खेल शुरू हो गया है और चक्करवर्ती स्रमाट ठहाके लगाकर मजा ले रहे हैं!

आड़ा-तिरछा , , रविवार , 20-01-2019


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भूपेश पंत

चक्करवर्ती सम्राट आज विरोधियों को बच्चा समझ कर उनके साथ स्टापू खेलना चाहते हैं। उन्हें सबको एक टांग पर खड़ा देखना बचपन से पसंद है। सम्राट को पूरा भरोसा है कि इससे उन्हें विरोधियों की चाल पहचानने में मदद मिलेगी और उनके चक्करधारी स्वयंभू सेवकों का मनोबल बढ़ेगा। फिलहाल सम्राट अपने मुंहलगे शाही विदूषक से खेल की रणनीति पर गोपनीय चर्चा कर रहे हैं।

सम्राट (कान की तरफ मुंह ले जाते हुए) - 'देखो विदूषक.. तुम अन्ना पन्ना जो भी मंत्र करो इस बार मेरा खेल खराब नहीं होना चाहिये। पिछली बार तो मैंने सब विरोधियों के दोनों पांव ही राज्य हित और विकास की रस्सियों से बांध दिये थे। जिसने भी खेलने की कोशिश की वो मुँह के बल गिरा। लेकिन इस बार जरा तिकड़म से काम लेना होगा।'

विदूषक (चापलूसी भरे अंदाज़ में) - 'आप तनिक भी चिंता मत कीजिये सम्राट। खेल को जीतने की पूरी तैयारी हो चुकी है। मार्गदर्शक मंडल से रेफरी दोनों कोनों पर खड़े रहेंगे। उन्हें बताया जा चुका है कि कोई ऐसा काम न करें जिससे सम्राट के खेमे का नुकसान हो।'

सम्राट (दोनों हाथ उठाकर) - 'बस दुआ करो कि कोई शत्रुघ्न न पड़े... '

विदूषक (मुस्कुरा कर टोकता है) - 'अरे वो विघ्न होता है सम्राट'

सम्राट - 'हां हां वही... नियम कायदे सब वही हैं ना जो हमने तय किये थे?'

विदूषक - 'जी सम्राट। हमने लोकतंत्र को बचाने और राष्ट्रहित में खेल के नियम बदल दिये हैं जो अंतत: हमारी जीत का मार्ग प्रशस्त करेंगे। इस खेल को बच्चे जीतने के लिये तो खेलेंगे लेकिन हम उस जीत को मामा मारीच के स्वर्ण मृग की तरह छलावे में बदल देंगे।'

सम्राट - 'मुझे तो लगता है कि इससे विरोधियों का बचपना अगले पांच साल तक भी कायम रहेगा।' (....और अपने इस दिवा स्वप्न पर वो बच्चे की तरह ठहाका मार कर हँस पड़ते हैं।)

विदूषक - 'सम्राट आज हम सबको उनकी दादी-नानी याद करा देंगे। आप खेल शुरू तो कीजिये।'

सम्राट (मुड़ कर सब खिलाड़ियों से मुखातिब होते हुए) - 'तो ये तय हुआ है कि स्टापू के खाने राज्य के पूरे नक्शे में बने प्रांतों के हिसाब से बनेंगे। सभी दलों के खिलाड़ियों को उसी खाने में पूर्ण विश्राम मिलेगा जहां वो बहुमत में होगा। जहां वो अल्पमत में होगा वहां उसे लंगड़ी मार कर ही खड़ा रहना होगा। इसके अलावा विरोधियों को समय समय पर बाहरी अवरोधों का सामना करना होगा जो वक्त आने तक गोपनीय रहेंगे।

दर्शक - 'लेकिन ये तो सरासर बेईमानी है। ज्यादातर प्रांतों में तो आपको बहुमत है। सारे विरोधी खिलाड़ी एकजुट हो जाएं तो भी आराम से नहीं खेल सकते।'

सम्राट समर्थक (अचंभित होते हुए) - 'अरे महाशय... आप तब कहां थे जब विरोधी सत्ता में होते हुए पूरे राज्य पर एकतरफा लंगड़ी कूद रहे थे। तब तो उसने विपक्ष को खड़ा तक होने नहीं दिया था। अगर तब लोकतंत्र मजबूत हो रहा था तो आज भी वही मजबूत हो रहा है।'

विरोधी समर्थक (गुस्से में) - 'अरे हमने इस राज्य को बनाया है चाहे लँगड़ा ही बनाया हो। तुम तो इसे गूंगा और बहरा भी बना देना चाहते हो।'

सम्राट (मंद मंद मुस्काते हुए)- 'देखो एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाना भले मत छोड़ो क्योंकि ये भी जन्ता के मनोरंजन का एक हिस्सा है.. लेकिन खेल तो खेलना ही होगा। जीत भले ही पहले से तय हो और.... (छाती ठोकते हुए) जीतना तो लोकतंत्र को ही है।'

सभी खिलाड़ी (समवेत स्वर में) - 'हम सब खेल शुरू करने के लिये तैयार हैं।'

सम्राट - 'तो चलो.. इस खेल को शुरू करते हैं.. अब तुम सब लोग मां की कसम खाओ कि खेल में कोई बेईमानी नहीं करोगे।'

दर्शक - 'लेकिन पहले आप तो खाओ सम्राट...'

