मुंबा नगरी के एक महल से संचालित हो रही है कागभुसुंडियों की दुनिया!

आड़ा-तिरछा , , बुधवार , 25-07-2018


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प्रभात डबराल

ये तो आप जानते ही हैं कि ब्रह्मा जी पिछले काफी समय से “कलियुग की महाभारत” लिखवाने को तत्पर हैं। लेकिन वेदव्यास हैं कि उनकी बात मान ही नहीं रहे। आपको याद होगा कि नारद जी कई बार बद्रीनाथ के निकट व्यास गुफा में गहन निद्रा में लीन व्यास जी तक ब्रह्मा जी का सन्देश लेकर गए लेकिन हर बार उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा।

व्यास जी की पीड़ा समझ में आती है। जब भी वो गुफा के द्वार से भीमशिला हटाकर बाहर निकलते हैं और इंद्रप्रस्थ की ओर नज़र दौड़ाते हैं तो हर बार उन्हें एक ऐसा नया नज़ारा दिखता है जो उन्हें भीतर तक झकझोर देता है। झल्लाकर वो नारद को वापस जाने का इशारा करते हैं और खुद व्यास गुफा में जाकर गहन निद्रा में लीन हो जाते हैं।

सुधी पाठकों, आपको तो पता ही है कि द्वापर की महाभारत के अंतिम अध्याय में महर्षि व्यास ने जोड़-तोड़ करके पांडवों को इंद्रप्रस्थ का राज सौंप दिया था और इस प्रकार देवताओं को प्रसन्न करने के बाद वो खुद हिमालय में बद्रीनाथ के निकट व्यास गुफा में विश्राम करने चले गए थे। उनकी निद्रा इतनी गहन थी कि उन्हें ये भी पता नहीं चला कि पांडव उनकी गुफा के सामने से होते हुए स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर चुके हैं। उनकी नींद तब भी नहीं खुली जब गुरुवर की नींद में व्यवधान न हो, ऐसा सोचकर भीम ने एक विशाल शिला गुफा के मुहाने पर रख दी थी। अपनी समझ से तो महाबली भीम ने ठीक ही किया, लेकिन ऐसा करके उन्होंने व्यास जी को इंद्रप्रस्थ से बिल्कुल ही काट दिया। अब इंद्रप्रस्थ का कोलाहल भी उन तक नहीं पहुंच पा रहा था।

इसीलिये हे पाठकों, ब्रह्मा जी के कहने पर जब नारद ने व्यास जी को उठाया और उन्होंने गुफा से बाहर निकलकर इंद्रप्रस्थ की ओर नज़र दौड़ाई तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। उन्हें पता ही नहीं था कि इंद्रप्रस्थ पर अब पांडवों की जगह महाबली दुर्योधन का राज है- वो दुर्योधन जिनमें हज़ार अश्वों की शक्ति है, सैकड़ों ब्राह्मणों की बुद्धि है, द्यूत- कला में पारंगत हैं, लेकिन जो शकुनि के मायाजाल को नहीं तोड़ पा रहे हैं। यहां तक तो फिर भी ठीक था।

अंबानी और मोदी।

हद तो तब हुयी जब नारद ने व्यास जी को बतलाया कि अब महाबली दुर्योधन और कौरवों को सही सलाह देने के लिए न तो गंगापुत्र भीष्म उपलब्ध हैं, न विदुर, न द्रोणाचार्य और न कृपाचार्य। क्यों...ये सब कहां गए, व्यास जी ने अचकचाकर पूछा था, जवाब में नारद ने उन्हें जो बताया उसने रही सही कसर पूरी कर दी थी। ये सुनकर तो व्यास जी का कलेजा मुंह को आ गया था कि गंगापुत्र भीष्म अभी भी मृत्युशय्या पर हैं....और जब नारद ने ये कहा कि विदुर, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य आदि को मार्गदर्शक मंडल में भेज दिया गया है जो लाखागृह से भी ज्यादा खतरनाक है, तो व्यास जी समझ गए कि किसी ने उनकी द्वापर वाली महाभारत का अंतिम अध्याय नए सिरे से लिख दिया है।

“अनर्थ”....“घोर अनर्थ”...व्यास जी ने धीरे से कहा और आंखें बंद कर ली। व्यास जी की पीड़ा नारद से देखी नहीं जा रही थी। नारद आदि पत्रकार थे, सलाह देना अपना नैसर्गिक अधिकार मानते थे। “मुनिवर इतना निराश होंगे तो काम कैसे चलेगा”,नारद ने कहा। व्यास जी ने नज़रे उठाकर कातर दृष्टि से नारद की ओर देखा तो नारद की बांछें खिल गयीं....देखा, इन्हें मेरी सलाह की ज़रुरत पड़ ही गयी, नारद के भीतर का पत्रकार बल्लियों उछलने लगा था....“गुरुवर आप कागभुसुण्डी को क्यों नहीं बुला लेते।” नारद की इस सलाह ने व्यास जी को सोचने पर मज़बूर कर दिया।

पाठकों, आप तो जानते ही हो खगराज कागभुसुंडी ने त्रेता युग में रामायण की घटनाओं का विवरण तब दे दिया था जब वो घटित भी नहीं हुई थी। “नारद कितने ही चतुर सुजान पत्रकार क्यों न हों ये चमत्कार उनके बस का नहीं है...जो हुआ ही नहीं, वो कैसे हुआ ये तो सिर्फ कागभुसुंडी ही बता सकता है”, व्यास जी ने सोचा। उन्हे क्या पता था कि कलियुग में, खासकर इंद्रप्रस्थ के संचार तंत्र में कागभुसुंडी कण-कण में व्याप्त हैं, जो आपको सुबह शाम वो सब होता हुआ बताते रहते हैं जो न हुआ है, न हो सकता है। व्यास जी को तो ये भी नहीं मालूम था कि कागभुसुंडियों की दुनिया के सारे सूत्र अब पश्चिम में मुम्बा नगरी के एक महल से संचालित होते हैं....वो महल, जिसका नाम है -एंटालिया....।

(वरिष्ठ पत्रकार प्रभात डबराल सहारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संस्थापक संपादक रहे हैं। बाद में आप ने उत्तराखंड के सूचना अधिकारी की जिम्मेदारी भी संभाली।) 

 








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