“मैं चक्करवर्ती सम्राट एक्सीडेंटल हूं या मेंटल ?”

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 29-12-2018


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भूपेश पंत

चक्करवर्ती सम्राट आज आत्मचिंतन की मुद्रा में हैं। अपने विशेष सलाहकार विदूषकजी को उन्होंने महल में ही बुला लिया है। सम्राट कक्ष में टहलते हुए सोच रहे हैं कि कहीं उनका राजकाज छिनने का वक्त तो नहीं आ रहा है। कहीं लोग उनकी नीयत पर शक तो नहीं करने लगे हैं। कहीं उन्हें बदनाम करने की विपक्ष की चाल कामयाब तो नहीं हो रही है। दुनिया के प्राचीनतम लोकतांत्रिक साम्राज्य के फकीर सम्राट के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी होती जा रही हैं।

विदूषक (कक्ष में प्रवेश करते हुए)- 'वाह सम्राट वाह। आज आप कुछ चिंतित लग रहे हैं।'

सम्राट (विदूषक पर निगाह डालकर खुद को सामान्य जताते हुए) - 'मैं ठीक हूं... तुम बताओ देश के हर कोने में मेरी जै जैकार हो रही है या नहीं।'

विदूषक (चापलूसी के अंदाज़ में) - 'सम्राट आप चिंतित न हों। विरोधी भले ही आपको चोर घोषित कर रहे हों लेकिन हमारी सेना युद्ध के उद्घोष से उसे दबाने में जुटी है। मैंने स्वयं भी सेवकों से आने वाले चुनाव संग्राम को पानीपत के युद्ध की तरह लड़ने की अनुमति दे दी है।'

सम्राट - 'लेकिन पानीपत ही क्यों?'

विदूषक - 'क्योंकि हमारे सेवक आज़ादी की लड़ाई के बारे में ज़्यादा नहीं जानते। इस मामले में वैसे भी विरोधियों का पलड़ा भारी है और मुझे डर है कि कहीं हमारे लोग गलती से उनके पदचिह्नों पर चलते हुए हमारे ही मुखबिर न बन जाएं।'

सम्राट - 'खैर वो तो पानीपत के बारे में भी नहीं जानते होंगे। खैर चलो वो हमारे हरियाणा में है उनके लिये इतना जानना काफी है। खैर को छोड़ो...' (टाइपिंग मिस्टेक)

(सम्राट अचानक विदूषक के करीब जाकर उसकी पीठ पर हाथ रखते हैं)

'विदूषक... तुम मेरे लिए कृष्णदेव राय के तेनाली राम और उस आक्रमणकारी अकबर के नवरत्न बीरबल से कम नहीं हो। अच्छा हुआ ये दोनों हिंदू थे वरना मेरे पास चाणक्य जैसे विद्वान से तुम्हारी तुलना करने के अलावा कोई चारा नहीं रहता।'

विदूषक (भावुक होते हुए) - 'सम्राट मैंने भी हमेशा अपनी चतुर खोपड़ी का इस्तेमाल कर आपकी उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश की है।'

सम्राट - 'मैं जानता हूं इसीलिए तो कुछ सवालों के उत्तर तलाशने के लिये तुम्हें यहां बुलाया है। मैं युद्ध की रणनीति बनाने से पहले ये चिंतन करना चाहता हूं कि जो कुछ हमने किया वो हमारे लिये कितना सही रहा और क्या हम जन्ता को समझा पाये कि ये सब हमने उसके लिये ही किया है।'

विदूषक (खींसे निपोरते हुए)- 'सम्राट आप मुझे एक मौका तो दीजिये अपनी चिंताओं को दूर करने का।'

सम्राट - 'सबसे पहले ये बताओ कि विकास की हमारी अवधारणा डार्विन के सिद्धांत पर भारी पड़ी या नहीं।'

विदूषक (गंभीर होते हुए) - 'सम्राट, उनके और हमारे विकास में मूलभूत अंतर है। वो प्रकृति में क्रमिक परिवर्तन से मनुष्यता के विकास की बात करते हैं और हम बिना सत्ता परिवर्तन के अपने.. मेरा मतलब है सबके विकास की। यही वजह है कि एक ओर तो हमारे सिपहसालारों ने डार्विन नामक इस शख्स को विकास विरोधी करार दिया और दूसरी ओर हमने जन्ता को विकास का अहसास कराया।'

सम्राट - 'वो कैसे?'

