मैं रिमोट से नियंत्रित इंसानी जामे में शैतान हूं!

आड़ा-तिरछा , , रविवार , 22-07-2018


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मदन कोथुनियां

मेरे लिए देश, धर्म, सम्प्रदाय, समाज, मानवता आदि के कोई मायने नहीं हैं। मेरे अंदर सिर्फ और सिर्फ उन्मादी जहर है। मेरे दिमाग का संतुलन बिगड़ चुका है। मैं रिमोट से नियंत्रित इंसानी जामे में शैतान हूं। मेरा उन्माद सुनियोजित व नियंत्रित है। मैं कोई दरिंदगी के तंत्र का छोटा सा पुर्जा नहीं हूं। मेरा अपना तंत्र है। मैं सत्ता व सियासत की बेजोड़ श्रृंखला का अभिन्न हिस्सा हूं अर्थात मैं पूरे तंत्र का चेहरा हूं। मुझे सिर्फ एक भटका हुआ अपराधी मानने की भूल मत करियेगा। मैं पूंजी, सत्ता, सियासत के जालिम षडयंत्र का जमीनी कार्यकर्ता हूं अर्थात मैं एक भीड़तंत्र हूं। 

कलबुर्गी,अखलाक,गौरी लंकेश,पहलू खान,अफराजुल से लेकर कल अलवर में रकबर की हत्या इसी मेरे उन्माद का नतीजा है, जो काफी सालों से मेरे अंदर कूट-कूटकर भरा गया है!आप इसे व्यक्ति विशेष या अपराधी विशेष पर निगाहें टिकाकर मत सोचिए! देशभर में मेरा जाल फैल चुका है! मेरा जाल इतना मजबूत है कि पाखंड व अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता फैलाने वाले हर शख्स पर हमारी नजर है! कौन-क्या अपने घर में, फ्रीज में रखता है उस पर भी मेरी निगाह है! कौन आदमी गाय के साथ किधर जा रहा है उस पर मेरी पैनी दृष्टि टिकी हुई है! कौन किससे प्यार करता है, उसका पूरा डेटा बैंक मेरे पास है क्योंकि मैं संविधान से ऊपर, मानवता से ऊपर,धर्म से ऊपर पूंजी, सत्ता व सियासत से निर्मित मजबूत भीड़तंत्र हूं!

मुझे गाय को पशु के बजाय माता मानने का हुक्म है! बाजारों में पॉलीथिन खाती,भूख,बीमार गाय हमारी माता नहीं है! अगर किसी गाय के साथ कोई मानव गुजरता दिख जाए तो उसमें मेरी मां का स्वरूप नजर आता है और साथ में दिखने वाला मेरी मां का दुश्मन! इसलिए ऐसे दुश्मन को मारना मेरा परम धर्म है, क्योंकि मैं कोई इंसान नहीं,कोई नागरिक नहीं बल्कि भीड़तंत्र हूं!

मेरा किसान बाप चाहे कर्ज में दबकर आत्महत्या करे, मेरा बाप मजदूरी करते-करते भूख से तड़पकर मर जाए, मेरा भाई बेरोजगारी के गम में ट्रेन के आगे कूदकर मर जाए, मेरी मां इलाज के अभाव में चाहे बेटा-बेटा करहाती हुई दम तोड़ दे,उससे मेरा कोई वास्ता नहीं! मेरा वास्ता न लोकतंत्र से है और न इंसानियत से है! मेरा वास्ता न देश से है और न संविधान से है! मेरा वास्ता न कानून से है न अदालतों से है क्योंकि मैं एक भीड़तंत्र हूं।

मेरा चेहरा जहां भी नजर आता है वहां तुरंत सियासतदां यूं ही नहीं टपकते हैं! मेरा चेहरा जहां भी दिखाई देता है तो मेरे समर्थन में यूं ही रैलियां नहीं निकलती हैं, यूं ही झांकियां नहीं निकलती हैं, यूं ही जेलों में रसूख वाले मिलने नहीं आते, यूं ही जजों के तबादले नहीं होते हैं! मैं अपने रूप को रोज विकराल करता जा रहा हूं, रोज खुद को स्थापित करता जा रहा हूं! 

दूध देने वाली गाय को माता का स्वरूप देकर मैं कब सड़क से होते हुए सियासत में ले आया आपको पता ही नहीं चला! घट-घट में बसने वाले राम को धनुष थमाकर तुम्हारी आस्था से छीनकर मैं कब सड़कों पर ले आया और तुझे पता ही नहीं चला! मेरे अनेक चेहरे हैं! मैं चेहरे बदल-बदलकर तुम्हारे सामने आता रहूंगा! मैं कोई इंसान नहीं जो तुम मुझे आसानी से पहचान लो! मैं उन्माद का पूरा तंत्र हूं, क्योंकि मैं भीड़तंत्र हूं!

कभी मैं धर्म का चोला पहनकर आ जाता हूं तो कभी राष्ट्रवादी बनकर देशभक्ति का जामा पहन लेता हूं! कभी मैं गौरक्षक बन जाता हूं तो कभी महान संस्कृति का रक्षक बन जाता हूं! मैं जितनी तेजी से अपना चेहरा बदलता हूं उतना तेजी से चंद्रकांता सीरियल वाला बद्रीनारायण अपना मेकअप भी नहीं बदल सकता है! मैं गति में बहुत तेज हूं! नफरत से तैयार उन्माद मेरा खाद है,मीडिया मेरा कीटनाशक व सियासती दल मेरे फाइनेन्सर हैं! आप चाहकर भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते! यकीन न हो तो FIR की कॉपी देख लीजिए! मैं अज्ञात हूं! मेरा न्याय मेरे पास है क्योंकि मैं भीड़तंत्र हूं!

सदियों से जिसे रावण कहकर तुम्हे डराया गया, उसका आधुनिक स्वरूप हूं मैं! अभी फाइनेंस कोई और करता है, सरंक्षण कोई और करता है लेकिन सेना की भर्ती आपके बीच से ही करता हूं! थोड़ा और विस्तार पाने के प्रयास में हूं! जब सत्ता पर मेरा सीधा नियंत्रण होगा तब देखना! किसी सीता का हरण नहीं होगा,बल्कि सीधा पकड़ा, दुष्कर्म और हत्या का तांडव मचाऊंगा! न किसी के प्रति दया न रहम! जो भी मेरी राहों में आएगा, वो बेमौत मारा जाएगा, क्योंकि मैं भीड़तंत्र हूं। मैं लोकतंत्र नहीं, भीड़तंत्र हूं। आप सहयोग नहीं कर सकते तो बस चुप हो जाइए! इससे मुझे बहुत मदद मिलेगी!

                       (मदन कोथुनियां स्वतंत्र पत्रकार हैं और जयपुर में रहते हैं।)

 










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