रकबर को लिंच कर दो, हरीश को लिंच कर दो, अग्निवेश को लिंच कर दो !

फुटपाथ , , शनिवार , 28-07-2018


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अजय सिंह

लिंच, लिंच, लिंच! हमारे देश में हर तरफ़ लिंच या लिंचिंग का बर्बर, ख़ूनी शोर! जो हमसे सहमत नहीं, उसे लिंच कर दो ! जो मुसलमान या दलित है, या अत्यंत ग़रीब—वंचित समुदाय से है, उसे लिंच कर दो! अंग्रेज़ी का शब्द लिंच (lynch)—जिसका मतलब है, राह चलते किसी को भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डालना---जैसे हमारी राष्ट्रीय पहचान बन गया है। और क्यों न बने ! इसे केंद्र की भाजपा सरकार और राज्यों की भाजपा सरकारों का कहीं खुला-कहीं छिपा समर्थन मिला हुआ है।

भाजपा का एक केंद्रीय मंत्री लिंचिंग के एक मामले में निचली अदालत से उम्रक़ैद की सज़ा पाये अपराधियों का, जिन्हें हाईकोर्ट से फिलहाल ज़मानत मिली हुई है ( यह ज़मानत कैसे मिल गई, इसी पर सवाल है), अपने घर में बुलाकर सार्वजनिक तौर पर स्वागत करता है, उन्हें फूलमालाएं पहनाता है, और उनके साथ फोटो खिंचवाता है। भाजपा का एक अन्य केंद्रीय मंत्री मुस्लिम-विरोधी हिंसा के आरोप में जेल में बंद दंगाइयों से खुलेआम मिलता है और उन्हें रिहा कर देने की मांग करता है। बलात्कारियों के समर्थन में भाजपा मंत्री और नेता सड़कों पर जुलुस निकालते नज़र आते हैं। लिंचिंग के एक मामले में जेल में बंद एक अभियुक्त की मौत हो जाने पर भाजपा मंत्री और नेता उसकी लाश को तिरंगे झंडे में लपेट कर सड़क पर प्रदर्शन  करते हैं और फ़ोटो खिंचवाते हैं।

एक मुसलमान की हत्या कर देने के बाद गाय आतंकवादी उसकी लाश को पुलिस की देखरेख में सड़क पर घसीटते हुए दूर तक ले जा हैं—फ़ोटो में सड़क पर घसीटी जाती लाश, हत्यारे और पुलिसवाले साफ़-साफ़ दिखायी दे रहे हैं। और इस प्रकार की अपराधपूर्ण, दंडनीय कार्यवाइयों में शामिल लोगों का कुछ नहीं बिगड़ता। बल्कि उनके हौसले और बुलंद हो गये हैं। क्योंकि उन्हें बहुत ऊंचे स्तर पर राजसत्ता का---नफरत के गणराज्य का –वरदहस्त मिला है।

जुलाई 2018 के दूसरे पखवाड़े में तीन ऐसी घटनाएं हुईं, जो ‘नफरत के गणराज्य ‘ की ख़ौफ़नाक तस्वीर पेश करती हैं। तीनों घटनाओं में आरएसएस-भाजपा से जुड़े लोग और उनके संगठन शामिल हैं। पहली घटना राजस्थान के अलवर के ज़िले में हुई, जहां 31 साल के एक मुसलमान नौजवान को गाय आतंकवादियों ने मार डाला। इस घटना को अंजाम देने में भाजपा के एक विधायक और पुलिस की भूमिकाएं खुलकर सामने आयीं हैं। दूसरी घटना केरल में हुई, जहां एक मलयालम उपन्यासकार के उपन्यास को, जो एक मलायलम साप्ताहिक में धारावाहिक छप रहा था, फ़ासीवादी हिंदुत्व संगठनों ने लिंच कर दिया---उसे छपने से रोक दिया।

तीसरी घटना झारखंड में हुई, जहां 78 साल के आर्य समाजी नेता पर आरएसएस-भाजपा-बजरंग दल से जुड़े गुंड़ों ने हमला कर किया और उन्हें लिंच कर देने की कोशिश की। पुलिस ने हमलावरों को गिरफ्तार करने के बाद उन्हें छोड़ भी दिया। राजस्थान और झारखंड में भाजपा की सरकारें हैं, जबकि केरल में सीपीआई (एस) के नेतृत्व में वाम मोर्चा की सरकार हैं। केरल सरकार ने मलयालम उपन्यासकार का समर्थन किया है और कहा कि हम आपके साथ हैं, और आप बैखौफ होकर लिखिये।

आइये, पहले देखें कि मलयालम उपन्यासकार एस हरीश का मामला क्या है। एस हरीश को कहानी के लिये वर्ष 2017 का केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका है। उनका उपन्यास मीशा  (मूंछ) मलयालम की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका मातृभूमि वीकली  में छप रहा था और उसकी तीन क़िस्तें छप चुकीं थीं। तीसरी क़िस्त छपते-छपते लेखक व उनके परिवार को फ़ासीवादी हिंदुत्व संगठनों की ओर से इतनी डरावनी और हिंसक धमकियां मिलनी लगीं कि उन्हें बाध्य होकर पत्रिका में अपने उपन्यास का प्रकाशन रोक देना पड़ा और उसे वापस ले लेना पड़ा।

