ऐसे गणतंत्र दिवस से डर लगता है मोदी जी..!

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 27-01-2018


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वीना

गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस का भव्य, ताकतवर आयोजन एक आम नागरिक की हैसियत से मुझे डराता है। समझ नहीं आता कि गरिमा के नाम पर अपनी ऐंठ का ये खर्चीला प्रदर्शन दुनिया को डराने-दिखाने के लिए होता है या अपने देशवासियों को धमकाने के लिए। 

सुना है 15 अगस्त, 26 जनवरी को मोदी साहब ने होली-दिवाली की तरह मनाने की ठानी है। इसीलिए शूद्र जाति में जनमने के बाद भी वो राजपूताना शान की पगड़ी बांध कर तने हुए समारोह में आते हैं। 

पर ये छूट साहब तक ही सीमित है। कोई अन्य शूद्र-अछूत इसे दोहराने की कोशिश न करे। वरना सहारनपुर के दलित चंद्रशेखर आज़ाद रावण की तरह वो देशद्रोह के जुर्म में जेल में सड़ा दिया जा सकता है। बाक़ी जो हां में हां मिलाएगा, तोपों की सलामी पाएगा।

इस गणतंत्र दिवस पर अपनी शान-ओ-शौक़त दिखाने के लिए प्रधानमंत्री ने 10 आसियान देशों के प्रमुखों को न्यौता दिया है। उनके स्वागत में बुलेट प्रूफ मंच बनवाया गया है। देश-विदेश से ख़ासतौर से हॉलैंड से मंगवाए गए मंहगे फूलों की सजावट के चर्चे हैं। 

रोटी के टुकड़े को मोहताज अपने गण से इस फ़िज़ूलखर्ची की आज्ञा लेना प्रधान सेवक ज़रूरी नहीं समझते। आख़िर तो ये सब वो जन-गण की भलाई के लिए ही कर रहे हैं। 

देश की तरक़्क़ी की ख़ातिर देश-दुनिया का चक्कर लगाने वाले प्रधानमंत्री मोदी को अपनी कुर्सी के नीचे दबी-बसी दिल्ली घूमने की फुरसत ही नहीं मिल पाती। अगर मिलती तो वो ज़रूर देख लेते कि अभी हाल ही में दो-चार रोज़ पहले बवाना में बंधुआ मज़दूर की तरह काम करने वाले औरतें-बच्चे-पुरुष मज़दूर, पटाखे की एक बंद कालकोठरी नुमा फैक्ट्री में जलकर भस्म हो गए हैं। इनमें से कई अपने घरों के अकेले कमाने वाले थे।

अपनी नाक के नीचे संविधान के श्रम मज़दूर क़ायदे-कानूनों के पन्नों को नोचकर फाड़ फेंकने वाले गुनाहगारों का साहब को पता ही नही चलता।

अगर पता चलता तो जिस संविधान के लागू होने की ख़ुशी में वो गणतंत्र दिवस में दूसरे मुल्क़ों के प्रधानों को भी घसीट लाए। उसी घायल संविधान के ख़ून की बूंदे विजय पथ पर उन्हें ज़रूर दिखाई देतीं। और वो गणतंत्र दिवस पर विदेशी मेहमानों की भी परवाह न कर अपनी पगड़ी-चश्मा उतार कर खूब रोते। 

बार-बार देश से हाथ जोड़कर माफी मांगते कि जिस संविधान का पालन करने-करवाने की उन्होंने क़समें खाईं थी वो उसमें नाक़ाम रहे। 

समारोह छोड़ देश से कहते - ‘‘चलों हम सब मिलकर बवाना चलें। मारे गए उन मज़लूम मज़दूरों के परिवारों के साथ शोक़ मनाएं। जो मेरी लापरवाही की वजह से इस गणतंत्र दिवस का सूरज देखने से महरूम रह गए।। मैं इस गणतंत्र दिवस पर क़सम खाता हूं कि फिर किसी मज़दूर की ऐसी मौत नहीं होगी। किसी को अब ऐसे नरक से बदतर हालात में काम नहीं करना पड़ेगा। आज से सभी मज़दूरों को संविधान के मुताबिक वेतन, सुविधाएं दी जाएंगी।’’

