मदीहा गौहर का न होना

फुटपाथ , , शनिवार , 02-06-2018


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अजय सिंह

कवि शोभा सिंह ने मुझे सुझाव दिया कि मैं इस बार अपने कॉलम में मदीहा गौहर (1956-2018) के बारे में लिखूं। मुझे यह सुझाव पसंद आया। लेकिन पत्र-पत्रिकाओं में उनके बारे में जानकारी या ब्यौरे बहुत कम - लगभग नहीं के बराबर - थे, जबकि वह अनजान शख़्सियत नहीं थीं। 61 साल की उम्र में 25 अप्रैल 2018 को लाहौर (पाकिस्तान) में उनकी मृत्यु की ख़बर मुझे देर से मिली। इस ख़बर के प्रति - और मदीहा गौहर के प्रति - समाचार माध्यम में आम तौर पर जो उदासीनता रही, उसने मुझे बहुत दुखी और परेशान किया। चूंकि मैं इंटरनेट संजाल से दूर हूं, इसलिए मैंने कहानीकार किरन सिंह से कहा कि वह इंटरनेट से मदीहा गौहर के बारे में ज़रूरी सूचनाएं उपलब्ध करा दें - और उन्होंने मुझे सूचनाएं मुहैया करा दीं।

मेरे अपने पुराने काग़ज़ात में उर्दू नाटक ‘कौन है यह गुस्ताख़?’ (2012) का ब्रोशर (विवरण पुस्तिका) मिल गया, जिसे मैंने संभाल कर रखा था। शाहिद नदीम के लिखे इस नाटक का निर्देशन मदीहा गौहर ने किया था। इस नाटक को लेकर अपने अजोका थिएटर ग्रुप के साथ वह क़रीब तीन साल पहले पाकिस्तान से भारत (दिल्ली) आयीं थीं। तब पत्रकार-लेखक भाषा सिंह ने उनका इंटरव्यू लिया था, जो हिंदी ‘आउटलुक’ में छपा था।

‘कौन है यह गुस्ताख़?’ नाटक उर्दू के महान लेखक सआदत हसन मंटो की जन्म शताब्दी (1912-2012) के मौके़ पर लिखा और खेला गया था। इसका ब्रोशर पहले कवर से लेकर आखि़री कवर तक गहरे काले रंग में है। यह इस कदर संजीदा, गहन कलात्मक, आकर्षक और घनघनाता हुआ है कि बरबस मंटो की कहानियां ‘स्याह हाशिए’ और ‘खोल दो’ याद आने लगती हैं। यह नाटक मंटो के जीवन और रचना संसार पर केंद्रित है। यह मंटो के बारे में बनी-बनायी धारणाओं और रूढ़ियों को ध्वस्त करता है।

इस नाटक को पेश करते वक़्त मदीहा गौहर ने अपने निर्देशकीय वक्तव्य में जो कहा था, वह ध्यान देने लायक है। उन्होंने कहा कि मंटो को आम तौर पर ऐसे लेखक के तौर पर पेश किया जाता है, जो ‘विवादास्पद’ है, जो सिर्फ़ यौन विषयों और वेश्याओं पर लिखता रहा। जबकि मंटो मेरे तईं कहीं ज़्यादा जटिल, कहीं ज़्यादा मुश्किल कलाकार हैं। मेरा नाटक ‘कौन है यह गुस्ताख़?’ मंटो को स्वप्नदर्शी, राजनीतिक रूप से परिपक्व लेखक के रूप में पेश करता है, जिसे भविष्य में घटने वाली घटनाओं का आभास हो चला था।

मदीहा गौहर ने कहा कि मंटो की राजनीतिक रचनाएं आश्चर्यजनक रूप से आगे होने वाली घटनाओं का अता-पता देती हैं। 1950 के दशक की शुरूआत में मंटो ने बता दिया था कि सोवियत संघ को हराने/तोड़ने के लिए पाकिस्तानी मुल्लाओं और अमेरिका के बीच गहरा गठबंधन बनेगा। और 1980 के दशक में यह बात सच निकली। मदीहा गौहर का कहना था कि कम्युनिस्टों के नियंत्रण में चलने वाले प्रगतिशील लेखक संघ ने हालांकि मंटो से दूरी बनाये रखी और उनका बहिष्कार किया, लेकिन हक़ीक़त यही है कि अपने समकालीन प्रगतिशील लेखकों की तुलना में मंटो कहीं ज़्यादा प्रगतिशील थे।

आंसमा जहांगीर (1952-2018) के गुज़र जाने के दो महीने के भीतर मदीहा गौहर का इंतक़ाल सिर्फ़ पाकिस्तान के लिए नहीं, भारत के लोकतांत्रिक व वाम-प्रगतिशील सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन और रचनाधर्मिता के लिए भी गहरा नुकसान है। यह बेहद तकलीफ़देह है। वह तीन साल से कैंसर की बीमारी से लड़ रही थीं। वह 21 सितंबर 1956 में कराची (पाकिस्तान) में पैदा हुई थीं।

मदीहा गौहर का परिचय एक शब्द या एक वाक्य में दे पाना बहुत मुश्किल है। उनका व्यक्तित्व और प्रतिभा बहुमुखी व बहुआयामी थी। वह लेखक थीं, नाटक निर्देशक थीं, अभिनेत्री थीं, अजोका थिएटर ग्रुप (स्थापना 1984) की संचालक-सूत्रधार थीं, मानवाधिकारवादी थीं, साम्राज्यवाद-विरोधी थीं, युद्ध-विरोधी नारीवादी ऐक्टिविस्ट व विचारक थीं और हिंद-पाक अवामी दोस्ती की ज़बर्दस्त पैरोकार थीं। वह कट्टरवाद और कठमुल्लावाद की घोर विरोधी थीं।

पाकिस्तान की राज सत्ता का जब भी दमनकारी व जन-विरोधी चरित्र सामने आया, वह सड़क पर उतर कर उससे दो-दो हाथ करने के लिए बराबर तैयार रहती थीं। मदीहा गौहर ने साहित्य, कला व संस्कृति को गहरे सामाजिक-राजनीतिक सरोकार से जोड़ा। वह आजीवन वाम पक्षधर प्रगतिशील जीवन मूल्यों का परचम थामे रहीं। भगत सिंह और मंटो उनके नायक थे। उनके निधन से हमने अपनी एक सच्ची शुभचिंतक, अगुआ साथी, अग्रगामी संस्कृतिकर्मी खो दिया है।

 (लेखक वरिष्ठ कवि और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)


 








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