खट्टर जो खट्टर काका न बन सके!

आड़ा-तिरछा , , शुक्रवार , 19-01-2018


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उपेंद्र चौधरी

मैथिली साहित्य में हरिमोहन झा का वही स्थान है, जो संस्कृत में कालिदास का; हिन्दी में प्रेमचंद का और अंग्रेज़ी साहित्य में सेक्सपियर का। उनका एक मशहूर पात्र है,खट्टर काका। आप जब हरिमोहन झा की कहानियों को पढ़ेंगे, तो खट्टर काका अपने सहज सरल तर्कों से धर्म, संस्कृति और समाज सब पढ़ाते हुए मिलेंगे। मगर खट्टर काका सिर्फ धर्म, संस्कृति और समाज को पढ़ाते ही नहीं, उन पर मधुरता के साथ बिना किसी लाग-लपेट के करारा प्रहार भी करते हैं। अगर हिन्दी या किसी और भाषा के लेखक ऐसा प्रहार करे, तो यक़ीन मानिये उसे ‘पद्मावती’ से ‘पद्मावत’ होने भर से भी काम नहीं चलेगा। वह तो समाज,धर्म और संस्कृति का दुश्मन करार दिया जायेगा। वह धर्म को मानने और समझने वाले मूर्ख तबकों (जो दुखद रूप से बड़ी संख्या में हैं) द्वारा विधर्मी घोषित कर दिया जायेगा। 

गांव का भोज हो, किसी की शादी हो, मिलन समारोह हो, यात्रा हो या जीवन का कोई भी सामान्य से लेकर विशेष उत्सव हो, वहां खट्टर काका अपने मधुर तर्कों से बाज नहीं आते हैं। इसके बावजूद उन कहानियों में खट्टर काका पर कोई भी अन्य धर्मभीरू या संस्कृति को जीने वाला कथा पात्र हमला करता हुआ नहीं दिखेगा और न ही धमकी देता हुआ नज़र आता है। इसका कारण शायद मैथिल समाज का तर्कवादी होना है। इसका मतलब यह नहीं है कि उस समाज में कुरीतियां या विडंबनायें नहीं हैं। हर समाज की तरह यहां भी वो सब है,जो कि किसी धार्मिक समाज में होता है। लेकिन यहां का तर्कवाद उस समाज की उन कुरीतियों या विडंबनाओं से अमानवीय मवाद नहीं बहने देता, बल्कि उसकी शल्यचिकित्सा करता फिरता है। मैथिल संसार में तर्क है, दर्शन है और उन दर्शनों के बीच टकराहट है। उस टकराहट से न तो “जय श्रीराम” के युद्ध-नारे गरजते हैं और न ही “अल्ला-हू-अकबर” का जंग-ए-एलान भड़कता है। 

वहां दरवाज़े-दरवाज़े भांग घुटती है, भांग के गोले बनते हैं और बिना किसी हिचक-बिचक के बालक से लेकर वृद्ध तक भांग के छोटे-छोटे गोले बेसाख़्ता गटक लिये जाते हैं। मगर यह गोला किसी नशे का बमगोला नहीं बनता, सड़कों या गली मुहल्लों में कोई बौराता हुआ भी नज़र नहीं आता। बौराहट वहां भी है, लेकिन तर्कवाद (कुछ साल पहले तक इसे शास्त्रार्थ कहते थे) के आंगन में यह बौराहट आपको टूटकर नाचती हुई, खिलती हुई, मगन दिखायी पड़ती है। तर्क ख़त्म, विरोध समाप्त। निजी ईर्ष्या-द्वेष यहां भी है। लेकिन सार्वजनिक रूप से तर्क-वितर्क का बड़ा महत्व है। यहां तक कि आज भी मैथिल समाज (मैथिली बोलने वाले सभी जाति-धर्म के लोग) जहां जाता है, वहां अपने साथ अपना तर्क और तार्किक शैली भी ले जाता है। इस तर्क की प्रवृत्ति की हालत तो यह है कि अगर किसी को अपनी कन्या के लिए वर (दुल्हा) चाहिए, तो मैथिलों के लिए आर्थिक और सामाजिक हैसियत ही काफ़ी नहीं, उसकी मानसिक हैसियत का तोल-मोल तर्कों और सवालों से किया जाता है।

हरिमोहन झा के खट्टर काका इस तर्कवाद के साहित्यिक प्रतिनिधि हैं। बड़ी ही आम कहावत है कि साहित्य किसी भी समाज का दर्पण होता है। खट्टर काका आज भी अपने पाठकों में उतने ही लोकप्रिय हैं, जितनी कि अपने उद्भव के समय हुआ करते होंगे। यानी माना जा सकता है कि मैथिल समाज अपने साहित्य से झांकता हुआ आज भी तर्कवादी है, खट्टर काका का तर्कानुरागी। मगर जैसे हिन्दू माता-पिता की संतान होने या संस्कृतनिष्ठ नाम होने से ही कोई ‘हिन्दू’ नहीं हो जाता, इस्लामिक रिवाज़ों वाले घर में जन्म लेने या अरबी-फ़ारसी वाले नाम धारण कर लेने से ही कोई ‘मुसलमान’ नहीं हो जाता। उसी तरह किसी के नाम में खट्टर लग जाने से कोई खट्टर काका भी नहीं हो जाता। खट्टर काका तो हर गड़बड़ियों की नस पर अपनी ऊंगली रख देने का नाम है, मगर हरियाणा के मनोहरलाल खट्टर अपनी व्यवस्था पर भी ऊंगली नहीं उठा पाते। खट्टर काका तो फ़क्कड़ हैं, सच और सच की ख़ातिर तर्क के अलावे किसी का लिहाज़ नहीं करते, लेकिन मनोहरलाल खट्टर संन्यासी (अविवाहित) होकर भी व्यवस्था में तर्कवादी व्यवस्था छोड़कर बाकी सबका लिहाज़ करते हैं।

खट्टर काका के जीवन में दोहरापन नहीं है, लेकिन मनोहरलाल खट्टर के जीवन में दोहरापन ने अपनी जगह बना ली है। एक तरफ़ “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”, तो दूसरी तरफ़ लगातार मारी जा रही बेटियां, बलात्कार की शिकार हो रहीं बेटियां। मनोहरलाल खट्टर जी, आपके पास पुलिस है; ख़ुफ़िया तंत्र है; पूरी व्यवस्था भी है, इसके बावजूद आप इन शर्मनाक और दर्दनाक वारदात पर लगाम नहीं लगा पा रहे हैं। उम्मीद करें कि उनके आस-पास कोई मैथिल होगा, जो उन्हें हमारे खट्टर काका के आदर्शों से दो-चार करवा दे! पूछा जा सकता है कि आख़िर मनोहरलाल खट्टर को मैथिलों से क्या मतलब? मतलब तो है, क्योंकि जिस राम का मंदिर बनना है, जिस राम की क़समें खाकर वो सत्ता पर आसीन हुए हैं, उसी राम की ‘मर्यादा’ को वो तो अपनी सत्ता में भी स्थापित करना चाहते हैं और कहते हैं कि राम की मर्यादा क़ायम रही, तो इसके पीछे मैथिल कन्या सीता का भी हाथ है। उसी पौराणिक सीता की ऐतिहासिक भाषा मैथिली के साहित्य का अमर पात्र खट्टर काका हैं। मोहनलाल खट्टर को खट्टर काका से संवाद करने से भला क्या परहेज?

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)










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