‘‘बाबाओं’’ को मंत्री बनाकर शिवराज ने लगाया सत्ता और संविधान को पलीता

धर्म-सियासत , , बृहस्पतिवार , 05-04-2018


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प्रदीप सिंह

नई दिल्ली/ इंदौर। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पांच ‘‘संतों’’ को राज्यमंत्री का दर्जा देकर विवादों में आ गए हैं। शिवराज सिंह चौहान ने रातोंरात ‘‘नर्मदा घोटाला यात्रा’’ पर जाने को तैयार संतों को लालबत्ती लगी गाड़ी से नवाज कर नर्मदा घोटाले को रफा-दफा कर दिया। लेकिन सरकार के इस कदम से विपक्ष और संविधान सकते में हैं। मुख्यमंत्री के निर्णय पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या किसी धर्मनिरपेक्ष राज्य में धार्मिक लोगों को राजनीतिक लाभ के लिए राज्यमंत्री का दर्जा देना सही है? 

दर्जा प्राप्त संतों का नाम नर्मदानंद महाराज, हरिहरानंद महाराज, कंप्यूटर बाबा, भैयू महाराज और पंडित योगेंद्र महंत है।

इन सभी को नर्मदा किनारे वृक्षारोपण, जल संरक्षण और स्वच्छता के विषयों पर जन जागरूकता अभियान चलाने के लिए गठित विशेष समिति में 31 मार्च को शामिल किया गया। फैसले के बाद बाबाओं के रुख में तत्काल परिवर्तन आ गया। पहले तो उन लोगों ने सरकार  द्वारा पिछले साल नर्मदा के किनारे लगाए गए पौधों और अन्य विकास कार्यों की ‘पोल’ खोलने के लिए ‘नर्मदा घोटाला रथयात्रा’ शुरू करने का ऐलान किया था अब मंत्री पद की हैसियत मिलने के बाद इन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। अब ये सभी बाबा जनजागरण करने की बात कर रहे हैं।

कंप्यूटर बाबा कहते हैं कि अगर हमें सरकारी सुविधाएं नहीं मिलेंगी तो हम नर्मदा नदी के संरक्षण का काम कैसे कर पाएंगे। जिलाधिकारियों से बात करने के लिए हमें सरकारी दर्जे की जरूरत थी। इस फैसले के बाद शिवराज सिंह चौहान सरकार के खिलाफ साधु-संतों की ओर से निकाली जा रही ‘नर्मदा घोटाला रथ यात्रा’ समाप्त हो गई।

चुनावी वर्ष में शिवराज सिंह चौहान ने राजनीति में धर्म का तड़का लगाकर सूबे की सियासत में उबाल ला दिया है। विपक्ष ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है तो राम बहादुर शर्मा नामक एक व्यक्ति ने इस फैसले को चुनौती देते हुए इंदौर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की है। याचिका में मंत्री बनाने के लिए स्थापित संवैधानिक परंपराओं और मान्यताओं का हवाला देते हुए इस फैसले पर रोक लगाने की मांग की गयी है। फिलहाल, अदालत के फैसले का इंतजार है। लेकिन मध्य प्रदेश सरकार के-

राजनीतिक ‘‘डैमेज कंट्रोल’’ के इस नाटक ने देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र और इन तथाकथित संतों की नैतिकता को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। राजनीतिक पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को राज्यमंत्री का दर्जा देकर संगठन में व्याप्त आक्रोश को कम करती रही हैं। लेकिन धार्मिक नेताओं, संतों को सरकार के प्रति नरम रुख रखने के लिए राज्यमंत्री का दर्जा देने की यह पहली घटना है। धर्म और राजनीति का आपस में घालमेल करने में बीजेपी सिद्धहस्त रही है। लेकिन राजनीति और गृहस्थ जीवन से दूरी बनाए रखने वाले इन तथाकथित संतों को मंत्री बनाना संविधान के साथ-साथ धर्म का भी मजाक उड़ाना है। 

मध्य प्रदेश सरकार ने जहां इस पूरी प्रक्रिया में संविधान द्वारा स्थापित मान्यताओं की धज्जियां उड़ाई तो वहीं पर धर्म, नैतिकता और आदर्श का चोला ओढ़े संत भी खोखले साबित हुए हैं। इस घटना के बाद यह साफ तौर पर देखा जा सकता है कि-

धन-संपत्ति और पद-प्रतिष्ठा को माया बताने वाले तथाकथित संत सत्ता के गलियारों में कैसे घुटने टेक रहे हैं। राजनीति और समाज को धर्म के अंकुश से नियंत्रित करने का दावा करने वाले उक्त संत कितने पाखंडी हैं, जो एक दिन पहले तक नर्मदा की दुर्दशा और उसके किनारे पौधारोपण में हुए घोटाले  के खिलाफ यात्रा निकालने जा रहे थे, लेकिन रातोंरात उन्हें नर्मदा के किनारे सब हरा-हरा दिखने लगा।

विपक्ष और संविधान के जानकार जहां इस घटना को देश की राजनीति के साथ ही धर्म के लिए भी  खतरनाक बता रहे हैं वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने फैसले पर अडिग हैं। उनका कहना है कि-

’’हम जनकल्याण और विकास के लिए समाज के सभी तबकों को साथ लाना चाहते हैं, इसीलिए संतों को यह दर्जा दिया गया है।’’  

मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री उमा भारती इस फैसले की तारीफ करते हुए कहती हैं कि-

