महेंद्रा के नेतृत्व में मिला मजदूरों की लड़ाई को नया मुकाम

हमारे नायक , , रविवार , 19-11-2017


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मसऊद अख्तर

                                                                        केएल महेन्द्रा

                                                                     (1922 – 2007)

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, तेलंगाना आन्दोलन के सक्रिय कार्यकर्ता, एटक के पूर्व महासचिव और वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियन्स के पूर्व अध्यक्ष केएल महेन्द्रा का जन्म 25 नवम्बर, 1922 को आंध्र प्रदेश के हैदराबाद शहर के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। जब वे मात्र दो बरस के ही थे तभी उनके पिता की मृत्यु हो गयी। इसके बाद इनके साथ ही सभी भाई बहनों के पालन-पोषण का भार इनकी माँ पर आ गया।

जब महेन्द्रा स्कूल में थे तब इनके एक अध्यापक जिनका नाम चंद्रशेखर था और वो नीतिशास्त्र पढ़ाते थे, अपने अध्यापन के दौरान समकालीन नमक सत्याग्रह और बंगाल के आन्दोलनों का विस्तृत विवरण दिया करते थे। इस विस्तृत विवरण ने बालक महेंद्र के मन पर गहरा प्रभाव डाला और भविष्य की प्रेरणा भी दी।

मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद महेन्द्रा ने उस्मानिया विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया। एक दिन उस छात्रावास के छात्रों ने जहां महेन्द्रा रहते थे, ‘वन्दे मातरम्’ गाना शुरू कर दिया। जब सरकार ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया तो ये छात्र इसके विरोध स्वरूप हड़ताल पर चले गए। इसका परिणाम यह हुआ कि अन्य छात्रों सहित महेन्द्रा को 1938 में विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया। इसके पश्चात उन्होंने शान्ति निकेतन से इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्त्तीर्ण की। इसके कुछ दिनों बाद महेन्द्रा द्वारा अखिल भारतीय छात्र संघ परिषद से जुड़ने के लिए छात्रों से प्रेरित करने के कारण तत्कालीन सरकार द्वारा उन सहित अनेक छात्रों को शान्ति निकेतन छोड़ने का आदेश दे दिया गया। बाद में उन्होंने बर्दवान कॉलेज से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। 

अपने इस तरुणाई के दौर में महेन्द्रा गांधीवादी व्यक्ति थे। उस वक़्त उनके ऊपर गांधी का बेहद प्रभाव था। वह खादी पहनते थे और ‘हरिजन’ के लिए चन्दा देते थे। उन्होंने कांग्रेस के अधिवेशन में उस वक़्त भाग लिया था जब सुभाष चन्द्र बोस और पट्टाभि सीतारमैय्या के बीच मतभेद था। बाद में मेहन्द्रा जी लेनिन और रजनी पामदत्त की पुस्तकों का अध्ययन किया और इसी अध्ययन के दौरान वे साम्यवाद की तरफ आकर्षित हुए। उन्होंने साम्यवाद का गहराई से अध्ययान किया और 1942 में बर्दवान में रहने के दौरान ही वे भारत की कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होने के बाद उनका ध्यान मजदूरों की हालत को सुधारने पर गया। वर्ष 1943-46 के बीच उन्होंने बर्नपुर तथा आसनसोल के आसपास के क्षेत्रों में लोहा-इस्पात और कोयला उद्योग में लगे मजदूरों को उन मुश्किल भरे दौर में संगठित करने का काम शुरू कर दिया। उस दौरान तत्कालीन सरकार मजदूर वर्ग के बीच कम्युनिस्टों द्वारा किसी भी गतिविधि को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करती थी। 1945 में महेन्द्रा ने एटक के सत्र में भाग लिया। उस समय हैदराबाद के पार्टी वर्कर चाहते थे कि कुछ सक्रिय कार्यकर्ता निजाम के खिलाफ उनके आन्दोलन में शामिल हों। उन्होंने वहां महेन्द्रा से अनुरोध किया कि वे हैदराबाद आ जाएं। पार्टी द्वारा अनुमति प्राप्त हो जाने पर वह हैदराबाद आ गए तथा वहां सक्रिय हो गए। हैदराबाद आने के बाद वे वहां यूनियनें बनाने में लग गए और कई यूनियनों का निर्माण किया। उनकी इन सक्रियताओं ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट निकाल दिया। इस कारण वे अक्टूबर 1946 से जनवरी 1950 के बीच भूमिगत रहे और इस दौरान उन्होंने तेलंगाना में चल रहे सशस्त्र संघर्ष में भाग लिया। इस अवधि में उनका मुख्य कार्य भ्रष्ट अधिकारियों से हथियार तथा गोला बारूद हासिल करना और आन्दोलन से जुड़े नेताओं की जेल से भागने में मदद करना था।1951-52 के दौरान महेन्द्रा को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। 

