के मौके पर होने वाले संस्कृतिक कार्यक्रम में जाया करते थे। वहां नागपुरी, मुंडारी भाषा में संगीत-नृत्य को देख सुन सीखते। ललक ऐसी थी कि सिर्फ सात साल की उम्र ही अपनी आवाज का जादू बिखेर दिया। 2 अगस्त 1956 को रातू प्रखंड के उद्घाटन पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम का मौका। नागपुरी के महाकवि घासी राम के लिखे गीत (कांव ना कसूर दइया बिछू रला दाईया मोर पिया... .) के बोल को जब मंसूरी ने अपना कंठ दिया तो कईयों का दिल मचल उठा। तब छोटा नागपुर महाराजा चिंतामणि शरणनाथ शाहदेव ने उन्हें बदले में दस रुपए का इनाम दिया था।

950 बार का रिकॉर्ड

70 के दशक में मां को कैंसर हुआ तो पिता अब्दुल रहमान मंसूरी ने इलाज के लिए घर समेत जमीन को औने-पौने में बेच दिया। इलाज के दो साल बाद मां का निधन हो गया। नौवीं में ही तंगहाली ने मंसूरी को पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर कर दिया। 1974 में पिता भी चल बसे। इसी दौरान मधु मंसूरी रांची मेकॉन में बतौर फॉर्थ क्लास कर्मचारी काम करने लगे। उनकी शादी चूंकि बचपन में ही करा दी गई थी इसलिए जिम्मेदारी का बोझ बढ़ चुका था। लेकिन गीत-संगीत के जुनून के बीच कभी भी गरीबी को आड़े नहीं आने दिया।

इधर मंसूरी की लोकप्रियता रांची ही नहीं बल्कि झारखंड के अन्य शहरों तक अपना पैर पसार चुकी थी। लोग  बताते हैं, मंसूरी मेकॉन में कार्यरत रहते हुए भी सांस्कृतिक-समाजिक कार्यक्रम में हिस्सा लेते थें। ऑल इंडिया रेडियो पर भी उनके गीत का प्रसारण होता। लोक गायक और पद्मश्री मुकुंद नायक कहते हैं कि सुरीली आवाज के धनी मधु मंसूरी केवल गीत ही नहीं, बल्कि वह एक भाव प्रवण कवि भी हैं।

इस बारे में मंसूरी ने कहा, उनके गीत के मुरीद अविभाजित बिहार के राज्यपाल एआर किदवई, मंत्री जगन्नाथ मिश्रा, खेल मंत्री और रांची डीसी तक थे। इन लोगों ने मेकॉन को पत्र लिखकर उन्हें समाजिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए विशेष छुट्टी देने की अनुसंशा की थी।

ऐसे तो मधु मंसूरी का हर गीत लोगों को पंसद आता, लेकिन खुद वो अपने एक गीत को सबसे पंसददीदा बताते हैं। वह कहते,  “1972 में ‘नागपुर कर कोरा’ (नागपुर कर कोरा... , नदी नाला टाका टुकू बन रे पतेरा, भरले कोसा कासी फूल, डिंडा समय झूला झूल..., बिना इंजन बिना तेल गाड़ी लोहरदगा मेल... .) नामक गीत मैंने स्वयं लिखा और गाया। यह गीत इतना प्रचालित हुआ कि अबतक मैं इसे लगभग 950 गा चुंका हूं। हर महफिल,कार्यक्रम में मेरे इस गीत की चर्चा होती है। यह गीत राज्य में सांस्कृतिक माहौल बनाने में काफी सार्थक साबित हुआ। देश विदेश में कई जगहों पर इसे गाया गया।”  हाल में आई फिल्म ‘गाड़ी लोहदग्गा मेल’ में  भी इस गाने को फिल्माया गया है, जिसके किरदार में खुद मधु मंसूरी हैं।

मंसूरी के क्रांतिकारी तेवर

क्रांतिकारी और आंदोलन की गीत कब से और क्यों गाना शुरु किया के प्रश्न पर मंसूरी कहते हैं, “विकास के नाम पर रांची में किसानों और आदिवासियों की हजारों एकड़ जमीन अधिग्रहण की जा रही थी। रांची में बनी हरमू कॉलनी, आशोक नगर कॉलनी, एचइसी और तुपूदाना जैसी फैक्ट्री की स्थापना झारखंड के लूट और विस्थापन पर कायम की गई। यही हाल अन्य शहरों का भी बाद में हुआ। ये सब देखते हुए बड़ा हुआ। बचपन से ही मेरे मन में ये बात बहुत कचोटती थी कि हमारे जल जंगल जमीन विकास के छूठे नाम पर छीने जा रहे हैं। हम कहां जायेंगे। ऐसी कई बात मन में रह रह कर उभर आती।”

