संवाद का गिरता स्तर और मुद्दाविहीन होती राजनीति

मत-मतांतर , , बृहस्पतिवार , 07-03-2019


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विशद कुमार

सफलता के बाद उत्साह एक स्वाभाविक क्रिया है, जो प्रकृति प्रदत्त है। मगर सफलता के बाद उसका संरक्षण एक वैज्ञानिक क्रिया है, जो मनुष्य प्रदत्त है। यह केवल वैयक्तिक संदर्भ का बोध नहीं है बल्कि सामाजिक राजनीतिक स्तर पर लागू होता है। जो इन क्रियाओं के आंतरिक सत्य को समझ नहीं पाते हैं वे सफलता में मदांध होकर खुद का ही नुकसान करते हैं। जो एक सामूहिक प्रतिक्रिया का परिणाम कहलाता है।

पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी के नाम पर भाजपा को जो चमत्कारिक सफलता मिली, उससे मोदी व उनके समर्थकों में उत्साह का होना एक स्वाभाविक क्रिया थी, मगर इस उत्साह में उनके समर्थकों में जो उद्दंडता देखने को मिली, उसमें अब मोदी भी शामिल हो गए। भूल गए कि वह पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं न कि एक समूह में शामिल अपने कुछ समर्थकों के। उनकी यह भूल लोकतांत्रिक मर्यादा की संघीय ढांचा पर कई सवाल खड़े करने लग गई, जो आज भी वहीं खड़ी है। 

इस उत्साह में जहां मोदी जी भाषाई दरिद्रता के शिकार होने लगे वहीं उनके समर्थक उद्दंडता के शिकार होकर देश को जहरीला बनाने में लग गए। जो आज तक जारी है। नतीजा यह हुआ कि मोदी ने जिसे 'पप्पू' की उपाधि दी वह भी उसी बीमारी के शिकार हो गए और उन्होंने 'चौकीदार ही चोर है' का शोर मचाना शुरू कर दिया है। इसका पड़ाव कहां है? यह तो भविष्य तय करेगा, मगर इन सब कमियों और खामियों के बीच आज की संस्कारहीन राजनीति ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्तरहीन संवाद बचपन की यादें ताजा कर दे रहे हैं, जब हम बच्चे खेल के दरम्यान एक—दूसरे को न जाने क्या—क्या बोल जाते थे। बोले जाने वाले शब्दों का शायद हम उस समय अर्थ भी नहीं जानते थे। लिहाजा सबसे बड़ा सवाल तो यही है आखिर बच्चों में वे शब्द आते कहां थे। इसका स्रोत कुछ और नहीं बल्कि समाज में रंजिशों से उत्पन्न बोल हुआ करते थे। समाज का हिस्सा बनते हुए हमारे कानों तक पहुंचते थे और बाद में हम उसी को दोहराते थे। पिछले पांच सालों की हमारी राजनीति ऐसे ही 'बचपन' के दौर से गुजर रही है। फर्क बस इतना है कि 'बचपन' समाज के गढ़े हुए शब्दों को दुहराता है और हमारी राजनीति इन शब्दों को खुद गढ़ रही है।

भाषा के स्तर पर यह ओछापन हमारी राजनीति की लोकतांत्रिक मर्यादा को ही नहीं चोट पहुंचा रही है। बल्कि पद की गरिमा को भी तार—तार कर दे रही है। जब हमारे देश के प्रधानमंत्री पाकिस्तान को ललकारते हुए कहते हैं कि 'घर में घुस कर मारेंगे' तो लगता कि गली का कोई सड़क छाप गुंडा मुहल्ले वालों को चेतावनी दे रहा है। मोदी का यह “शौर्य” भले ही उनकी जमात और आम समझ वालों को ताली बजाने पर बाध्य करता हो मगर उनका यह “शौर्य” हमें माथा पीटने पर मजबूर कर देता है।  

विपक्ष का भी वही हाल है। पूरा विपक्ष राम मंदिर, कश्मीर, पाकिस्तान में उलझा है, गोया देश बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बीमारी, प्रदूषण से पूरी तरह मुक्त हो चुका है, देश में इस तरह की कोई समस्या नहीं है।

यह सच है कि पूंजीवादी सत्ता जनता को जनमुद्दों से भटकाकर अपने हित साधने की कोशिश में रहती है। पिछली सभी सरकारों ने ऐसा किया है, बावजूद इसके उनमें लोकतांत्रिक मूल्यों की कुछ सीमाएं रही हैं। मगर पिछले पांच सालों में यह मूल्य इस तरह से तार—तार हुआ है, जिससे देश में पूरे लोकतंत्र के वजूद पर ही सवाल खड़ा होने लगा है। 

आज देश की राजनीति कई अप्रासंगिक मुद्दों में उलझी हुई है। जो एक तरफ आम लोगों को बौद्धिक तौर पर दरिद्र बना रही है वहीं सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद का गिरता स्तर देश के संकट को एक दूसरे स्तर पर ही खड़ा कर दिया है। 

(विशद कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल बोकारो में रहते हैं।)

 








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