महेन्द्रा एटक की आंध्र प्रदेश इकाई के स्थापना काल से ही सचिव रहे। वह असंगठित क्षेत्र की अनेक यूनियनों के अध्यक्ष रहने के साथ-साथ ई.सी.आई.एल., एन.एफ.सी. तथा एच.सी.एल. कर्मचारियों की यूनियनों के भी अध्यक्ष रहे। वह इंजीनियरिंग वर्कर्स की संयुक्त कार्यवाही समिति के अध्यक्ष थे तथा इस नाते उन्होंने इस उद्योग में कार्यरत मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि और एकसमान मजदूरी ढांचे की शुरुआत करने के लिए एक निर्विरोध रिपोर्ट प्रस्तुत की। जब वह मूल्यांकन और क्रियान्वयन समिति के अध्यक्ष थे उस समय उनकी पहल पर बैलट पर आधारित बहुमत वाली यूनियन को मान्यता देने के सम्बन्ध में एक प्रस्ताव लाया गया। इंटक के तत्कालीन अध्यक्ष श्री जी. संजीवा रेड्डी इस प्रस्ताव के विरोध में न्यायालय में चले गए तथा उन्होंने वैरिफिकेशन के आधार पर मान्यता की मांग रखी। ऐसी स्थिति में न्यायालय ने बैलट पद्धति को सर्वाधिक प्रजातांत्रिक तरीका होने का निर्णय दिया। 

महेन्द्रा कई वर्षों तक आन्ध्र प्रदेश राज्य न्यूनतम मजदूरी सलाहकार बोर्ड के सदस्य रहे। 1973 से 1985 के बीच 12 वर्षों के लम्बे अंतराल तक वह राज्य एटक (आंध्रप्रदेश) के महासचिव रहे और 1970 से 1982 के बीच आन्ध्र प्रदेश विधान परिषद के सदस्य रहे। 1984 के बाद से वह जीवनपर्यंत सिंगरेनी कोयला कर्मकार यूनियन के अध्यक्ष रहे। 1986 में वह दिल्ली स्थित एटक के केन्द्रीय कार्यालय में आ गए तथा 1986 से 96 तक सचिव रहे तथा 1996 से 2001 तक इसके महासचिव रहे। वह रामानुजम कमेटी के अल्टरनेट सदस्य और श्रम कानूनों में संशोधन के लिए बनी द्विपक्षीय समिति के सदस्य भी रहे। इसके साथ ही वह अखिल भारतीय खान कर्मकार महासंघ और सड़क परिवहन कर्मकार महासंघ के अध्यक्ष भी रहे। 

वर्ष 2001 में उन्होंने दिल्ली में आयोजित ट्रेड यूनियनों के विश्व परिसंघ (WFTU) के अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस सम्मलेन में 72 देशों की ट्रेड यूनियनों ने हिस्सा लिया था। इसी सम्मलेन के दौरान WFTU के अध्यक्ष चुने गए और 2005 तक इस पर पर कार्य किया। महेन्द्रा 1970 में सीपीआई की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य चुने गए थे और तब से आजीवन इसके सदस्य बने रहे।

आखिरी समय तक सक्रिय रहे 

1997 – 2004 के बीच वे इसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के भी सदस्य रहे। यद्यपि वर्ष 2003 में स्वास्थय में गिरावट आ जाने के कारण उनकी सक्रियता में कमी आई लेकिन फिर भी वह 12 अगस्त 2007 तक यानी अपनी मृत्यु तक एटक के उपाध्यक्ष की भूमिका का निर्वाह किया। 2003 के बाद स्वास्थ्य समस्या के चलते यद्यपि श्रम आन्दोलन के क्षेत्र में उनकी सक्रियता में जरूर कमी आई लेकिन उन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमता का पूरा पूरा इस्तेमाल करते हुए श्रम आन्दोलन और संघर्षों के अपने 6 दशकों से अधिक के अनुभव को क्रमशः 2005 व 2006 में प्रकाशित अपनी पुस्तकों “इवेंट्स एंड मूवमेंट्स” और “रिकलेक्शन्स एंड रिफ्लेक्शन्स” के माध्यम से भावी पीढ़ी में पहुंचाने का कार्य किया। उनकी एक अन्य पुस्तक “ए शोर्ट हिस्ट्री ऑफ़ ए.आई.टी.यू.सी. इन द चेंजिंग पोलिटिकल सिनैरियो” वर्ष 2005 में एटक द्वारा प्रकाशित की गयी। उनका निधन 12 अगस्त 2007 को हुआ परन्तु वे अपने कार्यों व शब्दों के माध्यम से हम लोगों के बीच लम्बे समय तक रहेंगे और अपनी कर्मों से हमें प्रेरणा देते रहेंगे।






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