मधु मंसूरी का यही आक्रोश खूंटी के झारखंड आंदोलन मंच में दस दिसंबर को 1960 फूटा। जब उन्होंने पहली बार आंदोलन गीत प्रस्तुत किया तो तेवर और इरादे साफ थे। और इसके बोल थे “पहिले रहिली हम गोरा के धंगरवा, धन धरम डगमग, आबे ही साहेबक पानी भरवा (अरे! पहले तो हम गोरे अंग्रेजों के नौकर थे जिसके कारण हमारी समृद्धि और धर्म की कोई बिसात नहीं थी. और आज हम अपने देशी साहबों के यहां पानी भर रहे हैं।)”

1963 का वो मशूहर वाक्या जिसने मधु मंसूरी को सांस्कृतिक और समाजिक लोकगायक से मुखर और बेबाक झारखंडी आंदोलनकारी के रुप में पहचान दिलाई। उसके चर्चे भी खूब होते हैं। हुआ यूं था कि कि जयपाल सिंह मुंडा अपने 33 विधायकों वाली मुर्गा छाप वाली झारखंड पार्टी को कांग्रेस में विलय कर रांची लौटे थे। इसके कुछ ही दिन बाद रांची बिरसा चौक पर एक सभा हुई जिसमें जयपाल सिंह मुंडा शामिल हुए। जयपाल सिंह के फैसले को लेकर मधु मंसूरी में आक्रोश था और वे  गांव से सइकिल की सवारी कर मुंडा से मिलने बिरसा चौक पहुंचे थे। मन के इतना आक्रोश था कि मुंडा को देख मंसूरी उनकी तरफ हाथ उठाते हुए व्यंगात्मक गीत गाया- “बेचले मुरुगा छाप, दुइयो गाले खाले थाप। सब के बनाले बनिहार, काटी बन झार, चोर के देई देले उपहार।”

गांव छोड़ब नहीं’ हर के जुबा पर

जब नेशनल आवार्ड से सम्मानि फिल्म मेकर मेघनात के लिखे गीत (2007) “हम गांव छोड़ब नहीं” को मंसूरी ने गया तो इस गीत का संदेश भारत से विदेश तक जा फैला। मेघनात बताते हैं कि इस गीत को लिखकर मधु मंसूरी को दिखाया तो उन्होंने इसमें कुछ सुधार और तब्दीली करने की बात कही। फिर उसे अपने आंदाज में लिखा जिसके बोल थे- “गांव छोड़ब नहीं, जंगल छोडब नहीं, माई माटी छोड़ब नहीं, लड़ाई छोड़ब नहीं... .”

बताया जाता है कि ये गाना इतना लोक्रप्रिय हुआ कि अबतक 20 से भी अधिक राज्य और 10 देशों में अलग अलग भाषाओं गाया जा चुका है। बाद में इसपर सवा पांच मिनट की म्यूजिक फिल्म बनाई गई (गांव छोड़ब नहीं)। फिल्म में गांव, जंगल, पहाड़ और प्राकृतिक संपदा के बचाने की लड़ाई लड़ रहे आदिवासियों का प्रतिरोध दिखाया गया।मेघनात कहते हैं-

“गांव छोड़ब नहीं, गीत झारखंडी उलगुलान को सटीक और सार्थक परिभाषित करता है। मैंने जितने भी लोकगायक, गीतकार को देखा सुना, उनमें मधु मंसूरी अलग थे। उनके क्रांतिकारी गीतों में जल जंगल जमीन और झारखंडी संस्कृति को बचाने का संदेश और जज्बा मिलता है। उन्होंने अपनी बेबाकी कायम रखी और चापलोसी कभी नहीं की।”

एक बात आज भी मधु मंसूरी को हमेशा कसकती है कि उनके की नाम की घोषणा करके भी उन्हें पद्मश्री का नहीं मिलना। वे कहते हैं कि 2014 में राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को पद्मश्री सम्मान के लिए उनके नाम की सिफारिश कर दी थी। तब के अखबारों में उनका नाम भी छप गया था, और उन्हें बधाई दी जा रही थी। लेकिन वो सिर्फ घोषणा और सिफारिश थी। 

https://www.youtube.com/watch?v=8M5aeMpzOLU

(ये लेख दि वायर उर्दू पर पहले छप चुका है।)










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