साहेब का चुनावी माफ़ीनामा

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 26-01-2019


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वीना

सुना है साहेब बहुजनों की एकता से घबराए हुए हैं। प्रेस का सामना करने के नाम पर पहले ही से पसीने छूटते हैं। अब भाषणों में भी बार-बार रुमाल का सहारा लेना पड़ रहा है। बोलने से पहले ही आज पसीना पोछा और किसी योद्धा का सा दिखावा करते हुए मुंह खोला। 

मैं घर वापसी करना चाहता हूं...

और इसके लिए कुछ भी करूंगा...

साहब ने पहली लाइन करुणा रस और दूसरी वीर रस में उछाली। इससे पहले कि इन दोनों रसों की मार  सामने बैठे सुनने वालों तक पहुंचे सबने झट अपने माथे ढक लिए। पहले घाव अभी तक गला फाड़-फाड़ चिल्ला रहे हैं। नए को जगह कौन दे। पर साहेब ठहरे साहेब। उन्हें अपने टैलेंट पर पूरा भरोसा है। घाव पर घाव रगड़ने के लिए माथे अपने सामने नतमस्तक न करवाए तो साहेब न कहना कोई। साहेब ने ख़ुद से शर्त लगाई। दाएं से बाएं एक बार गर्दन घुमाकर जायज़ा लिया और हो गए शुरू। देखे भला, मुझसे बचकर कहां जाते हो के अंदाज़ में।

भाइयों-बहनों, शिक्षा और नौकरियों में 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण को वापस न करुं तो मेरा नाम बदल देना।  अगर मैं अपनी बात पर खरा न उतरूं तो मेरी फिर "चोटीखाने" में... मतलब... संघ में वापसी करा देना, भाईयो-बहनों। 

जैसाकि सब जानते हैं, वहां चोटियों का राज है। चोटीखाने के हिन्दूराष्ट्र में तो मुझे झाड़ू लगाने का ही काम मिलेगा। इससे ज़्यादा मेरी औक़ात नहीं है।

ऐसा नहीं है कि मैं चोटी नहीं उगा सकता। आप तो जानते ही हैं कि रूप बदलने में मैं कितना माहिर हूं। बहरूपिया हूं,पक्का बहरूपिया। पर हिंदू-स्थान में मुझे चोटी उगाने की इज़ाजत नहीं है। अगर मैंने ऐसा भूल से भी किया तो मुझे कोड़ों की मार लगेगी।

न...न... ये बातें जो अब मैं आपसे कह रहा हूं ये सच्चे मन से कह रहा हूं। अब मेरा यही रूप रहेगा। जो असल में है। मैं तो कामदार का कामदार बेटा हूं। आप सब में से एक। बहन मायावती का बिछड़ा भाई।

जैसे ही मैं वापस सत्ता में आऊंगा सबसे पहले 10 प्रतिशत आरक्षण को गटर में फेंकूंगा। क्या मैं अपने दलित-आदिवासी, पिछड़े भाईयों का दर्द नहीं समझता? ये सब तो मैंने आप सबको नामदारों की असलियत दिखाने के लिए किया था। 

मुझे मालूम नहीं क्या, हमारे कामदार भाई-बहन अपने कोटे की नौकरी पाने में भी असमर्थ हैं? शिक्षा तक उनकी पहुंच जो नहीं है। बेचारों के पास एक वक़्त की रोटी नहीं है तो स्कूल कैसे पहुंचेगे?

मैंने खुद ये सब भुगता है। मेरा बाप चाय बेचता था। मां दूसरों के घर में बर्तन-झाड़ू करती थी। खुद मैं चाय बेचता था। पढ़ता कब? सो नामदारों की दुनिया में नाम बनाने के लिए डिगरी का इंतेजाम करना पड़ा। जिसके लिए ये नामुराद नामदार मुझे जेल भेजने पर उतारूं हैं।

इन चोटीदार, जनेऊधारी  ब्राह्मणों ने मेरा खूब फ़ायदा उठाया है। मुझे हिंदू-स्थान बनाने में लगा दिया। वही हिंदू-स्थान जिसकी झलक आप सबने अभी हाल ही में ओड़ीसा में देखी। जब एक कथित नीची जाति की औरत के मरने पर उसके बेटे को मां की लाश साईकिल पर रखकर अकेले उसे ठिकाने लगाने जंगल में जाना पड़ा। कथित ऊंची जाति वाले हिंदुओं ने उसकी मां के अंतिम संस्कार के लिए उसे चिता तक ले जाना ज़रूरी नहीं समझा। 

भाईयों-बहनों, मैं भटक गया था। हिंदू धर्म के अनुसार मैं नीच जात से हूं। मैं र्धूत बामणों की चालों में फंस गया। मैंने अपने ही भाई-बंधुओं की इनकी गाय माता के नाम पर अपने गुजरात ही में खाल-खिंचवाई। 

