अगर बापू मार्क्स को चुनते तो यूं मोदी का खिलौना न बनते

आड़ा-तिरछा , , रविवार , 05-08-2018


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वीना

साहेब ने लखनऊ में कारोबारियों के एक सम्मेलन में अपने भाषण में महात्मा गांधी के बिरला परिवार से संबंधों का ज़िक्र करते हुए कहा था, “जब नीयत साफ़ हो और इरादे नेक हों तो किसी के भी साथ खड़े होने से दाग़ नहीं लगते। महात्मा गांधी जी का जीवन इतना पवित्र था कि उन्हें बिरला जी के परिवार के साथ जाकर रहने, बिरला जी के साथ खड़े होने में कभी संकोच नहीं हुआ।”

ये बात चारों दिशाओं में गूंजती हुई देश-विदेश हर जगह फैल चुकी है। तो भला गांधी जी तक कैसे न पहुंचती! गांधी जी ने जबसे सुना है उन्हें चैन नहीं। एक बार नरेन्द्र दामोदर भाई मोदी मिल जाए तो ख़बर लें उसकी। 

साहब इतने पहरे में रहते हैं कि महात्मा गांधी देखकर दंग हैं। इतनी मुश्क़िल तो कभी उन्हें अंग्रेज़ वायसराय से मिलने में पेश नहीं आई जितनी नरेन्द्र मोदी को देखने भर के लिए उन्हें मशक्कत करनी पड़ रही है। मुलाक़ात तो ख़ैर बड़ा मसला है। 

एक बार सोचा अपने पुराने हथियार सत्याग्रह को आज़माएं। फिर याद आया इलाहाबाद में अमित शाह को काले झंडे दिखाने वाली छात्राओं का हश्र। कैसे बाल खींच-नोंच़ कर पूरी ताकत से डंडे बरसाए उन मासूम बच्चियों पर पुलिसवालों ने। इतनी निर्दयता तो अंग्रेज़ पुलिस ने नहीं दिखाई महिलाओं पर!

सत्याग्रह का इरादा छोड़ मोहनदास ने एक जुगत निकाली और वो किसी तरह मोदी की कार के पास छुप गए। ताकि जब मोदी आए तो वो उसे लपक लें। और कोई देख भी न पाए। बापू को ये भी डर था कि जब कोई वास्ता न होने से इतनी फ़जीहत करवा रहा है ये संघी अगर किसी ने साथ देख लिया तो मेरी सारी इज़्ज़त का खाकरा-पापड़ा बना कर हजम कर जाएगा! सो बापू ने अंधेरे में रहकर ही अरदास करना बेहतर समझा।

आखि़र लंबे इंतज़ार के बाद साहेब बापू की पकड़ में आ ही गए। जैसे ही साहेब कार में विराजमान होने को झुके गांधी जी सामने प्रकट हो गए। साहब एक पल को सकपकाए। फिर संभलकर बोले -

‘‘अरे बापू! केम छो? मजा मा छो? आप जैसा गुजराती भाई सबको मिले। पता है, मैं जहां भी फंसने लगता हूं आपके पीछे आकर छुप जाता हूं। बड़ो मज़ो आवे छे!’’ 

बापू नरेन्द्र के ठाठ-बाट देखने में ही अभी तक मशगूल हैं।

साहेब ने बापू को अपनी ओर आंख फाड़ कर देखते हुए देखा तो बापू का हाथ पकड़कर हंसकर बोले - ‘‘आईये गाड़ी में बैठिये। प्रधानमंत्री निवास चलकर आराम से बातें होंगी।’’ 

बापू ने हाथ छुड़ाते हुए कहा -

‘‘नहीं नरेन्द्र, मुझे ज़्यादा वक़्त नहीं चाहिये तुम्हारा। सुना है 16-16 घंटे काम करते हो!’’  

साहेब थोड़ा उल्हाना देते हुए बोले -

“क्या करूं बापू जी, आप जिन लोगों के हाथों में देश सौंप कर चले गए उन्होंने हाल ही ऐसा कर छोड़ा है देश का कि जागना ही पड़ता है।’’  

बापू अब भी साहेब को घूरे जा रहे हैं। साहब ने अपना कड़क कुर्ता ठीक करते हुए पूछा - ‘‘क्या देख रहे हो बापू?’’ 

बापू ने अपनी लाठी ठोकते हुए कहा - ‘‘देख रहा हूं चौकीदारों के बड़े ठाठ हैं आज़ाद भारत में!’’ 

