दि राफेल...दि रॉयल....दि रीयल भी नहीं.....दि कांफिडेंशियल चक्करवर्ती सम्राट!

आड़ा-तिरछा , , रविवार , 30-12-2018


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भूपेश पंत

आज चक्करवर्ती सम्राट के सामने बड़ी अजीब उलझन है। जब से पता चला है कि उनके राज्य का कोई लेखक उन पर एक किताब लिख रहा है, वो सोच रहे हैं कि उसे इसकी इजाज़त दी भी जाये या नहीं। सम्राट को अच्छी तरह मालूम है कि उन पर लिखी कोई भी किताब आगे जाकर बायोपिक में बदल सकती है। वैसे तो वो खुद बहुत कैमरा फ्रैंडली हैं और बड़े से बड़े मौके पर भी वो उनकी निगाहों से छिप नहीं पाता लेकिन ये जानना भी ज़रूरी है कि उनके बारे में आखिर कैसे और क्या लिखा जा रहा है। लिहाज़ा सम्राट ने अपने मुंहलगे सलाहकार शाही विदूषक को भेजा है उस लेखक को लिवाने, बस उसी का इंतज़ार है।

शाही विदूषक (कक्ष में प्रवेश करते हुए) - 'वाह सम्राट वाह। आपकी अनुमति हो तो मैं उस लेखक को पेश करूं जो आपके ऊपर किताब लिखने की हिमाकत कर रहा है।'

सम्राट (उत्सुकता से) - 'कुछ बताया उसने कि वो हमारे बारे में क्या लिख रहा है?'

विदूषक - 'नहीं सम्राट, कहता है सब कुछ कॉन्फीडेंशियल है। मुझे लगता है आपके सामने ही कुछ बकेगा।'

सम्राट - 'ठीक है तो फिर जल्दी बुलाओ उसे...'

विदूषक कक्ष के प्रहरी को संकेत करता है। थोड़ी देर में एक लेखकनुमा आदमी अकड़ भरी चाल के साथ दरवाजे पर नमूदार होता है और अभिवादन करते हुए सम्राट से कुछ दूरी पर खड़ा हो जाता है।

सम्राट (भौंहें सिकोड़ते हुए) - 'क्या हुआ लेखक, तुमने मेरी जै जैकार नहीं की..?'

लेखक चुप्पी साधे खड़ा रहता है।

सम्राट (समझाते हुए) - 'देखो हमारे राज्य में सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है इसलिये निडर होकर बोलो वाह सम्राट वाह।'

लेखक - 'लेकिन सम्राट इस वक्त मेरा मौन ही मेरी अभिव्यक्ति है। कहते हैं ना कि जो गरजते हैं वो बरसते नहीं।'

सम्राट (विदूषक की ओर देख आंख दबाते हुए) - 'लेकिन मौनं स्वीकारम् लक्षणम् भी तो होता है। तभी तो हमने पूर्ववर्ती के मौन पर निशाना साधकर विरोधियों को बेचैन कर दिया है। अब जो वो बोलें तो फजीहत और न बोलें तो और फजीहत। खैर.. तुम ये बताओ कि मेरी जै जैकार करने में क्या दिक्कत है?'

लेखक - 'बात ही कुछ कॉन्फीडेंशियल है सम्राट।'

सम्राट (विदूषक से मुखातिब होते हुए) - '...तुम सही कह रहे थे, ये तो काफी अड़ियल लग रहा है।'

विदूषक - 'आप शांत रहें सम्राट... मैं इसकी ऐसी नस दबाऊंगा कि तोते की तरह मीटू मीटू बोलने लगेगा। फिर भी नहीं माना तो इसके घर की सारी किताबें ज़ब्त करा के बाग़ी घोषित करा देंगे... (लेखक को घूरते हुए)...सम्राट के ऊपर कोई किताब लिख रहा है ना तू। बता क्या है उस किताब में।'

लेखक - 'विदूषक जी, मैंने बताया ना आपको सब कुछ कॉन्फीडेंशियल है।'

सम्राट (भड़कते हुए) - 'अरे... ये ऐसे नहीं मानेगा। हमारे बनाये गोपनीयता कानून का इस्तेमाल हमारे ही सामने कर रहा है। शायद इसे पता नहीं कि इसका लैपटॉप और फोन जब्त कर हम एक मिनट में सब कुछ जान सकते हैं। वो तो हमारे राज्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है इसलिये वरना...'

