कहीं गुम न जाएं असली गांधी

हमारा समाज , , शुक्रवार , 03-08-2018


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डॉ. राजू पाण्डेय

इस बात की कल्पना ही की जा सकती है कि जब प्रधानमंत्री ने उद्योगपतियों के साथ अपने संबंधों की पवित्रता को रेखांकित करने के लिए महात्मा गांधी से स्वयं की तुलना की तो अपनी अंतरात्मा में उन्हें किसी तरह की दुविधा अथवा संकोच का अनुभव हुआ होगा अथवा नहीं। प्रधानमंत्री जी जिस वैचारिक पृष्ठभूमि से आते हैं उसे गांधी से सहमत होने के लिए उनका एक पृथक पाठ तैयार करना पड़ता है। भारतीय राजनीति में गांधी से असहमत होना अलोकप्रिय बना सकता है इसलिए अपने मनोनुकूल गांधी बनाकर उसकी पूजा प्रारम्भ कर दी जाती है। कट्टर सनातनी हिन्दू और धर्म सुधारक गांधी के बाद हमने स्वच्छाग्रही गांधी को अवतरित होते देखा- गांधी के उपर्युक्त दोनों अवतार वास्तविक गांधी से शायद क्षीण सी संगति रखते होंगे किन्तु गांधी का यह नवीनतम कॉरपोरेट अवतार तो गांधी और उनकी विचारधारा पर व्यंग्य कसता और उन्हें मुंह चिढ़ाता सा लगता है।

यदि हम गांधी से खुल्लमखुल्ला असहमत होने का साहस जुटा पाते तो शायद जो विमर्श प्रारम्भ होता वह गांधीवाद की शक्तियों और सीमाओं को अधिक सार्थक रूप में उजागर करता और हम गांधी का अधिक लाभ ले पाते। किन्तु स्वन्त्रता के बाद से ही गांधी की विचारधारा को दरकिनार करने के लिए और विशेषकर उनके आर्थिक दर्शन को खारिज करने के लिए हमने उन्हें अलौकिक संत बना दिया और उनकी पूजा का स्वांग भरने लगे।

हेनरी डेविड थोरो से प्रभावितस्वविवेक को सबसे बड़ा कानून मानने वालेव्यवस्था विरोधी सत्याग्रही गांधी का हमने शासकीयकरण कर दिया। अपरिग्रह के सिद्धांत को अपने आचरण द्वारा साकार करने वाले अनावश्यक संचय के घोर विरोधी गांधी की तस्वीर हमने नोटों पर लगा दी। आजादी के बाद से ही गांधी और उनके आर्थिक-राजनीतिक दर्शन को पूर्णतः दरकिनार करते हुए उन्हें स्मारकों में कैद प्रतिमाओं में तब्दील करने में ठंडी नृशंसता दिखाई गई है। आज भी बढ़ती आर्थिक असमानता,जातिगत विद्वेष और कट्टरता के इस दौर में गांधी अपने विचारों के माध्यम से इन पश्चगामी प्रवृत्तियों का सशक्त प्रतिरोध करते दिखाई देते हैं और उन्हें पराजित किए बिना विभेदकारी शक्तियां अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो सकतीं। यही कारण है कि गांधी का भ्रम पैदा करने वाले चमकीले और भड़कीले किंतु आभासी और अयथार्थ वैचारिक प्रतिरूपों की एक पूरी श्रृंखला हमारे सम्मुख उपस्थित की जा रही है जिससे वास्तविक गांधी लोगों की स्मृति से विलुप्त हो जाएं और इन प्रतिरूपों को ही वास्तविक मान लिया जाए।

