“ब्राह्मण धर्म के लिए शुद्रातिशूद्र और स्त्रियां एक ही श्रेणी में आती हैं”

जयंती पर विशेष , , बुधवार , 11-04-2018


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संजय जोठे

आज राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले का जन्म दिवस है। आइये उन्हें नमन करें और एक सभ्य, समर्थ बहुजन भारत के निर्माण के उनके सपने को साकार करने का संकल्प लें।

ज्योतिबा फुले ओबीसी जातियो से आते हैं और तत्कालीन महाराष्ट्र में इन्हें अछूत माना जाता था।

महात्मा फुले के विचार। साभार

 

फुले ने जब भारतीय धर्म और संस्कृति का पोस्टमार्टम किया तो दो बातें जोर देकर कहीं। पहली ये कि भारत के ब्राह्मण धर्म के लिए शुद्रातिशूद्र (OBC-SC-ST) और स्त्रियां एक ही श्रेणी में आती हैं।

और दूसरी बात ये कि इस मुल्क की नैतिकता और न्यायबोध बदलाव और सुधार के खिलाफ रचा गया षड्यंत्र मात्र है।

 

इन दोनों बातों से भारत के गरीबों और पिछड़ों सहित शूद्रों और स्त्रियों को अपनी मुक्ति का मार्ग "सिद्धान्त" में मिल जाता है। इस पर अमल किया जाए तो मुक्ति संभव है।

लेकिन राजनीतिक रणनीति में इस सिद्धांत को लागू करना कठिन रहा है। कारण ये कि शुद्रातिशूद्र और स्त्रियां स्वयं उस धर्म और ईश्वर को अपने सर पर उठाये घूमते हैं जिसे उनके खिलाफ रचा गया है।

महात्मा फुले के विचार। साभार

 

मतलब अगर बीमार आदमी खुद अपनी बीमारी की पूजा करता है तो इलाज कठिन हो ही जाएगा। इसीलिये भारत के शुद्र, दलित और स्त्रियां अभी भी पीड़ित हैं।

इसीलिये राजनीतिक रणनीति की विवशता के कारण वर्ण या लिंग की अस्मिता की बजाय जाति की अस्मिता उभरी।

ऐसे में ज्योतिबा, अंबेडकर या लोहिया द्वारा कल्पित वर्ण संघर्ष नहीं हुआ बल्कि कांशीराम कल्पित जातीय संघर्ष हुआ।

इसीलिये जातीय अस्मिताएं मजबूत हुई और जाति व्यवस्था सहित जातीय दूरियां भी मजबूत हुईं।

इसने भारतीय दक्षिणपंथ (BJP RSS) को और मजबूत किया और ध्रुवीकरण किया। नतीजा आपके सामने है।

 

ज्योतिबा या अंबेडकर के विश्लेषण में "सिद्धांततः" जो संभव और अपेक्षित है/था वह राजनितिक अमल में आ नहीं सका।

लेकिन अब समय है कि ज्योतिबा और अंबेडकर द्वारा सुझाये विश्लेषण को "वर्ण संघर्ष" का आधार बनाया जाये।

वर्ण संघर्ष की अनिवार्य शर्त के रूप में जातीय अस्मिताओं का एक दूसरे के नजदीक आना अभिप्रेत है। तभी "शुद्रातिशूद्र" एक इकाई की तरह उभर सकेंगे।

महात्मा फुले के विचार। साभार

 

(लेखक संजय जोठे सामाजिक कार्यकर्ता हैं और विभिन्न विषयों पर लंबे समय से बेबाक लेखन कर रहे हैं।)








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