आरक्षण-जातिवाद का मिक्स्ड क्लोरोफार्म और मूर्छित जनता का ऑपरेशन

आड़ा-तिरछा , , बुधवार , 16-01-2019


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भूपेश पंत

लोकतंत्र के नाम से मशहूर चक्करवर्ती सम्राट का आलीशान महल किसी बड़े अस्पताल में तबदील हो चुका है। सम्राट खुद सर्जन की भूमिका में देश हित के लिये जन्ता के ऑपरेशन की तैयारी में हैं। सम्राट को वैसे तो इस काम में अपने शाही विदूषक के अलावा किसी की मदद की दरकार नहीं है लेकिन जब उनके जीवन मरण का प्रश्न हो तो सबको साथ ले डूबने की प्रवृत्ति के तहत कुछ सलाहकार और प्रांतीय अधिपति भी ऑपरेशन में शामिल हैं। मजबूर से मार्गदर्शक डॉक्टर दरवाजे पर लगे छोटे से शीशे से भीतर निहार रहे हैं और जन्ता ऑपरेशन थियेटर के बेड पर पड़ी कराह रही है।

सम्राट (विदूषक से मुखातिब होकर) - 'तुमने ठीक किया, ये जन्ता बहुत नाटक कर रही थी। इस ऑपरेशन के बाद ज़रूर इसको अहसास हो जाएगा कि हमारी ताकत क्या है। हम वोटतंत्र को लूटतंत्र में बदल सकते हैं तो क्या अगले चुनाव में हारने के बाद भी सरकार नहीं बदल सकते?'

विदूषक (कुटिल हास्य के साथ) - 'सही कहा सम्राट, जब उसे लगेगा कि बदलाव का भी कोई फायदा नहीं होगा तो वो या तो निकलेगी ही नहीं या फिर नोटा का लोटा लेकर दिशा मैदान को निकल लेगी, स्वच्छता अभियान जाए भाड़ में।'

सम्राट (सिर हिला कर सहमति जताते हुए) - 'बिल्कुल... उसका ध्यान ऑपरेशन के बाद होने वाले दर्द पर लगा रहेगा और जोर जोर से चिल्लाएगी.. वो अपने असली जख़्म भूल जाएगी... तब हम उसके माथे को थोड़ा सहलायेंगे। हमने अगले पांच साल तक उसके कई ऑपरेशन भी तो करने हैं। खास कर उन अंगों के जो हमारे इशारे पर काम नहीं करते और विरोधी की ही सुनते हैं।'

विदूषक (उत्साहित होते हुए) - 'और सम्राट... इससे जन्ता में उन तमाम सर्जिकल ऑपरेशनों की याद ताज़ा हो जाएगी जो हम गुर्दों, फेफड़ों, मुंह, आँखों और दिमाग पर कर चुके हैं।'

सम्राट - 'विदूषक... तुम उन अंगों को तो भूल ही गये जिन्हें हम दिन हो या आधी रात, अपने ऑपरेशन से सुन्न कर चुके हैं। खास कर नोट के नाम पर उद्वेलित होने वाली जन्ता की सबसे कमजोर नस को तो हम बंद भी कर चुके हैं। खैर.. (झुंझलाते हुए) यार ये बार बार फ्लॉप फिल्म की स्क्रिप्ट मेरी जुबान पर क्यों आ जाती है.. तुम ये बताओ कि जन्ता के ऑपरेशन के जरिए विरोधियों का नाटक खत्म करने की तैयारी पूरी हो गयी?'

विदूषक - 'जी सम्राट हमने साम, दाम, दंड, भेद से भरकर जन्ता के इस सबसे नाटकीय अंग को सुन्न करने का इंजेक्शन लगा दिया है। अगर हर बार की तरह ये ऑपरेशन भी कामयाब रहा तो जन्ता के मन में हमारा प्रभाव बढ़ जाएगा।'

सम्राट (गर्वीली मुस्कान के साथ) - 'इन ऑपरेशनों की वजह से ही तो दुनिया के डॉक्टरों में हमारा डंका बज रहा है।'

इस बीच बेड पर लेटी जन्ता थोड़ा होश में आकर कराहने की आवाज़ में जुमला जुमला जैसा कुछ बोलने की कोशिश करती है।

सम्राट (चौंकते हुए) - 'अरे विदूषक... तुम तो जानते हो मैं फकीर आदमी हूं। मुझसे किसी का दर्द देखा नहीं जाता। लगता है जन्ता पर से हमारी रामबाण दवा और विकास की गोली का असर खत्म हो रहा है। (दरवाजे की ओर जाते हुए) तुम इसे फटाफट आरक्षण और जातिवाद का मिक्स्ड क्लोरोफॉर्म सुंघाओ तब तक मैं अपने आंसू पोछ कर और चेहरा चमका कर आता हूँ।'

विदूषक - 'जी सम्राट बस आप जल्दी आना क्योंकि आपके और हमारे यानी लोकतंत्र के हित में ये ऑपरेशन बहुत ज़रूरी है।'

सम्राट के ऑपरेशन थियेटर से जाते ही शाही विदूषक जन्ता को फिर से सुन्न करते हैं। साथ में मौजूद प्रांतीय अधिपति जन्ता के पूरे जिस्म पर खरोंचे गये निशानों और उनकी ताजगी को देख तालियाँ बजा रहे हैं। ये निशान कहीं गाय के सींग की तरह जन्ता को आरपार भेद गये हैं तो कहीं जोंकों के लगातार चूसे जाने का प्रमाण दे रहे हैं। जन्ता पांच साल से अपने अच्छे दिन के इंतज़ार में लगातार देश हित में सारे ऑपरेशन झेल रही है। पता नहीं इस बार अपनी उँगली पर पोलियो ड्रॉप का जैसा निशान लगवाने के लिये उठ भी पाएगी या नहीं।

विदूषक (सहयोगियों से) - 'देखो.. तुम सब अपनी-अपनी निगरानी वाले अंगों को संभाल कर रखना। वैसे भी हमने जन्ता के दिमाग को सुन्न कर दिया है लेकिन दिल अभी अपने कब्जे में नहीं है। अगली बार बाईपास की तैयारी भी करनी है।'

सम्राट (तेजी से आते हुए) - 'चलो विदूषक.. शुरू करते हैं एक और ऑपरेशन का नाटक.. सबके घोड़े खोल दो और शाही खजाने से लेकर हमारे निजी खजाने का मुँह खोल दो। जन्ता को उतनी ही देर होश में लाना है जितने में वो सिर्फ़ हमें पहचान सके। और हां.. इस ऑपरेशन का कुछ नाम भी रखा या नहीं?'

विदूषक - 'जी सम्राट, ऑपरेशन राजमहल।'

ऑपरेशन थियेटर के बाहर जलती लाल बत्ती बता रही है कि भीतर काम चल रहा है। एक खिड़की हवा के झोंके से थोड़ी खुल गयी है। दोनों पटों के बीच से झांकती दरार में से दिख रही जन्ता मूर्छा में है फिर भी पता नहीं कौन गा रहा है...

क्या से क्या हो गया... बेवफ़ा तेरे प्यार में....।

(भूपेश पंत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)








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