महात्मा गांधी और घनश्याम दास बिड़ला की निकटता न तो महात्मा गांधी के आर्थिक दर्शन और औद्योगीकरण के संबंध में उनके विचारों को आच्छादित कर महत्वहीन बनाती है न ही आज के मुनाफा केंद्रित अविचारित औद्योगीकरण तथा भ्रष्ट कॉरपोरेट- राजनीतिज्ञ गठजोड़ को न्यायोचित सिद्ध करती  है। गांधी और बिड़ला के मध्य हुआ पत्राचार (जो बिड़ला द्वारा बापू: अ यूनिक एसोसिएशन” शीर्षक से चार खंडों में प्रकाशित कराया गया है) दर्शाता है कि दोनों के मध्य अनेक बिंदुओं पर गहरे मतभेद थे इसके बाद भी इनका पारस्परिक प्रगाढ़ संबंध बना रहा। यदि गांधी बिड़ला को ट्रस्टीशिप के अपने सिद्धांत का संपूर्ण समर्थक बनाने में असफल रहे तो बिड़ला भी उद्योगों और पूंजीपतियों के संबंध में गांधी जी की राय को बदल न सके।

प्रधानमंत्री जी ने उत्तर प्रदेश में 60 हजार 228 करोड़ रुपए की 81 परियोजनाओं का शिलान्यास किया। देश के चोटी के कॉरपोरेट घराने अब उत्तर प्रदेश में निवेश कर रहे हैं। दावा किया गया कि लगने वाले उद्योग उत्तरप्रदेश के लाख लोगों को रोजगार प्रदान करेंगे। क्या गांधी का आर्थिक दर्शन आज के कॉरपोरेटीकरण से संगति रखता हैशायद नहीं।

गांधी जी ने बड़ी स्पष्टता यह महसूस कर लिया था कि अपने तत्कालीन स्वरूप में औद्योगीकरण उपनिवेशवाद के प्रसार का माध्यम बनेगा। उनके अनुसार- मुझे भय है कि औद्योगीकरण मनुष्य जाति के लिए अभिशाप बन जाएगा। एक देश के द्वारा दूसरे देश का शोषण हमेशा नहीं चल सकता। औद्योगीकरण पूर्णतः आपकी शोषण करने की क्षमता पर निर्भर करता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि विदेशी बाजार आपके लिए खुले रहें और आपका कोई प्रतिद्वंद्वी न हो।     

 (यंग इंडिया, 12-11-1931, पृष्ठ 355) 

गांधी जी के अनुसार-

मैं मनुष्य के आर्थिक और नैतिक जीवन के मध्य कोई स्पष्ट - या कहूं किसी भी प्रकार का ही -विभेद नहीं कर पाता हूं। वह आर्थिक दर्शन जो एक देश को दूसरे देश का शोषण करने की अनुमति देता है मेरी दृष्टि में अनीतिपूर्ण है। अमेरिकन गेहूं का उपभोग कर अपने पड़ोसी अनाज के व्यापारी को ग्राहकों के अभाव में भूखों मरने देना अनीतिपूर्ण है। इसी प्रकार मेरे लिए रीजेंट स्ट्रीट के नवीनतम वस्त्र धारण करना तब अनीतिपूर्ण है जब मुझे पता है कि यदि मैंने अपने निकट के बुनकर के द्वारा निर्मित वस्त्र पहने होते तो न केवल मेरा तन ढंकता बल्कि उसका भी तन ढंकताउसे भी भोजन मिलता।                                         (कम्पलीट वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी, 21:290)

गांधी जी के अनुसार -

आर्थिक मनुष्य’ हो ही नहीं सकताहोगा तो केवल नैतिक मनुष्य’ ही। वे मानते थे कि पूंजीवाद और मार्क्सवाद दोनों हिंसा पर आधारित हैंइसलिए अस्वीकार्य हैं। उनके अनुसार केंद्रीकरण आर्थिक हिंसा को जन्म देता है इसीलिए वे विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था के समर्थक थे।

(कम्पलीट वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी,  75:216)

गांधी जी का ट्रस्टीशिप का सिद्धांत इसी अहिंसक आर्थिक दर्शन का एक विस्तार था। उनके अनुसार- आप अपने करोड़ों रुपए नैतिक तरीकों से अर्जित करें किंतु स्मरण रखें कि आपकी यह संपत्ति आपकी नहीं है बल्कि यह जनता की है। अपनी न्यायोचित जरूरतों के लिए जितना आवश्यक है वह रख लें और शेष का उपयोग समाज के लिए करें। गांधी जी का मानना था कि आध्यात्मिक धरातल पर समाज सेवा और मानव सेवा के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति का लक्ष्य तभी सिद्ध हो सकता है जब हम स्वत्व का त्याग करें और जो कुछ है उसे ईश्वर का दिया हुआ समझें। सामाजिक धरातल पर भी हमारी संपत्ति हमारी नहीं है क्योंकि इसका अर्जन लाखों निर्धन श्रमिकों के सहयोग के बिना असम्भव था। गांधी पश्चिम के समता के सिद्धांत को आध्यात्मिक स्तर पर संभव बनाना चाहते थे।