उपन्यास `मीशा’ बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में केरल के सामाजिक जीवन और जाति व्यवस्था पर नज़र डालता है। उपन्यास की दूसरी क़िस्त में एक पात्र—वह नारीद्वेषी क़िस्म का है—जो डॉयलॉग बोलता है, उससे यह संकेत मिलता है कि मंदिरों में पूजा के लिये जाने वाली हिंदू औरतों और पुजारियों के बीच यौन संबंध होते हैं। इसी पर `हिंदुओं की भावनायें आहत हुई हैं ’ का  हो-हल्ला मच गया और लेखकर व उसके परिवार के लिये धमकियों और गालियों की बौछार शुरू हो गयी। इस मसले पर मातृभूमि वीकली के संपादक कमलराम सजीव ने ट्वीट किया : `...एस हरीश अपना उपन्यास मीशा वापस लेते हैं, साहित्य को भीड़ द्वारा लिंच किया जा रहा है, केरल के साहित्यिक इतिहास का सबसे काला दिन ...’

झारखंड में पाकुड़ में आर्यसमाजी नेता व समाजिक कार्यकर्ता अग्निवेश पर जो शारीरिक हमला हुआ, उसके पीछे भी यही फ़ासिस्ट तर्क दिया गया कि वह `हिंदुओं  भावनाओं  चोट पहुंचाते हैं’, `पाकिस्तान व नक्सलवाद की भाषा बोलते हैं’, और `ईसाई मिशनरियों से पैसे लेकर काम करते हैं’। पहाड़िया आदिवासियों के एक संगठन के एक बुलावे पर उसके कार्यक्रम में शामिल होने के लिये अग्निवेश पाकुंड गये थे। हमले की घटना के बाद पत्रकारों से बात करते हुये अग्निवेश ने खुलकर कहा कि मेरे ऊपर हमले के पीछे केंद्र की भाजपा सरकार और झारखंड की भाजपा सरकार का साफ़-साफ़ हाथ है। उन्होंने कहा कि हमलावर अपरिचित या अनजान  लोग नहीं थे।

मेवात(हरियाणा) के रहने वाले रकबर खान उर्फ़ अखबर खान का परिवार 40-50 साल से गाय-भैंस पालने का काम और दूध बेचने का कारोबार करता आ रहा है। दूध बेचने के कारोबार में और इज़ाफ़ा करने के इरादे से गाय ख़रीदने के लिये रकबर और उनके दोस्त असलम, अलवर (राजस्थान) गये। दो गाय खरीदकर लौटते वक्त 20 जुलाई 2018 को अलवर के रामगढ़ इलाके में गाय आतंववादियों ने उन दोनों को घेर लिया। असलम को किसी तरह बच निकले, लेकिन रकबर पर जानलेवा हमला हुआ और अस्पताल पहुंचते-पहुंचते उन्होंने दम तोड़ दिया।

इस मामले में अलवर के एक भाजपा विधायक और पुलिस का रोल गंभीर रूप से अपराधी चरित्र का रहा। जहां रकबर पर हमला हुया, वहां से सरकारी अस्पताल की दूरी छह किलोमीटर हैं। रकबर को लेकर, पुलिस की जीप को, यह दूसरी तय करने में तीन घंटे का समय लगा। बीच में सड़क के किनारे गाड़ी रोककर पुलिसवाले चाय पीते रहे, जबकि गाड़ी के अंदर गंभीर रूप से रकबर आंख़िरी सांसें ले रहे थे।

हिंदुस्तान तेज़ी से लिंचिस्थान बन रहा है। हम सबके लिये ख़तरे की घंटियां ज़ोर-ज़ोर से बज रही हैं। कल्पना कीजये, अगर आज कवि इक़बाल जिंदा होते तो वह अपने गीत, `सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ को किस रूप में लिखते ! क्या वह इसे गहरे व्यंग्यात्मक रूप में `लिंचिस्थान हमारा’ न लिखते ?

               (लेखक वरिष्ठ कवि और राजनीतिक विश्लेषक हैं। लखनऊ में रहते हैं।)

 








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Raj Valmiki :: - 07-28-2018
किसी कवि (शायद राजेश जोशी ) की पंक्ति है - 'जो सच बोलेंगे मारे जायेंगे.....' .आज का कड़वा सच यही है कि जो भी फासीवादी ताकतों के खिलाफ बोलेंगे वे लीन्चिंग में (भीड़ द्वारा) मारे जायेंगे . अजय सिंह जी इन फासीवादी ताकतों के खिलाफ लगातार लिख रहे हैं. उनके साहस को सलाम. वरना यहा कलबुर्गी , गौरी लंकेश जैसे लोगों की आवाज को हमेशा के लिए दबा दिया जाता है. पर लोकतंत्र को बचाने के लिए लोकतंत्र विरोधी ताकतों से लड़ना जरूरी है. इसमें तटस्थता से काम नहीं चलेगा. दिनकर ने भी कहा है - समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध . अजय जी की कलम ऐसे ही चलती रहे यही उनसे उम्मीद और कामना करते हैः.- राज वाल्मीकि