‘‘हा...हा...हा...’’ साहेब ने ज़ोर का ठहाका लगाया और कहा -‘‘सब मां भारती का आशीर्वाद है बापू। बोलिये, वंदे मातरम...भारत माता की जय।’’ 

‘‘हूं... आशीर्वाद...मां भारती का या अंबानी-अडानी का?’’ बापू ने कड़ी आवाज़ में कहा।

‘‘ये आप क्या कह रहे हैं बापू!’’ साहेब ने हंसी और हैरानी के भाव से पूछा। 

“सरकारी ख़ज़ाना, धन-संपदा सब इन लोगों पर लुटा रहा है। और भोला बन कर कहता है क्या कह रहे हो बापू! अपनी इन सूट-बूट की तुच्छ लालसाओं से मेरी तुलना करता है। हां, बिरला का घर मेरा घर था। वो देता था मुझे आंदोलन के लिए मदद। पर मैंने देश के आदिवासियों-किसानों की ज़मीन-मेहनत हड़प कर बिरला का कर्ज़ नहीं चुकाया था। 

“बापू आप मेरी बात तो सुनिये...” साहेब ने समझाने की कोशिश की।

बापू बिना रुके गुस्से में बोले -

‘‘मेरे अंहिसा धर्म को बदनाम करने का हक़ तुम्हें किसने दिया? क्या मैं आदिवासियों उनके बच्चों-औरतों पर अत्याचार करके बिरला-टाटा को उनकी ज़मीने छीन कर दे रहा था। तुम नाम मेरा लेते हो और चाल हिटलर की चलते हो। तुम राम राज्य की बात करते हो। क्या मेरे राम के राज्य में किसान भूमिहीन थे। दिन-रात खून-पसीना बहाकर भी दो जून की रोटी को तरसते थे?  कर्ज़ के तले दबे आत्महत्या करते थे?  हां, मैंने गाय की रक्षा की बात की थी पर उसके लिए दलित-मुसलमानों के कत्ल?"

“पर बापू मैंने इन हत्याओं की निंदा की है। अब लोग नहीं मानते तो मैं क्या करू?”

‘‘प्रधानमंत्री पद छोड़ो और संन्यास ले लो। तुम्हारे लिए यही बेहतर है।’’ बापू ने लाठी ठोकते हुए सलाह दी। ‘‘गुजरात में तुम दंगे नहीं रोक पाए। देश में तुम लिंचिग नहीं रोक पा रहे। जहां तुम जाते हो समस्याएं अनेक खड़ी हो जाती हैं पर समाधान एक का नहीं तुम्हारे पास। और फिर भी सजे-धजे सीना फुलाए घूमते हो!”

‘‘बापू अगर आप थोड़ा शांत होकर ग़ौर करें तो मैं आपसे बाहर नहीं हूं।’’ दृढ़ आवाज़ में साहेब बोले। 

मेरा हत्यारा गोडसे तुम्हारे लिए पूजनीय है। और तुम मुझे बापू कहते हो! मेरी ढाल इस्तेमाल करने का क्या हक़ है तुम्हें बोलो? मेरे ट्रस्टीशिप सिद्धांत में पूंजीपतियों से दान लेने की बात कही गई थी। धनी लोगों को अपने पर कम से कम ख़र्च करके बाक़ी जनता पर ख़र्च करने का नैतिक दबाव बनाना तुम्हारा काम है। नाकि पुलिस-मिलिट्री का इस्तेमाल कर उनके लिए लूट मचाने का।“

“आप सचमुच मेरे ही बापू हैं। उन करोड़ों मासूम भारतवासियों के नहीं जो आपको राष्ट्रपिता-महात्मा मानते हैं। जो मानते हैं कि आपने उनकी सामाजिक और आर्थिक समानता के लिए अपनी जान दे दी।”

ये वही शासन व्यवस्था है जो आप चाहते थे। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि जिन बिरला-टाटा को आप नेहरू से तालमेल बैठाने बोल गए थे। उनके वंशजों को अब मोदी की दरकार है। नेहरू के समाजवाद से जो खींचना था आपके चहेतों ने खींच लिया। आज उन्हें अपने विकास के लिए मोदी के राष्ट्रवाद की ज़रूरत है। 

क्या हिटलर और मुसोलिनी से आप वाक़िफ नहीं थे। आप तो बहुत दूरदर्शी थे। क्या आप नहीं देख पाए कि एक दिन गोडसे के हमसायों की बारी आनी तय है। उस व्यवस्था में जिसे आप तय कर गए थे। 

“तो तुम कहना चाहते हो मेरा ट्रस्टीशिप का सिद्धान्त बोकस था?”