लेखक (कसमसाते हुए) - 'लेकिन सम्राट.... मैं तो बता रहा हूँ कि मेरी किताब का नाम ही कॉन्फीडेंशियल यानी गोपनीय है...... द कॉन्फीडेंशियल चक्करवर्ती सम्राट।

सम्राट (सिंहासन पर पसरते हुए) - 'हम्म... नाम तो अच्छा है। लेकिन यही नाम क्यों... द राफेल.. सॉरी.. द रॉयल, द रीयल, द जेंटल, द सेंटीमेंटल, द जजमेंटल कुछ भी हो सकता था।'

लेखक - 'क्योंकि मेरे कुछ मित्र इन नामों का इस्तेमाल करके आपके ऊपर या तो बहुत कुछ लिख चुके हैं या लिखने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सच तो ये है कि आपके जीवन और व्यक्तित्व की सारी खूबियां इस एक नाम से ही प्रकट होती हैं सम्राट।'

सम्राट - 'वो कैसे?'

लेखक - 'देखिये सम्राट, आप मौजूदा हालात में भी कितने कॉन्फीडेंट हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह है कि आपको अपनी हर बात और हर दांव कॉन्फीडेंशियल रखने की कला आती है। इसी बात ने मुझे आपके ऊपर ये किताब लिखने की प्रेरणा दी।'

विदूषक - 'लगता है सम्राट को सुनने में अच्छा लग रहा है थोड़ा खुल कर बताओ।'

लेखक (विदूषक से मुखातिब हो कर) - ऐसी एक दो नहीं अनेकों बातें हैं... सबसे पहले तो मुझे इसकी प्रेरणा चक्करवर्ती सम्राट के उन विकास कार्यों से मिली जिन्हें पिछले साढ़े चार सालों में देशहित में गोपनीय तौर पर लागू किया गया। सम्राट ने देशहित में विदेश से जहाज खरीदे और देश हित में ही विपक्ष को उसकी कीमत नहीं बतायी। कानून के सर्वोच्च पदाधिकारी से देशहित में गोपनीय मुलाकात की। एक ओर सफाई अभियान का ढिंढोरा पीटा और दूसरी ओर गोपनीय तरीके से काले अंधेरे कोनों में पड़ी देश की स्वर्ण मोहरों को रद्द करके चांदी मिश्रित नई मोहरें चलायीं। सम्राट ने बड़े ही गोपनीय तरीके से अपने मित्रों को मोहरों के साथ राज्य के बाहर भेज दिया और उसी तरह राज्य का सबसे बड़ा मंदिर बनाने की तारीख अब तक गोपनीय रखी है। यही नहीं आपने तो गोपनीय तरीके से अपना वोट बैंक भी बदल दिया।

सम्राट (आनंद में डूबते हुए) - 'आगे बोलो.. '

लेखक - 'सम्राट आप गोपनीय तरीके से पड़ोसी राज्य में बिरयानी खाने जा पहुंचे और उतनी ही गोपनीयता से राज्य में गोपनीय जांच करने वालों को हटा दिया गया। पार्टी को मिलने वाले विदेशी चंदों को गोपनीय बना दिया गया। गोपनीय रूप से पड़ोसी देश पर सर्जिकल स्ट्राइक की गयी और फिर उसे राष्ट्रभक्ति के दबाव में सार्वजनिक भी कर दिया गया। देश हित में अपने फैसलों को कॉन्फीडेंशियल रखने या न रखने का ये कॉन्फीडेंस भरे पूरे लोकतंत्र में और कौन दिखा सकता है हमारे सम्राट के अलावा।'

सम्राट (अचंभित मुद्रा में) - 'लेकिन तुम मेरे व्यक्तित्व का ये गोपनीय पहलू देख कैसे पाये?'

