कहानी मीडिया के मुजरे की

आड़ा-तिरछा , , शुक्रवार , 03-08-2018


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शायद मीडिया के लिए इस तरह का शीर्षक आपको अचंभित व हैरान कर रहा हो। थोड़ा असहज भी कर रहा होगा या फ़िर इसे नारीविरोधी भी कहने का उतावलापन कोई दिखा सकता है। लेकिन चौकिये नहीं, और उतावलेपन की तो बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। मैं तो केवल महान भारतीय मीडिया को नृत्य-संगीत की एक शानदार विधा "मुजरा" की कसौटी पर कसना चाहता हूं और बताना चाहता हूं कि वर्तमान भारतीय मीडिया और रसिकमिजाज संगीत और नृत्यप्रिय व्यक्तियों की फरमाइश पर भाव प्रदर्शित करने वाली नर्तकियों का "मुजरा" दोनों अपने श्रोताओं और दर्शकों को खुश करने की समान विधाएं हैं। "मुजरा" क्या होता है उसके बारे में गीत-संगीत-नृत्य के जानकार व उसको पसंद करने वाले लोग बख़ूबी जानते होंगे। 

दरअसल मुजरा गीत और नृत्य की एक विधा है जिसमें एक खूबसूरत नर्तकी कुछ रसिकमिजाज संगीतप्रिय व्यक्तियों की फरमाइश पर किसी अनन्य संगीत प्रेमी द्वारा निर्मित विशाल रंगमंच पर अपनी खूबसूरत भाव भंगिमाओं और आकर्षक अदाओं को अपने नृत्य और गीत के जरिये प्रदर्शित करने की कोशिश करती है। रसिकमिजाज व्यक्तियों की वाह-वाह उनकी हौसलाअफजाई के काम आती है और उनके द्वारा उछाले गये हीरे-मोतियों के हार व मणि-माणिक्य उस नर्तकी की शानदार कला और मेहनत का पारिश्रमिक होता है। कभी-कभी विलासिता में डूबा कोई धनकुबेर रसिकमिजाज राजा, महाराजा या शासक उसकी कला पर इतना मुग्ध हो जाता है कि उसे अपने दरबार व राजमहल में बुला लेता है जो नर्तकी के कला का सर्वोच्च पुरस्कार माना जाता है। 

दरअसल ठीक बिल्कुल इसी तरह से विश्व प्रेस सूचकांक में 138 वें स्थान पर विराजमान हमारा महान भारतीय मीडिया भी है। भारतीय धनकुबेर कॉरपोरेट घरानों के द्वारा स्थापित न्यूज चैनल के विशाल न्यूज़ रूम में चौधरी जी, सरदाना जी, अंजना जी, श्वेता जी, रजत जी जैसे शानदार एंकर (नर्तक/नर्तकी) अपनी शानदार पत्रकारिता (मुजरा) का प्रदर्शन गजब की भाव भंगिमाओं और राष्ट्रवादी शब्दों के मेल के साथ करते हैं।

जिम्मेवार सरकार, सरकार के जिम्मेवार मंत्री, उनके कट्टर समर्थक बीच-बीच में वाह-वाह का जयघोष भी करते रहते हैं जिससे एंकरों का जोश अपनी बुलंदियों को छूने लगता है। और प्रदर्शन तेजी से निखरता चला जाता है। सरकार व उसके प्रतिनिधियों के जयघोष से बुलन्द हौसले और जोश-ओ-जुनून का आलम ये होता है कि सरकार ने जब ऐतिहासिक आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक का फैसला करते हुए गुलाबी नोटों को लॉन्च किया तो मीडिया के जिम्मेदार एंकर उसमें लगे कथित माइक्रोचिप का बखान करने में जुट गए। 

पाक मसले पर तो न्यूजरूम के रंगमंच से ही कई पाकिस्तानी बंकरों को हमारे एंकर ध्वस्त कर डालते हैं। बिहार में एक सत्ता विरोधी राजनैतिक दल की जीत की ओर बढ़ना मीडिया के लिए बुरी ख़बर बन जाती है। लेनिन की मूर्ति तोड़ने वाले विवाद पर तिहाड़ रूम से सीधे न्यूज़ रूम का सफर तय करने वाले तेजतर्रार एंकर ने अपने जबरदस्त ऐतिहासिक ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए लेनिन (मृत्यु- 21 जनवरी 1924) से पहले भगत सिंह (मृत्यु-23 मार्च 1931) को ही मार दिया। मीडिया के रजत जी तो एक सम्मेलन में गर्व से कहते हैं कि इंटरटेनमेंट और लोकप्रियता के लिए कुछ मसालेदार न्यूज या हल्के शीर्षक डालने पड़ते हैं। 

हल्लाबोल मोहतरमा की जुबान से सत्ता के सम्राट का नाम शहद की तरह टपकता है। फिर एक कॉरपोरेट धनकुबेरों का साथी और राष्ट्रवादी फकीर चौकीदार जब इन कलाकार एंकरों के सिर पर अपना हाथ रख देता है तो समझो पारिश्रमिक व प्रोत्साहन राशि का लिफाफा तो मिल ही गया न? सत्ता का सानिध्य प्राप्त ये एंकर सम्राट के साथ विदेश भ्रमण का भी लुफ्त उठाते ही रहते हैं। तो क्यों न हम अपने महान मीडिया चैनलों का नाम बदलकर "पण्डित दीनदयाल उपाध्याय मु... चैनल" रखने के लिए माननीय प्रधानसेवक से अपील करें और इसके लिए पूरी ताकत से अपनी आवाज बुलंद करें।

(दयानंद शैक्षणिक और सामाजिक विषयों के अच्छे जानकार हैं। और आजकल बिहार के मधुबनी में रहते हैं।)








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