राष्ट्रपति जो अपने महल की ऊंची-ऊंची दीवारों से कुछ भी देख पाने में असमर्थ हैं। वो बवाना कांड कैसे देखते? पर प्रधानमंत्री के इस विलाप से दुर्घटना का पता चलते ही महामहिम उन्हें दी जाने वाली तोपों की सलामी को रोककर कहते - ‘‘ये तोपों की सलामी बवाना मज़दूरों के नाम। देश का मुखिया होने के नाते मैं हर घर का बुर्जुग हूं। मैं अपने मज़दूर बच्चों की शहादत को सैल्यूट करता हूं। हमारा अपना गणतंत्र, अपना संविधान होने के बावजूद उन्हें इस तरह अपनी जान गंवानी पड़ी इसके लिए हम सब शर्मिंदा हैं। देश का ध्वज झुका दिया जाए।’’ 

अगर ऐसा होता तो ये 26 जनवरी 2018 इतिहास में अमर हो जाती। पर अफसोस! ऐसा कुछ न हुआ। हां इसके उलट हुआ जो हमेशा होता है। और जो हमेशा होता है वो मन में भय बैठाता है। 

जब अमर जवान ज्योति की ओर क़दम ताल मिलाते फ़ौजी प्रधानमंत्री के साथ बढ़ते हैं। तो दिल पर एक धमकी की धमक महसूस होती है। हर क़दम में जैसे संविधान की आत्मा कुछ और...कुछ और...ज़मीदोज़ होती जाती है। और पल-पल होने वाली नाइंसाफी के खि़लाफ़ आवाज़ उठाने की सोचने वाले आम आदमी का कलेजा बैठता जाता है। वो दो मिनट का मौन धमकाता मालूम होता है। जैसे कहा जा रहा है - ‘‘खामोश’’ अगर अपनी बेबसी की चीख़ों को बाहर आने दिया तो देखते हो हमारी ताकत! 

ये तुम्हारी सुरक्षा के लिए नहीं हमारे इशारों पर तुम्हें कुचलने के लिए है। असम, छत्तीसगढ़, झारखंड, कश्मीर का हाल जानते हो न! ख़बरदाऱ़! अगर बवाना में जलने वाले मज़दूरों की मूर्खता पर आंसू बहाकर हम पर उंगली उठाने की कोशिश की तो। 

किसने कहा था उन्हें फैक्टरी में मज़दूरी करने को? अपना रोज़गार करते। ज़ी न्यूज़, इंडिया टीवी सरीखे चैनलों के बाहर पकौड़े के ठेले लगाते। 100 प्रतिशत सुरक्षा के घेरे में रहते। हमारे खि़लाफ फैक्टरी के बाहर हो या भीतर अपनी सुरक्षा आप करें।

मैं सोच रही हूं क्या बवाना में मरने वाले मज़दूरों के घरवालों ने भी ये गणतंत्र परेड देखी होगी? क्या वो पढ़ना-लिखना जानते हैं? क्या उन्होंने पढ़ा होगा कि समारोह का मंच सजाने के लिए लाखों का खर्चा कर हॉलैंड से हवाई-जहाज में बैठकर ख़ास फूल आएं हैं। जो हफ़्ते भर नहीं मुरझाते।

उन फूलों को देखकर वो क्या सोच रहे होंगे? सोच रहे होंगे कि हम कितने भाग्यशाली हैं कि हमारे साहब ने इतने क़ीमती फूलों के दर्शन हमें करवाए। भले ही टीवी में ही देखे पर देखे हमने! 

हमारी तो इस जनम में औक़ात नहीं हवाई जहाज़ में बैठने की। उस मुल्क़ जाने की जहां ऐसे खू़बसूरत फूल रहते हैं। काश! हम ये फूल ही होते। भले ही 7 दिन का जीवन होता। ख़ैर! अब आराम से मर सकेंगे। क्या कुछ ऐसा सोचते होंगे? 

या ये हिसाब लगा रहे होंगे कि जितना ख़र्चा इन फूलों को मंगवाने में किया गया है उतने या उससे कुछ कम हमें बतौर मुआवज़े मिल जाते तो भरे पेट उम्र गुज़र जाती। कमाने वाला तो पटाखे की भट्टी में भुन गया। कम से कम हम गिद्धों का सामान बनने से तो बच जाते...  

(वीना पेशे से पत्रकार और फिल्मकार हैं।)










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Harinder :: - 01-27-2018
Madam All evidence point to fact that india is being ruled as it was in moghul or english colonial rule. As a military camp Acamp of occupation army that needs to dazzle the occupied population.

Harinder :: - 01-27-2018
Madam All evidence point to fact that india is being ruled as it was in moghul or english colonial rule. As a military camp Acamp of occupation army that needs to dazzle the occupied population.