किंतु आर्थिक समानता लाने के लिए उनकी व्यग्रता इतनी अधिक थी कि वे धनिकों और पूंजीपतियों के हृदय परिवर्तन की अनंत काल तक प्रतीक्षा करने के पक्ष में नहीं थेयद्यपि यह उनके अनुसार आदर्श स्थिति होती। वे लिखते हैं-

मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी यदि सम्बंधित लोग ट्रस्टी की तरह व्यवहार करें किंतु यदि वे ऐसा नहीं करते तो हमें उन्हें राज्य के हस्तक्षेप के द्वारा न्यूनतम हिंसा का प्रयोग करते हुए उनकी संपत्तियों से वंचित करना होगा।

( कंपलीट वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी, 59:319)

मशीनीकरण के विरोध के गांधी जी के अपने कारण थे। वे लिखते हैं 

आज मशीनों के उपयोग के प्रति लोगों में दीवानगी है वे इन्हें लोगों की मेहनत बचाने में मददगार बताते हैं। कुछ लोग तब तक श्रम की बचत करते रहते हैं जब तक हजारों लोग बेरोजगार नहीं हो जातेसड़कों पर नहीं आ जाते और भूख से तड़प कर मरने नहीं लगते। मैं भी समय और श्रम की बचत करना चाहता हूं किन्तु मानव जाति के किसी विशेष भाग के लिए नहीं बल्कि समूची मानव जाति के लिए। मैं चाहता हूं कि दौलत इकट्ठा हो लेकिन चन्द हाथों में नहीं बल्कि हर व्यक्ति के पास सम्पन्नता आए। आज मशीनें लाखों लोगों पर चन्द लोगों का शासन स्थापित करने का जरिया बन गई हैं। मशीनीकरण की हिमायत के पीछे लोकोपकार की भावना नहीं है अपितु लालच इसके मूल में है।

(कम्पलीट वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी, 25:251) 

गांधी जी के कुछ विशिष्ट आर्थिक सिद्धांत थे। उनके अनुसार उत्पादन मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुसार हो न कि मुनाफा कमाने के लिए। प्रकृति में इतनी सामर्थ्य है कि वह मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति सदैव कर सकती है किंतु मनुष्य के लालच के सम्मुख प्रकृति का विपुल भंडार भी थोड़ा है। मनुष्य और प्रकृति के मध्य संघर्ष की अवधारणा गलत है। मनुष्य प्रकृति का एक भाग है। जब उत्पादन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु होगा तथा मानव और प्रकृति के मध्य संघर्ष न रहेगा तो अपने आप पर्यावरण और प्रकृति का संरक्षण होने लगेगा। मुनाफे के लालच में विपुल उत्पादन करने की होड़ में मनुष्य प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर उसे नष्ट करने पर आमादा है और इस प्रकार वह खुद को मिटाने पर तुला हुआ है। सहकारितालघु और कुटीर उद्योगों को केंद्रीय स्थान देना तथा कृषिकिसान और ग्राम की उन्नति में देश की उन्नति देखना बापू के आर्थिक दर्शन के मूलाधार थे।

आज दशकों बाद भी औद्योगिक विकास और पूंजीवाद को लेकर गांधी जी की आपत्तियां और आशंकाएं प्रासंगिक बनी हुई हैं। उपनिवेशवाद का स्थान नव उपनिवेशवाद ने ले लिया है। अब प्रत्यक्ष नियंत्रण और सैन्य हस्तक्षेप का स्थान अप्रत्यक्ष नियंत्रण ने ले लिया है। विश्व बैंकविश्व मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संघ जैसी संस्थाएं अस्तित्व में आ गई हैं जो अर्थव्यवस्थाओं को शक्तिशाली देशों के हित में नियंत्रित कर रही हैं। अनेक देशों की अर्थव्यवस्था से भी विशाल आर्थिक संपदा रखने वाले कॉर्पोरेट्स का अभ्युदय हो गया है। लेकिन शोषण का स्वरूप जस का तस है।

विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर उनके प्राकृतिक संसाधनों की लूट खसोट करते हुए मुनाफा कमाने की होड़ जारी है। यह सब इन देशों के आर्थिक विकास के नाम परइनके निवासियों को संपन्न बनाने और उन्हें रोजगार प्रदान करने के नाम पर किया जा रहा है। यदि इन देशों में आर्थिक विकास हो भी रहा है तो इसका लाभ जरूरतमंदों तक पहुंच नहीं पाता है। निर्धन और निर्धन हुए हैं। धनिक और अधिक धनवान बने हैं। संपदा का केंद्रीकरण उंगलियों पर गिने जा सकने वाले लोगों के पास हुआ है। भूखगरीबीबेकारीबीमारीअशिक्षाकुपोषण जैसी समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं। प्रदूषण और पर्यावरण असंतुलन जैसी कुछ नई समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। उपभोक्तावादी संस्कृति अपने चरम पर है। अभी भी मंदी से निपटने विकसित देश नए बाजार तलाश रहे हैं। अभी भी औद्योगिक विकास के मूल में मुनाफा कमाने की दुर्दमनीय लालसा है। अभी भी कहा जा रहा है कि इस विकास से संपन्नता आएगीरोजगार बढ़ेगा।

इन दावों को सत्य सिद्ध करने के लिए अर्थशास्त्रियों और मीडिया समूहों की एक पूरी फौज लगी हुई है जो इतनी दक्षता से अपना कार्य कर रही है कि वंचित और शोषित भी इस भ्रम में हैं कि वे विकसित हो रहे हैं। इस विकास को लाने की हड़बड़ी में सारे नियम कानूनों को ताक में रखकर अपने चहेते उद्योगपतियों को मौके दिए जा रहे हैं। उनकी खुशामद की जा रही है। दलों की सीमाएं टूट रही हैं। क्या यह दल और क्या वह दल- कॉर्पोरेट घरानों की देशभक्ति पर सब एकमत हैं। रोचकता बनाए रखने के लिए समय समय पर भ्रष्टाचार के मामले भी उजागर हो रहे हैं। इन मामलों में जो आरोप लगाए जाते हैं वे प्रायः सिद्ध नहीं हो पाते। यदि सिद्ध हो जाते हैं और निचली अदालत से सजा भी हो जाती है तब भी कई बार ऊपरी अदालत फैसला पलट देती है। कोई कहता है भ्रष्टाचार जैसी कोई बात नहीं है यह सब राजनीतिक शत्रुता का नतीजा है। कोई कहता है कि मीडिया क्या इन मामलों का खुलासा करता वह तो प्रतिद्वंद्वी कॉर्पोरेट घराने ने थाली में रखकर सारे तथ्य पेश कर दिए और खबर चलाने का इनाम भी दिया। भ्रष्टाचार के आरोपी भाग जाते हैं या भगा दिए जाते हैं। चाहे वे अपने अंजाम से डरकर भागे हों या सत्ताधीशों ने अपनी पोल खुलने के डर से उन्हें भगा दिया हो- हैं तो वे आजाद। सत्ता पक्ष और विपक्ष में यह बहस चल रही है कि किसके कार्यकाल में ज्यादा भ्रष्टाचार हुआ और किसके कार्यकाल में भ्रष्टाचारियों पर कड़ी कार्रवाई हुई। जनता अचंभित है। वह मूर्तिवत खड़ी है। वैसे ही जैसे किसी भव्य स्मारक में लगी गांधी की प्रतिमा अपने कॉर्पोरेट परस्त बहुरूप को देखकर स्तब्ध है। 

           (डॉ. राजू पाण्डेय स्वतंत्र पत्रकार हैं और छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं।)








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