देश की राजधानी भी नहीं रही भूख से अछूती

कहां आ गए हम... , , बृहस्पतिवार , 26-07-2018


mandawali-delhi-hunger-death-manoj-tiwari-makan

चंद्रभूषण

 अजय माकन और मनोज तिवारी ने दिल्ली के मंडावली मोहल्ले में आठ, चार और दो साल की तीन बहनों की भूख से हुई मौत पर जो ‘शॉक’ जताया, उसे महसूस करने के लिए आपको हिंदी न्यूज चैनल नियमित देखने होंगे। दोनों में से एक का शॉक सुनने में बिल्कुल शौक जैसा लगा, लेकिन इसका दोष क्षेत्रीय उच्चारण भिन्नता पर डाला जा सकता है। किसी बच्चे की मृत्यु किसी भी स्वस्थ दिमाग के लिए शौक की चीज नहीं हो सकती, भले ही वह किसी राजनीतिक दल के राज्य अध्यक्ष का ही क्यों न हो।

फिर मौत के कारणों पर बात शुरू हुई तो किसी के भी हाथ या मन पर कोई धब्बा पाए जाने का सवाल ही नहीं था। क्रमश: कांग्रेस और बीजेपी से जुड़े उपरोक्त नेताओं के वक्तव्यों में फर्क सिर्फ एक मामूली ब्यौरे का था। मनोज तिवारी ने कहा- ‘केंद्र सरकार तो सस्ता अनाज नीचे भेजे जा रही है। उसे गरीब लोगों तक पहुंचाना दिल्ली सरकार का काम है, जो वह कर ही नहीं रही।’ आम आदमी पार्टी ने इसका जवाब पहले से तैयार रखा था- ‘केंद्र के बिठाए उप-राज्यपाल घर-घर राशन पहुंचाने की योजना पर ही बैठ गए हैं, क्या किया जा सकता है? जांच कर सकते हैं, सो करेंगे।’

ये बातें यकीनन बहुत बोरिंग हैं। तो फिर दिलचस्प ब्यौरे कहां से आएंगे? लीजिए, सुनिए दो पाठकों की प्रतिक्रिया- 1. यह परिवार प. बंगाल से आया था, जहां भूखों मर रहे लोग जिधर-तिधर भाग रहे हैं, जबकि वहां की मुख्यमंत्री पीएम बनने के ख्वाब देख रही हैं। और 2. ये बच्चियां किसी मंदिर या गुरद्वारे में लंगर खाने क्यों नहीं गईं, या सड़क पर भीख क्यों नहीं मांगी? लगातार आठ दिन की भूख के बाद अपने बच्चों के भूखे मर जाने के बावजूद मां का खुद खाना मांगना बताता है कि मामला कुछ गड़बड़ है।

इन दोनों प्रश्नाकुल प्रतिक्रियाओं से भी ज्यादा दिलचस्प मुझे हिंदी की किसी लाइफस्टाइल मैगजीन में अजय माकन और मनोज तिवारी के अलग-अलग मौकों पर दिए गए इंटरव्यू लगे, जिनमें उन्होंने बताया था कि अथाह राजनीतिक श्रम के बीच स्वयं को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए उन्हें क्या-क्या करना पड़ता है। अंकुरित मूंग, सलाद, ट्रेड मिल, मॉर्निंग वॉक और पॉजिटिव थिंकिंग के अलावा उनमें कांग्रेस को बीजेपी से अलग करने वाली कोई बात भी जरूर रही होगी, लेकिन फिलहाल मैं उसे याद नहीं कर पा रहा।

कुछ दिलचस्पी इन लड़कियों की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के ब्यौरे देने वाली डॉक्टर के बयान में भी ली जा सकती है, जिसने कहा कि अपने 15 साल के डॉक्टरी जीवन में उसने ऐसा एक भी मामला नहीं देखा, जिसमें किसी बच्चे का पेट बिल्कुल खाली हो। यहां तो तीन मामले एक साथ थे और तीनों के शरीर में वसा (फैट) की मात्रा शून्य थी। धुंधले अर्थों वाला राजनीतिक शून्य नहीं, एकदम स्पष्ट मतलब वाला गणितीय शून्य, जिस तरफ चमक-दमक से दूर रहने वाले हर मानवीय क्षेत्र में हम धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं।

भूख में मेरी अकादमिक दिलचस्पी इतने से भी संतुष्ट नहीं हुई। इस बीमारी के कुछ ज्यादा ही शिकार अपने मुल्क के कई सारे कोने-अंतरे छान डालने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि कोई पूरा का पूरा इलाका ही अगर लंबे अकाल का शिकार न हो जाए तो इंसान कुछ भी करके, चोरी करके, डाका डालके, भीख मांगके, कूड़े में से सड़ा खाना बीनके जिंदा रह लेगा। लेकिन मंडावली की घटना के बाद मैं अपने इस नतीजे को दफ्तर के डस्टबिन में फेंकता हूं।

जिंदा रहने का हुनर कोई भी जीव अपनी पिछली पीढ़ियों से ही सीखता है। और किसी तरह दो-तीन पीढ़ियों की तड़फड़ाहट को अगर एक साथ मार दिया जाए तो आखिरी पीढ़ी डार्विन के इवॉल्यूशन को घूरे पर डालकर आठ दिन की भूख के बाद भी चुप रहकर मरना सीख लेती है। मुकेशभाई अंबानी की जेब में बैठा हमारे मुल्क का हर जिम्मेदार शख्स भूख से हुई मौतों में अपने हाथ को अदृश्य रखना जानता है। उसकी इस क्षमता पर मोहर लगाकर एक दिन हम जरूर दुनिया के सबसे ताकतवर देश बन जाएंगे!

(ये लेख नवभारत टाइम्स में संपादकीय पेज के प्रभारी चंद्रभूषण की फेसबुक वाल से साभार लिया गया है।)








Tagmandawali delhi hunger death child

Leave your comment