बुद्धिजीवी कहते हैं कि ये जो खुद को आर्य कहते हैं अतीत में गौवंश का मास इनका प्रिय आहार हुआ करता था। मैं अनपढ़-मूरख भला क्या जानूं। आज इन्होंने मुझसे कहा कि गौवंश इनके लिए पूजनीय है। मैंने मान लिया। मज़लूमों की रोज़ी-रोटी को नज़रंदाज़ कर मैंने इनकी गाय को वीआईपी दर्ज़ा दिलवाया। 

और इन्होंने क्या करवाया! मेरे ग़रीब मुसलमान भाई जो गाय को इज़्ज़त से, बढ़िया चारा खिलाकर उसके दूध से अपना काम चलाते हैं उनकी सरेआम लिंचिंग करवा रहे हैं। मेरे वो शूद्र-दलित, पिछड़े भाई जिन्होंने इनके ऊँच-नीच के अत्याचारों से तंग आकर इस्लाम अपनाया था।

इन्होंने एक बामण की महत्वाकांक्षा की बलि चढ़वाकर मुझसे बाकी सभी सवर्ण-बामणों का राज्याभिषेक करवा लिया। और मैं मूरख, बढ़िया खाने-कपड़े-लत्ते, सैर-सपाटों, ठाट-बाट के लालच में अपने को और अपनों को नर्क में धकेलता गया।

मेरे जात भाई सीवर में मैला खा-खाकर मर रहे हैं। और मैं इन जनेऊधारियों को नौकरी-शिक्षा के सारे अवसर भेट करने में लगा रहा। मेरी संतोषी भूख से मरती रही और मैं अंबानी-अडानी, टाटा-बिड़ला आदि-आदि पर हज़ारों-लाखों करोड़ लुटाता रहा।

मुझे माफ़ कर दो मेरे जात भाईयों! मेरे कामदार हमसफ़र साथियों, मैं जान गया हूं, इन चोटी-तराजुओं के राज में हम जैसे कामदारों का, पिछड़े-नीच कहे जाने वालों का आखि़र क्या हश्र होना है। 

माफ़ करो, मुझे माफ़ करो बहन जी। मेरी क्षत्र छाया में वो साधना सिंह आपको न जाने क्या-क्या कह गई। मैं भी तो आख़िर 85 का हिस्सा हूं। जो 15 के बहकावे में आ गया। अब मैं भी बहुजन का जन हूँ। धत्त तेरी नागपुर! मैं चला भीमा कोरेगांव। चलो, सब भिड़े-एकबोटे को जेल में डालें और अपने भीम भाइयों को बाइज़्ज़त रिहा करें।

सुनने वालों ने अबकी बार डबल सुरक्षा से माथे ढाप लिए। साहब झल्लाए पर ख़ुद को नियंत्रित करते हुए बोले -

ओह! मुझपर विश्वास नहीं। मैं सचमुच घर वापसी चाहता हूँ। चाहो तो अग्नि परीक्षा ले लो। बताओ, बताओ कहाँ जलानी है मनुस्मृति। किसी फटेहाल ने भीड़ से चिल्लाकर कहा - "धूर्त बहरूपिये, फिर गद्दी हड़पने के लिये रेंकने लगा।" नहीं... मेरे भाई... नहीं... मुझे ग़लत न समझो।

इन दिनों, सपने में मुझे उड़ीसा का वो बालक अपनी माँ की लाश साईकिल पर ढोता नज़र आता है। उसकी पीठ, लगातार पड़ रहे हिन्दू-राष्ट्र के कोडों से लहूलुहान है।  "ऐ सुनो!" जब मैं उसे आवाज़ लगाता हूँ तो वो मुस्कराकर मेरी तरफ़ पलटता है। और फिर मैं क्या देखता हूं कि वो मुस्कराता चेहरा मेरा है!!

अब साहब हाथ जोड़कर रोते हुए बोला -

मैं बस इस सपने से निजात चाहता हूँ। उस बालक और उसकी माँ से माफ़ी चाहता हूँ। हर उस किसान से माफ़ी चाहता हूं जो मुझ पर विश्वास करके, अपना ख़ून-पसीना खेतों में बहाकर भी फांसी के फंदे पर झूलने को मजबूर हुआ। 

उन मासूम आदिवासी बच्चियों से माफ़ी चाहता हूं जिनकी ज़मीन धन्नासेठों को लुटाने के लिए, रौंदे गए उनके कोमल जिस्म। उन्हें आतंकवादी-नक्सली बताकर मसला-मारा गया। उनके भाई-पिताओं से माफ़ी चाहता हूँ जो बेमौत मारे गए। 

ओह! मैं बस, 2002 से लेकर अब तक के अपने सभी गुनाहों की माफ़ी चाहता हूँ। मैं घर वापसी चाहता हूँ।

सामने बैठे लोगों के चेहरे ऐसे भावहीन हैं जैसे वो साहब की भाषा से अनजान है। साहब रोता रहा और लोग साहब की खिचड़ी की तरह साहब को छोड़कर, अपना माथा बचाए निकल लिए।

अब साहब अपने आपे से बाहर हो गया। और दहाड़ कर बोला - "भुगतना पड़ेगा, तुम सबको इसका अंजाम भुगतना पड़ेगा..."


(वीना पेशे से फिल्मकार, पत्रकार और व्यंग्यकार हैं।)








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