बाज़ार, निवेश और कुशलता बनाम सेवा‘भाव’

विशेष , समाज और सियासत, मंगलवार , 22-08-2017


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उपेंद्र चौधरी

मनुष्य के भीतर संभावनाओं का अथाह सागर है। उस सागर में अपने-अपने मुताबिक नाकारात्मक और साकारात्मक दोनों ही तरह के भाव हैं। प्रजाति से तो हर कोई आदमी है, मगर मनुष्य होने के लिए किसी को गहरी वैचारिक प्रक्रिया से होकर गुज़रना होता है। इसमें कुछ हद तक परिस्थितियों का भी हाथ होता है और बहुत हद तक यह मनुष्य की जीवटता या उसके क्षणों में बिखराव वाली कमज़ोरी से तय होता है।

हम अनेक बार यह महसूस करते हैं कि एक ही परिस्थिति के शिकार लोगों पर उस परिस्थिति का अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। कई बार अलग-अलग परिस्थितियां में पले-बढ़े लोगों के बीच भी समान वैचारिक स्तर पाये जाते हैं। इससे तो यही लगता है कि संभवतमनुष्य के भीतर की साकारात्मकता और नाकारात्मकता दोनों ही तरह के भाव, अन्य तत्वों की अपेक्षा उसके वैचारिक प्रक्रिया से गुज़रने या गुज़ारने से ज़्यादा सुनिश्चित होते हैं और इसी से किसी का व्यक्तित्व भी तय होता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर साभार : गूगल

लाभ-लोभ से तय होता है 'मूल्य'

करुणा,दया,नैतिकता जैसे मूल्य तो लगभग सभी को आकर्षित करते हैं। लेकिन जिन्हें ये मूल्य आकर्षित करते हैं, उनमें से ज़्यादातर लोगों में इन मूल्यों में से किसी एक या इससे अधिक मूल्यों का भी अनुपातिक विकास, अपवादों को छोड़कर व्यक्ति विशेष की  ज़रूरतों और लाभ-लोभ से तय होता है। व्यक्तिविशेष अगर सामाजिक रूप से प्रभावशाली है, तो उसके भीतर के मूल्यन या अवमूल्यन से बनती शख़्सियत की ख़ासियत या कमी पूरे समाज की सामूहिक विशेषता या कमी बन जाती है। यह क्षेत्र विशेष, संस्कृति विशेष, धर्म विशेष और यहां तक कि राष्ट्र विशेष पर भी लागू होता है, क्योंकि व्यक्ति की तरह ही संस्कृति, धर्म और देश का भी अपना व्यक्तित्व होता है। इसी तरह अफ़सरों या कारकूनों से बने दफ़्तरों या व्यवस्था के भी अपने-अपने व्यक्तित्व होते हैं।

शीर्ष नेतृत्व से बनती-बिगड़ती है व्यवस्था

किसी भी व्यवस्था के व्यक्तित्व के बनने में उसके शीर्ष पर बैठे नेतृत्व का व्यक्तित्व बहुत मायने रखता है। हमने अक्सर ही देखा है कि जुझारू शख़्सियत वाले नेतृत्व में काम करने वाले कारकूनों की शख़्सियत भी जुझारूपन के असर में गतिशील हो जाती है। यह असर किसी दफ़्तर की हर प्रक्रिया में प्रतिबिंबित होता है। इसी तरह नेतृत्व की ईमानदारी, बेईमानी और अनगिनत मूल्यन या अवमूल्यन का असर भी एक ही दफ़्तर पर अलग-अलग समय में अलग होता है। अनेक बार हमें सुनने को मिलता है कि किसी समय नैतिक दायित्व का इतना असर था कि एक मामूली रेल दुर्घटना के कारण किसी रेल मंत्री ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। दूसरी तरफ़ हम यह भी देखते हैं कि एक साल में सैकड़ों विभत्स रेल दुर्घटना होने के बावजूद इस्तीफ़ा नहीं होता। अगर कहीं घोटाले हो रहे हैं,तो माना जाना चाहिए कि वहां का शीर्ष नेतृत्व प्रत्यक्ष या अप्रत्क्ष रूप से शामिल है। किसी के नेतृत्व के तहत चल रहे किसी दफ़्तर में अगर घोटाला हो रहा हो और शीर्ष नेतृत्व मौन हो, तो माना जाना चाहिए कि एक तरह से नेतृत्व की तरफ़ से हरी झंडी है, क्योंकि अगर नेतृत्व ईमानदारी बरतने की कोशिश करेगा, तो स्वाभाविक रूप से वह या तो अपने पद का त्याग करेगा या फिर हो रहे घोटालों में शामिल लोगों पर कार्रवाई करेगा और इन दोनों ही स्थितियों में जनता के सामने घोटालों का पर्दाफ़ाश भी होगा।  