“धुएं के ग़ुबारों पर सपनों के महल तो खड़े किए जा सकते हैं महात्मा, पर असली घर जो धूप-बारिश, समय के थपेड़ों से बचाते हैं उनकी नींव नहीं रखी जा सकती।

अगर ये धनपशु आपकी नैतिकता की पराकाष्ठा को पार कर आपके स्वर्ग के साथी न बनना चाहे तो? इन्हें अपने एंटिलिया में यहीं, पृथ्वी पर स्वर्ग बनाने की ज़िद हो तो? अब एंटिलिया और हिंदू राष्ट्र को एक-दूसरे से मोहब्बत है।

तो अब गांधी एक मखौल के सिवा कुछ भी नहीं। मैं सिर्फ़ एक ऐसा परदा हूं जिससे तुम अपने और आकाओं के कुकर्मों को ढक सको।” गांधी ने साहब पर नज़र गढ़ाकर पूछा। 

“अगर आप अपने सत्य-अहिंसा के कथन को स्वयं समझते तो आप ‘ट्रस्टीशिप’ को समाज में आर्थिक बराबरी लाने वाला अहिंसक सिद्धांत न बताते। आप रूसों, जॉन रस्किन के पीछे भागकर ये मूर्खतापूर्ण विचार घर न लाते कि चूंकी प्रकृति पर सबका अधिकार है। इसलिये ज़मीन-जायदाद-मशीनों-कारखानों के मालिकों को आपके ट्रस्टीशिप के नैतिक विचार को स्वर्ग का रास्ता समझकर आपकी तरह लंगोटी में गुज़ारा करना चाहिये अैर अपने कब्ज़े की धन-दौलत-ताकत, खुशी-खुशी बाकियों में बांट देनी चाहिये।”

“सबकी बेहतरी के लिए ये अहिंसा का बेहतरीन रास्ता था।” बापू ने बेचैन होते हुए कहा।

“मुझे यक़ीन नहीं होता बापू कि आप इतने बेवकूफ थे कि आप ये न समझ पाएं कि टाटा-बिरला की ट्रस्टीशिप रोज़ असंख्य लोगों पर की जाने वाली हिंसा के बिना संभव नहीं है। 

क्या आप इतने बेवकूफ थे कि ये न समझ सकें कि हिंसा मशीनें नहीं करती बल्कि मशीनों पर कब्ज़ा करने वाले मालिकों की हवस का परिणाम है हिंसा । 

मैं नहीं समझ पाता कि आप ये न समझ पाए हों कि जिस सामाजिक-आर्थिक ऊंच-नीच को ख़त्म करने की बात आप कर रहे हैं वो केवल मार्क्स के समाजवादी विचार द्वारा ही संभव है। जहां पृथ्वी पर मौजूद सभी संसाधनों के मालिक सभी होंगे दो-चार-दस गिने-चुने लोग नहीं। और समाजवाद के लिए एकबार की जाने वाली हिंसा बरसों तक अहिंसा और बराबरी का सुख देकर जाएगी।”

अगर आप मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए सही मायने में ईमानदार होते तो आप मार्क्स को चुनते, समाजवाद को चुनते, भगतसिंह को चुनते। और हो सकता है, अगर आप ऐसा करते तो मैं भी संघी न होता। अंबानी-अडानी का आश्रित भी न होता। शायद... सचमुच, भगतसिंह मेरा नायक होता।

आपने कभी मज़दूरों का साथ नहीं दिया। हमेशा उनके हक़ को मालिक की दया का सामान बना कर छोड़ दिया। आप हमेशा उन मालिकों के साथ खड़े रहे जो आपको चंदा देते थे। आज मै उनके साथ खड़ा हूं जो मेरी पार्टी को चंदा देकर मुझे राजगद्दी सौंप रहे हैं। तो आपको या किसी और को एतराज क्यों है? क्या सिर्फ इसलिए कि आप बिरला हाउस की चाबी अपनी लंगोटी में टांगते थे और मैं अंबानी के सिलाए मेरे नाम के सोने के तार जड़े सूट में टांगता हूं!

वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाने रे...यही गाते थे न आप बापू...किसके लिए..?

आपको फिर जनमना होगा बापू। सही मायने में सत्य-अहिंसा के प्रयोग सफल करने के लिए आपको फिर जनमना होगा। 

(वीना फिल्मकार एवं पत्रकार हैं।)








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