जनसंघर्षों की धौंकनी में तप कर निकले थे कामरेड महेंद्र सिंह

स्मृति , , बुधवार , 16-01-2019


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मनोज भक्त

आज कॉ महेंद्र सिंह का पंद्रहवां शहादत दिवस है। उनकी शहादत के बाद हर 16 जनवरी को बगोदर (झारखंड) में क्रांतिकारी कतारों की एक बड़ी जुटान होती है। इस दिन हिलोरें लेती जन-लहरें आने वाले समय का थर्मामीटर पढ़ती हैं। कॉ महेंद्र सिंह का शहादत दिवस एक महान जनयोद्धा को याद करना भर नहीं है। यह अपनी ताकत आंकने भर का भी दिन नहीं है। यह जन समुदाय के लिए दमनकारी सत्ता के खिलाफ ताकत इकट्ठा करने का दिन है। इस सत्ता के खिलाफ युद्ध को आवेग देने का दिन है। झारखंड में सिद्धू-कानू और बिरसा किसी मृत महान व्यक्ति का नाम नहीं हैं या चमत्कारिक अवतार नहीं हैं। उनकी स्मृतियां केवल बरसियों के रूप में महफूज नहीं हैं। वे संघर्षशील जनचेतना का अमिट हिस्सा बन गयी हैं।

कॉ महेंद्र सिंह ऐसे ही शहीद नायकों में हैं जो जनता को जीत का हौसला देते हैं और अंधेरे समयों के लिए रोशनी देते हैं। मोदी सरकार की फासीवादी अंधेरगर्दी और आसन्न चुनावी महासमर ने उनके पंद्रहवें शहादत दिवस को खास बना दिया है। आज झारखंड में पारा-शिक्षकों और अनुबंधकर्मियों के आंदोलनों का रघुवर सरकार हिंसक दमन कर रही है. भुखमरी राज्य के कोने-कोने में पसर गयी है। किसानों से बिना मुआवजा जमीन छीनी जा रही है। ऐसे समय में कॉ. महेंद्र सिंह को याद करना नई लड़ाइयों के लिए संगठित होना है।

कोडरमा लोकसभा क्षेत्र में भाकपा माले पिछले चुनाव में भाजपा को चुनौती देने वाली सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरी है। गिरिडीह, कोडरमा और हजारीबाग जिलों को मिलाकर बने इस लोकसभा क्षेत्र में भाकपा माले ने भाजपा को तीन विधानसभा क्षेत्रों में पीछे धकेल दिया था। इसके पहले झाविमो नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी सांसद थे। भाकपा माले के लगातार संघर्षों से बेनकाब श्री बाबूलाल मरांडी इस क्षेत्र से खुद चुनाव लड़ने की हिम्मत भी नहीं जुटा नहीं पाये थे। बाबूलाल जी का भाजपा प्रेम इस कदर उजागर है कि वे गत चुनावों में दो-दो क्षेत्रों से विधान सभा चुनावों में बुरी तरह से पराजित भी हुए।

बाबूलाल मरांडी भाजपा की सहूलियत के लिए इस लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ भाकपा माले की सीधी लड़ाई में उतरकर भ्रम तैयार करने की कोशिश कर सकते हैं। कॉ महेंद्र सिंह ने झारखंड अलग होने के बाद इस लोकसभा क्षेत्र में जनसंघर्षों का विस्तार किया था और 2004 लोकसभा चुनाव में भाकपा माले यहां तीसरी ताकत के बतौर उभरी थी। लोकसभा चुनाव में कोडरमा में लाल झंडा फहराने से बड़ी श्रद्धांजलि संघर्षशील कतारों की ओर से कॉ महेंद्र सिंह को क्या सकती है! 

भाजपा को परास्त करने और जनसंघर्षों की आवाज को संसद के भीतर ले जाने की दोहरी चुनौती भाकपा माले के सामने है। कॉ. महेंद्र सिंह का 15वां शहादत दिवस झारखंड की लोकतांत्रिक और वामपंथी कतारों के इस दोहरे कार्यभार को पूरा करने के संकल्प को और मजबूत करेगा। कॉ महेंद्र सिंह ने एक जनप्रतिनिधि के बतौर अपने को महज कुछेक नैतिक मापदंडों के भीतर सीमित नहीं रखा। सदन में उनके वक्तव्य और कार्रवाइयां बिहार-झारखंड के आम लोगों की आकांक्षाओं और प्रतिवादों को प्रतिबिंबित करती थीं।

उन्होंने बाबूलाल मरांडी सरकार की खूनी कार्रवाइयों के खिलाफ सड़क पर व्यापक प्रतिरोध तैयार किया- तपकरा से मरकच्चो और डोरंडा से लेवाटांड़ तक उन्होंने मरांडी सरकार के संरक्षण में बिजली, जमीन, खनिज आदि मामलों में टाटा-बिड़ला की हेराफेरी को भी उजागर किया। आज रघुवर से मोदी तक ने नग्न होकर अंबानी-अडानी के दलालों के रूप में राज्य और केंद्र सरकार को पतित कर दिया है। ऐसे वक्त में कोडरमा क्षेत्र में जीत की संभावना को सच में तब्दील कर देना ही शायद कॉ महेंद्र सिंह की कार्ययोजना का भी निर्णायक हिस्सा होता!