किसी दफ़्तर की व्यवस्था की चाल अगर खुटकचाली वाली है, तो माना जा सकता है कि इस चाल को बिगाड़ने में उसके शीर्ष अफ़सर का हाथ ज़रूर हैकंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में अगर घोटाले होते हैं, तो ज़ाहिर सी बात है कि उसमें शीर्ष इंजीनियर या शीर्ष मैनेजर के बिना ये घोटाले संभव नहीं हैख़बर को दबा लेने या झूठी ख़बर छाप देने को लेकर अगर कोई पत्रकारिता वाला भ्रष्टाचार होता है, तो स्वाभाविक रूप से इस तरह की स्थिति शीर्ष संपादक और पत्रकार के बिना मुमकिन नहीं हैअगर किसी एनजीओ में गड़बड़ियां होती हैं, तो निश्चित रूप से नेतृत्व करने वालेसमाजसेवियों’ या ‘सामाजिक कार्यकर्ताओं’ की मिलीभगत के बिना यह पॉसिबल नहीं होगाअगर शिक्षा विभाग में कुछ अनुचित हो रहा है,तो बिना शिक्षक के शामिल हुए ऐसा नहीं हो सकता हैअगर किसी स्वास्थ्य विभाग या हॉस्पिटल में कुछ बुरा चल रहा है,तो डॉक्टर्स के बिना ऐसा होना मुमकिन नहीं हैन्याय व्यवस्था अगर लंगड़ी हो चली है, तो भला न्यायाधीशों और वक़ीलों की अनैतिकता के बिना ऐसा कैसे हो सकता है ?

प्रतीकात्मक तस्वीर साभार : गूगल

सेवा में 'भाव' प्रमुख 

ये सबके सब पढ़े-लिखों के रूप में चिह्नित किये जाते हैं, ये सब के सब अपने अपने क्षेत्रों के कुशल शख़्सियत समझे जाते हैं। ये समाज के ऐसे नागरिक हैं, जिन्हें बौद्धिक या इंटेलेक्चुअल कहे जाने की परंपरा है। समाज के ये वो स्तर हैं,जिन्हें देख-सुन-समझकर बाक़ी स्तर अनुकरण करते हैं। ये वो लोग हैं, जिनका देश निर्माण या समाज निर्माण में बड़ा हाथ समझा जाता है। सिद्धांत में ये सबके सब जनता के सेवक समझे जाते हैं, क्योंकि इनकी सेवा की कुशलता ही इन्हें उत्पादक बनाने की स्थिति में लाती है। इनकी सेवा ही इनकी असली उत्पादकता है। लेकिन अगर ग़ौर से देखा जाय तो इनकी सेवा इन्हें उत्पादक होने का दर्जा तो देती ही है, सेवा जैसी उदात्त भावना का बाज़ार से जुड़ाव उन्हें सेवा का व्यापारी बना देता, एक प्रभुत्वशाली सेवादार भी बना देता है, इसलिए नहीं कि इनकी सेवा के एहसास में किसी तरह की व्यापकता है ,बल्कि इनका सेवा ‘भाव बहुत ऊंचा होता है। ये इस बात से पूरी तरह कन्विंस होते हैं कि बिना ‘भाव’ का इनकी ‘सेवा’ महत्वपूर्ण नहीं है। इनके इस ‘भाव’ की बुनियाद इनके द्वारा तैयार किया गया वो साम्राज्य है, जहां से असल में वो किसी राजनेता की तरह बनायी गयी अपनी कुशलता की ‘छोटी-छोटी रियासत से ‘सेवा’ की हुक़ूमत चलाते हैं।

आपकी-हमारी सेवा करने वाले ये चाहे हकीम हो या हाकिम, सेवा का एक छद्म मनोविज्ञान बनाकर सबके सब ख़ासकर आम लोगों पर हुक़ूमत करते हैं। अपने ‘भाव’ को लेकर ये बड़े ही कॉन्सस होते हैं। इनके द्वारा जारी निर्देश की भाषा बहुत ही विनम्र होती है, लेकिन भाषा का व्यावहारिकरण उतना ही क्रूर और सख़्त होता है। इनकी हुक़्म उदूली में थोड़ी से कमी आयी, ये आपकी शिक्षा बिगाड़ सकते हैं, निर्माण ध्वस्त कर सकते हैं, स्वास्थ्य बिगाड़ सकते हैं, न्याय की बेड़ियों में जकड़ सकते हैं और आपके जीवन का वो हर संतुलन ही तबाह कर सकते हैं, जिसके बूते आप एक सामान्य जीवन जीने की उम्मीद बांधते हैं। देश का एक बड़ा हिस्सा इसी असंतुलन से दो-चार है।