लेखक - 'ये वही गोपनीय बात है सम्राट जो मुझे आपके मन की बात से जोड़ती है और मैं सब समझ जाता हूँ।'

सम्राट (हैरानी के साथ)- ऐसी क्या खूबियां हैं जो हम दोनों में एक सी हैं?

लेखक - 'देखिये सम्राट, बात परिवार से शुरू करते हैं। मैं घर में सबके लिये चाय खुद बनाता हूँ। मुझे महंगे कपड़ों का शौक़ है। मैंने अपने घर के बुजुर्गों को मार्गदर्शक माना है और उन्हें सलाह देने लायक भी नहीं छोड़ा है। घर छोड़ने की धमकी से मेरी पत्नी कभी ऊंची आवाज़ में बात नहीं करती। मैं ज्यादातर समय घर से गायब रहता हूँ इसलिए घरेलू मोर्चे पर मेरा स्वागत टूरिस्ट की तरह होता है। यानी सब कुछ मेरे मन का। मुझे बोलने से ज्यादा लिखने का शौक है और मैं उन्हीं सवालों के जवाब देना पसंद करता हूँ जो मैंने खुद लिखे हों। मैं अपने लेखन को काम पूरा होने तक गोपनीय रखता हूँ। अब इससे ज़्यादा क्या चाहिये आपको?'

सम्राट - 'कमाल है.. लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? ये कौन सा तार है जो हम दोनों के मन इस तरह जोड़े हुए है?'

लेखक - 'तार नहीं सम्राट... तारीख़...सत्रह सितंबर'

विदूषक (बेचैनी से) - 'अब ये कौन सी तारीख़ है?'

लेखक - 'अरे विदूषक जी.. ये कोई मंदिर बनाने की तारीख़ नहीं है.. जन्म की तारीख है मेरी और चक्करवर्ती सम्राट की। यही तो सबसे कॉन्फीडेंशियल बात है जिसका मैं बार बार ज़िक्र कर रहा था। ग़नीमत है कि कुछ सालों का हेरफेर हो गया वरना चक्करवर्ती सम्राट के गोपनीय पहलुओं को समझने में इतना समय नहीं लगता। लेकिन तब शायद मैं कुछ मौलिक लिख पाने के काबिल भी नहीं रहता।'

सम्राट (गंभीर होते हुए) - 'सुनो लेखक, तुम जो ये किताब लिख रहे हो उसे प्रकाशित करवाने से पहले मुझे गोपनीय तरीके से पढ़ा देना ताकि हमारे राज्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार पूरी गोपनीयता के साथ सुरक्षित रहे। शर्त ये भी है कि इसे पढ़कर जन्ता ने मेरी जै जैकार नहीं की तो तुम्हारी खैर नहीं।'

विदूषक (गोपनीय अंदाज़ में) - 'और तुम्हें किताब की रॉयल्टी का आधा हिस्सा पार्टी फंड में जमा कराना होगा। वो हम तक पहुंच जाएगा।'

सम्राट - 'सुनो लेखक.. क्या तुम इस किताब पर कोई बायोपिक बनवाने की सोच रहे हो?'

लेखक - 'ये तो फिलहाल कॉन्फीडेंशियल है सम्राट।'

सम्राट - 'लेकिन कान खोल कर सुन लो इस बायोपिक में लीड रोल मैं ही करूंगा। बिकॉज आई लव माई सिनेमा... आई लव माई एक्टिंग।'

लेखक पूरी अकड़ के साथ कक्ष से बाहर निकल जाता है। और चक्करवर्ती सम्राट और शाही विदूषक के चेहरों पर छोड़ जाता है... गोपनीय मुस्कान। पार्श्व में कहीं बज रहा है...

'चुप तुम रहो, चुप हम रहें... मन की बात करने दो..।'

(भूपेश पंत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

 








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