बगोदर विधान सभा क्षेत्र से कॉ महेंद्र सिंह 15 वर्षों तक लगातार विधायक रहे। उस प्रिविलेज्ड पोलिटिकल क्लास का हिस्सा होकर भी उन्होंने उसके खोखलेपन और पतन का लगातार पर्दाफाश किया। विधान सभा में विधान सभा समितियों और विधायकों के दौरों के फर्जीवाड़े को उन्होंने बिहार विधान सभा में बेनकाब किया। विधानसभा समितियों और विधानसभा मंचों का उन्होंने जनसमस्याओं को सुलझाने में इस्तेमाल किया। कॉ महेंद्र सिंह की उठी हुई उंगली मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और अधिकारियों को कठघरे में खड़ा कर देती थीं। आज विधायिका में बेदाग होना अपवाद है। देश का प्रधानमंत्री राफेल घोटाला और बैंक घोटालों में लिप्त है। मुख्यमंत्री राशन घोटाले में लिप्त है। कॉ महेंद्र सिंह की प्रेरणा जनप्रतिबद्धता को मजबूत करने और सदनों के चक्रव्यूह को तोड़ने में ईमानदार जनप्रतिनिधियों की मददगार होगी।

कॉ महेंद्र सिंह की शख्सियत की बुनियाद थी जनसंघर्षों का निरंतर और गतिशील प्रयोग। वे उस दौर में जवान हुए जब आजादी के बाद की पीढ़ी जवान हो चुकी थी और सड़कों पर नक्सलबाड़ी की लाल धमक भारत में पसर रही थी। आपातकाल के खिलाफ विद्रोह बदलाव पर उतारू था। झारखंड में दिकुओं के शोषण के खिलाफ आदिवासियों ने एकबार फिर डुगडुगी बजा दी थी। कॉ महेंद्र सिंह अध्यात्म से लेकर बस कंडक्टरी, होटल में काम करने जैसे कठिन-कटु अनुभवों को लिये ‘राख से खड़ी हो रही’ भाकपा माले से जुड़े। वे जनता से गहराई से जुड़े थे। वर्ग-संघर्ष के बारे में उनकी समझ स्पष्ट थी। वे नयी चीजों को सीखने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। साहित्य में उनकी गहरी रूचि थी। वे कानून की बारीकियों का अध्ययन करते थे। और, अपने तमाम अध्ययनों के जरिये वे जमीनी संघर्षों को समृद्ध करते थे।

राजनीतिक जीवन की शुरूआत में ही कॉ महेंद्र सिंह को पास के ही गांव के एक जमींदार की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा हो गयी थी। हो सकता था, उनका राजनीतिक सफर यहीं समाप्त हो जाता। लेकिन नहीं, उन्होंने जेल को भी लोकतंत्र की लड़ाई का अखाड़ा बना दिया। बाद में पटना हाईकोर्ट के रांची बेंच ने हत्या के झूठे आरोप से उन्हें बरी करते हुए कहा कि गरीबों की लड़ाई लड़ने वाले को झूठे आरोप में जानबूझ कर फंसाया गया है। दामा में दुराचार की कोशिश कर रहे अपराधी को दो महिलाओं ने जला कर मार दिया था। इस हत्या के बहाने पुलिस ने उस पूरे इलाके को पुलिस की छावनी में बदल दिया था। कॉ महेंद्र सिंह ने इसके खिलाफ जुझारू संघर्ष कर सरकार को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया।

राजवंशी दारोगा और पूरे थाने का जन-बहिष्कार के जरिये पुलिस को अपने गलत आचरण के लिए माफी मांगनी पड़ी थी। लंबे अरसे तक पंचायत चुनाव नहीं कराये जाने के खिलाफ उन्होंने जनता के जरिये पंचायत सभा के गठन को एक बड़े जनआंदोलन का रूप दे दिया। मरकच्चो गोलीकांड, तपकरा गोलीकांड, घुटुआ गोलीकांड आदि के खिलाफ जनांदोलनों के बूते सरकारों को उन्होंने घुटनों पर बिठा दिया और जनता ने जीत हासिल की। जनता के डर और साहस से महेंद्र सिंह वाकिफ थे। जनता पर अटूट भरोसे और साहसिक जनपहलकदमियों ने महेंद्र सिंह को जननायक में तब्दील कर दिया। आज जब देश और झारखंड को भाजपा ने भूख, झूठ और कॉरपोरेट लूट का प्रयोगशाला बना दिया है, फासीवाद को परास्त करने के लिए महेंद्र सिंह का रास्ता- जनसंघर्ष ही निर्णायक रास्ता है।

भाजपानीत बाबूलाल मरांडी सरकार के समय से ही झारखंड को पुलिस राज्य में तब्दील करने की साजिश शुरू हुई। आंदोलनकारियों के खून से राज्य को रंग दिया गया था। डोरंडा में खून बहा। तपकरा में खून बहा। लेवाटांड में विस्थापितों पर हमला किया गया। न आदिवासियों की लुटी जमीन वापस हुई, न विस्थापन बंद हुए, न नौकरियों में स्थानीयों को नौकरी मिली। उल्टे जनाकांक्षाओं को दबाने के लिए सरकार की गोलियां चलने लगीं। इस दौर में कॉ महेंद्र सिंह के नेतृत्व में झारखंड नवनिर्माण का आंदोलन आकार ले रहा था। कॉ महेंद्र सिंह के नेतृत्व में यह आंदोलन संघी ताकतों का रास्ता रोके खड़ा हो रहा था। सत्ता के संरक्षण में गिरिडीह के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक दीपक वर्मा और भाजपा के वर्तमान सांसद रवींद्र राय ने सत्ता के संरक्षण में भाड़े के हत्यारों के जरिए 16 जनवरी 2005 को कॉ महेंद्र सिंह की हत्या करवा दी। उन्होंने जिस आवाज की हत्या करने की साजिश की थी, आज जनसंघर्षों में यह बुलंद आवाज और भी बड़ी ताकत बनकर फासीवादी ताकतों के खिलाफ खड़ी है।

(मनोज भक्त सीपीआई (एमएल) लिबरेशन के पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं।)








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