इस हुक़ूमत के टॉप पर भले ही सियासत के बादशाह दिखते हों, लेकिन वर्चस्व के इस पिरामिडिक संरचना वाली अनेक रियासत के हुक्मरानों का हम पर,आप पर  नज़र नहीं आने वाली बेशुमार हुक़ूमत है। विडंबना यह कि इस हुक़ूमत के दायरे में जो अनेक परतों वाले आर्थिक सवर्ण आते हैं,वो मध्यवर्ग कहलाते हैं और जो हुक़ूमत की इस सीमा से बाहर हैं, वो शिक्षा,स्वास्थ्य,न्याय और व्यवस्थागत लाभ से वंचित आर्थिक ‘शूद्र’ बना दिये गये हैं। पिछले अनेक दशकों से सामाजिक रूप से सवर्ण,पिछड़े और शूद्र की परिभाषा भले ही ठहरी हुई हो,मगर आर्थिक रूप से सवर्ण, पिछड़े और शूद्र होने की गति का चरित्र सामाजशास्त्र से अर्थशास्त्र की तरफ़ जारी है। आर्थिक और सामाजिक रूप से जिस ग़ैरबराबरी को विश्लेषक समान रूप से दिखाने की कोशिश करते रहे हैं, उस विश्लेषण के वैरियेबल्स दरअस्ल इतने बदल चुके हैं कि सामाजिक दर्जे के नतीजे भी बहुत हद तक बदल चुके हैं।

इस दौर की सबसे बड़ी मुसीबत ही यही है कि हम विश्लेषण की उसी परिपाटी और शैली की लीक पीट रहे हैं, जो उस नदी के अपने मार्ग बदल लेने जैसा है, जो टेक्टोनिक हलचल के कारण कभी स्थान विशेष पर बहा करती थी। किसी नदी के मार्ग बदल लेने का अर्थ सिर्फ़ मार्ग का बदल जाना नहीं है,बल्कि उसके आस-पास के इलाक़ों और उन इलाक़ों में बसी आबादी के भौतिक,मनोवैज्ञानिक और यहां तक कि आध्यात्मिक दशा-दिशा में भी बदलाव आ जाना होता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर साभार : गूगल

'सेवा' के 'निवेशक'

पेशे की कुशलता और बाज़ार के बीच के बदलते सम्बन्ध भी हमें कुछ इसी तरह के सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन की तरफ़ ले जा रहा है,जो अक्सर तो नहीं, मगर कभी-कभी तब दिखायी पड़ता है,जब बाज़ार के हवाले हुई कुशलता अपनी अति कर जाती हैजैसे,किसी डॉक्टर का अपने अनगिनत मरीज़ों से किडनी निकाल लेना,किसी सामाज सेवी का एनजीओ के ज़रिये बिना कोई सृजन किये करोड़ों डकार जाना और इस तरह की अमानवीय हरक़तों में सियासत के शीर्ष नेतृत्व का शामिल होना। वर्ना इस तरह की ‘अति’ से कुछ कम वाला ‘सेवागत अनाचार’ तो निरंतर रहता है; जैसे जनता के सेवक का मालिक की तह जीवन जीना।

यानी किसी व्यक्ति का इंजीनियर होना, मैनेजर होना,समाजसेवी या सामाजिक कार्यकर्ता होना,ऑफिसर होना या डॉक्टर होना या वक़ील या न्यायधीश होना इस बात के सुबूत नहीं है कि वो दयावान,करुणावान, नैतिकतावान या इसी तरह के मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण व्यक्ति होगा ! किसी माता-पिता के लाखों-करोड़ों के खर्च से कुशलता हासिल करने वाले बेटे-बेटियों की ‘सेवा’ में ‘निवेश’,उनकी हासिल की कुशलता का एक ऐसा एलीमेंट है,जो उन्हें अपने बीमारों,न्याय के लिए तड़पते फ़रियादियों, व्यवस्थागत लाभ के लिए परेशान होते नगारिकों को एक उपभोक्ता में बदल देता है। ध्यान रखने की बात है कि जितना उनका निवेश होता है,उससे कहीं ज़्यादा उनकी कुशलता को हासिल करवाने में उन्हीं बीमारों, फ़रियादियों और नागरिकों का निवेश होता है। 

हम  डॉक्टर को धरती के भगवान मानते रहें, न्यायधीशों में न्याय के पुजारी को तलाशते रहें, पत्रकारों में सूचना के निष्पक्ष वाहक होने के संत को निहारते रहें, नेतृत्व में अभिभावक होने के भाव ढूंढते रहें, मगर न वो  धरती के भगवान हैं, न वो न्याय के पुजारी हैं, न सूचना के निष्पक्ष वाहक बनते संत हैं, न वो अपने नागरिकों की चिंता करते अभिभावक हैं, क्योंकि वो ‘सेवा’ के ‘निवेशक’ हैं, और उस ‘निवेश’ का उन्हें ‘भौतिक लाभचाहिए,भले ही उनके निवेश से कहीं ज़्यादा उनपर देश और समाज ने निवेश किया हो।   

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)










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