‘‘मंत्री का दर्जा संतों को नहीं तो क्या गुंडों और ठगों को दिया जाएगा? मैं मध्य प्रदेश सरकार के इस फैसले का समर्थन करती हूं।’’

राज्यमंत्री का दर्जा पाए संत अब गदगद हैं। मध्य प्रदेश की जीवनरेखा मानी जाने वाली नर्मदा अब अविरल बहने लगी है। कम्प्यूटर बाबा ने सरकार के इस कदम के लिए संत समुदाय की तरफ से शिवराज सरकार का आभार जताया है। ये पांच तथाकथित संत अब पूरे संत समाज के ठेकेदार बन गए हैं। मध्य प्रदेश की राजनीति पर नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है मंत्री बने संतों का अतीत काफी विवादित रहा है। पांचों संत किसी न किसी कारण चर्चा में बने रहते है।

लंबी दाढ़ी, लंबे बाल रखने वाले 54 वर्षीय कम्प्यूटर बाबा का असली नाम नामदेव दास त्यागी है। वह इंदौर के रहने वाले हैं। अपने साथ हमेशा लैपटॉप रखते हैं, इसीलिए लोग उन्हें कम्प्यूटर बाबा के नाम से पुकारने लगे। आम बाबाओं से अलग वह अपने भक्तों से फेसबुक पर चैटिंग भी करते हैं। वहीं तीन साल पहले वह तब चर्चा में आए थे जब उन्होंने कुंभ मेले के दौरान घाट पर हेलिकॉप्टर लैंड कराने की अनुमति ली थी। इसके बाद ही उन्होंने घाट पर स्नान किया।

2014 में उन्हें आम आदमी पार्टी की तरफ से टिकट देने की भी चर्चाएं थीं। वहीं इंदौर में हाईटेक आश्रम चलाने वाले भैयू जी महाराज का असली नाम उदय सिंह देशमुख है। आकर्षक व्यक्तित्व के धनी भैयू जी महाराज अपनी हाई प्रोफाइल जीवनशैली और राजनीतिक संबंधों के कारण जाने जाते हैं। मर्सिडीज और लग्जरी कारों से चलने वाले भैयू एक साल पहले दूसरी शादी करने के कारण भी चर्चा में आए थे। लेकिन सबसे पहले वह चर्चा में तब आए जब 2011 में उन्होंने अन्ना हजारे के अनशन के समय अन्ना और कांग्रेस सरकार के बीच मध्यस्थता करने आए थे। 

मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी ने इसे धर्मगुरुओं के नाम पर राजनीतिक छलावा  और नौटंकी करार दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने नर्मदा संरक्षण की अनदेखी की। इन संतों को इस बात का निरीक्षण करना चाहिए कि आखिर राज्य सरकार ने 6 करोड़ रुपये के पौधे कहां लगाए हैं, जैसा वह दावा करती है। 

क्या है नर्मदा महाघोटाला 

 2 जुलाई 2017 को मध्य प्रदेश सरकार ने एक दिवसीय पौध-रोपण कार्यक्रम के तहत नर्मदा नदी के तटों पर 12 घंटे के अंदर लगभग छह करोड़ पौधे लगाने का दावा किया था। पौध-रोपण का यह कार्य सुबह 7 से शुरू और शाम 7 बजे खत्म हुआ था। नर्मदा के दोनों तट के किनारों और नदी के जलग्रहण क्षेत्र वाले कुल 24 जिलों में नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए एक दिन में एक साथ 6 करोड़ 67 लाख 50 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अमरकंटक में नर्मदा मंदिर परिसर में रूद्राक्ष का पेड़ लगाकर इस महाअभियान का शुभारंभ किया था। इस महावृक्षारोपण में लगभग 2 दर्जन से ज्यादा किस्म के पौधे लगाए गए। इनमें फलदार और छायादार किस्मों में आम, आंवला, नीम, पीपल, बरगद, महुआ, जामुन, खमेर, शीशम, कदम, बेल, अर्जुन, बबूल, बांस, इमली, गूलर, खेर तथा कृषि वानिकी के अमरूद, संतरा, नींबू, कटहल, सीताफल, अनार, अचार, चीकू, बेर, मुनगा आदि के पौधों का रोपण किया गया। हालांकि कुल लगाए गए पौधों का वास्तविक आकलन अभी तक नहीं हो पाया है। इस योजना का सरकार ने खूब ढिंढोरा पीटा। लेकिन अब इस पर सवाल उठने लगे हैं। विपक्ष और संतों का कहना है कि सरकार के पास इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि कितने पौधे नर्मदा के किनारे बचे हैं। 


 


 

 

 










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hindu :: - 04-05-2018
बड़ा संविधान संविधान किये पड़े हैं , संविधान भी तो नेताओ का ही लिखा है या देवता प्रदत्त है ? जब मुस्लिमों को तुष्ट करना हुआ संशोधन करा लिया , अल्पसंखयक को विशेष अधिकार है , rte उन पर लागु नहीं , उनके धर्मस्थान का नियंत्रण सरकार नहीं करती जबकि हिन्दू मंदिरों का सारा पैसा सरकार ले जा रही है , कहाँ की धर्मनिरपेक्षता कोई धर्मनिरपेक्षता नहीं है , जब हिन्दू मंदिरों का अरबों रुपया ले रहे हैं तो साधुओं को मंत्री बना दिया तो क्या हुआ यह तो हमारा अधिकार है , मंदिर में चढ़ाया धन क्या प्रशासन की बपोती है?