सम्राट (पेट पर हाथ फिराते हुए) - 'देखो मैं तो मां की कसम खाकर ही पैदा हुआ हूं इसलिए झूठ नहीं बोलता.. और अब तो ये गरीब का बच्चा... फकीर बन चुका है। ये कसम तो विरोधियों को ही खानी होगी क्योंकि उन्हीं का मातृप्रेम संदिग्ध है।'

विरोधी - 'ये तो गलत आरोप है सम्राट। हम सब अपनी अपनी मां से बहुत प्रेम करते हैं।'

सम्राट - 'झूठ मत बोलो... तुम सिर्फ़ राजमाता से प्रेम करते हो। अच्छा बताओ क्या तुम गो माता से प्रेम करते हो... खाओ गो माता की कसम... '

विरोधी - 'लेकिन सम्राट हम तो गो माता से भी प्रेम करते हैं और उसकी कसम भी नहीं खा सकते। ...जहां तक राजमाता की बात है अब वो हमारे राज्य की बहू हैं। उन्हें बात बात पर ताने मारना उचित नहीं।'

सम्राट - 'देखो... अगर तुम्हें गो माता से प्रेम होता तो भीड़ के हाथों हंसते हंसते उसके नाम पर शहीद हो जाते.. इतना बिलबिलाते नहीं। ... और बहुओं को ताने देना हमारी सामाजिक परंपरा है।'

दर्शक - 'लेकिन आप तो बेटियों को बचाने और पढ़ाने की बात करते नहीं थकते।'

सम्राट - 'बहू सिर्फ़ बहू होती है और बेटी से उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती। बेटियों को पढ़ाना इसलिए ज़रूरी है ताकि वो अपने सामाजिक दायरे में बंध कर रहना सीखें। तुम बहू बेटी छोड़ो और मां की कसम खाकर खेल शुरू करो।'

विरोधी - 'यानी सारी कसमें हम खायें और आप राज्य की सारी विकास योजनाएं डकार जाएं। ये नहीं चलेगा... मां तो मां होती है चाहे हमारी हो या आपकी। आप खाओगे तो हम भी खा लेंगे।'

सम्राट - 'हां हां तुम लोगों को तो दशकों से खाने की आदत है और हमने कुछ साल खा लिया तो पेट में दर्द होने लगा। ... तुम लोग जानते हो कि मैं फोटो खिंचाने से भी ज्यादा अहमियत मां के आशीर्वाद को देता हूँ। जब मैं बड़े जहाज, पुल, राजमार्ग और कांसे की प्रतिमा तक पचा सकता हूँ तो ये मां की कसम क्या चीज है। भूल गये मैंने कैसे गंगा मां को पवित्र करने की कसम खायी थी।'

विरोधी - 'और जो उसके ऊपर भ्रष्टाचार की गंगा बहा दी उसका क्या?'

सम्राट - 'अरे मूर्खों ये वाली गंगा केवल मेरी मां नहीं है.. ये तो सतत प्रवाहित होती रहती है लेकिन जब तक खेल नहीं जीतोगे तुम इसमें डुबकी नहीं लगा पाओगे... चलो इसी गंगा मां के नाम पर हम सब कसम खायें और खेल शुरू करें।'

अंतत: सभी दलों के खिलाड़ी मां की कसम खाते हैं कि राज्य हित को सर्वोपरि मानते हुए बेइमानी के खेल को पूरी ईमानदारी से खेलेंगे। खेल शुरू हो चुका है और चक्करवर्ती सम्राट अपने शाही विदूषक के साथ विरोधियों की तमाम लंगड़ी चालों पर ठहाके लगा रहे हैं। इस दौरान खिलाड़ियों को एक दूसरे को मां की गाली देने की खुली छूट है।

जन्ता कहीं दूर घर पर बैठी इस पूरे खेल के साक्षात दर्शन कर रही है। उसके पास पड़े मोबाइल पर आनंद मठ से फोन आ रहा है और रिंग टोन बज रही है... वंदे मातरम्.. सुजलाम् सुफलाम् मलयज शीतलाम्...

(भूपेश पंत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

 








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