विदूषक - 'जी... जब जन्ता हमारे पास लुटी पिटी ठिठुरती हुई पहुँची और विकास को देखने की मांग करने लगी तो हमने उसे सेठ निंदानी के महल के सामने वाले जलाशय के पानी में कमर तक रात भर खड़े रहने का अनुरोध किया।'

सम्राट - 'फिर?'

विदूषक - 'अगले दिन हमने जन्ता से उसका रात का अनुभव पूछा तो उसने बताया कि जलाशय का पानी तो बहुत ठंडा था लेकिन कड़ाके की सर्दी में भी आलीशान महल की जगमगाहट और रात भर जलते दीयों की रोशनी ने उसे ठंड का अहसास ही नहीं होने दिया।'

सम्राट - 'अच्छा?'

विदूषक - 'जी सम्राट, तब हमने जन्ता को समझाया कि सबका विकास इन जैसे महलों की जगमगाती रोशनियों और जलते दीयों का ही दूसरा नाम है। विकास के ये दीये भले ही कहीं भी जल रहे हों लेकिन उन्हें देख-देख कर जन्ता तक उसकी गरमाहट पहुंच ही जाती है। हमने ये भी बताया कि इन दीयों का तेल जन्ता से मिला टैक्स का पैसा है जो जलकर सबके विकास में अभूतपूर्व योगदान दे रहा है। तभी से जन्ता सबके विकास का अहसास करके अभी तक अभिभूत है।'

सम्राट - 'वाह विदूषक, इस जन्ता को मेरे मन की बात तुम ही अच्छे से समझा सकते हो।'

विदूषक - 'सम्राट उसके बाद जन्ता ने अच्छे दिन अभी तक न आने की बात कही..'

सम्राट - 'तो तुमने क्या कहा?'

विदूषक - 'आपकी अनुमति खुद ही लेकर मैं जन्ता को उस स्थान पर ले गया जहां बड़े से बर्तन में अच्छे दिनों की खिचड़ी पक रही है। जन्ता ने मुझसे पूछा कि बर्तन को विकास कार्यों की धीमी सुलगती आंच से इतना ऊपर क्यों लटकाया है तो मैंने उसे समझा दिया सम्राट।'

सम्राट - 'क्या?...'

विदूषक - 'यही कि जिस तरह विकास की आंच जलते दीयों से निकल कर रात भर दूर से भी उसे गरमाहट देती रही उसी तरह एक दिन अच्छे दिनों की खिचड़ी भी पक ही जाएगी।'

सम्राट - 'वाह, और जन्ता मान गयी?'

विदूषक - 'सम्राट, आप तो जानते हैं कि साम-दाम-दंड-भेद की नीति से बड़े बड़े दिग्गज विरोधी भी सध जाते हैं और ये तो बिचारी जन्ता पहले से ही भ्रमित है। वो तो अपनी ही बात से फंस गयी। वैसे भी उसकी नाक तो खिचड़ी की गंध सूंघने को बेताब है चाहे जितना वक्त लगे।'

सम्राट - '...और मोहरबंदी पर जन्ता ज़्यादा नाराज़ तो नहीं?'

विदूषक - 'देखिये सम्राट, हमने पहले ही जन्ता को बता दिया था कि हमने राष्ट्रहित का बीड़ा उठा रखा है। जिस तरह हमारे सैनिक सीमा पर देश की रक्षा के लिये अपने प्राण न्यौछावर करते हैं वैसे ही लोगों को एटीएम की लाइनों में लग कर हमारे चक्करवर्ती सम्राट की रक्षा के लिये आहुति देनी होगी।'

सम्राट - 'लेकिन हमारे इस ब्रह्मास्त्र का उद्देश्य तो पार्टी के लिये नये नोट जमा करना और अपने राजनीतिक विरोधियों को मोहरविहीन कर उन्हें चुनाव संग्राम में निःशस्त्र करना था ना।'

विदूषक - 'लेकिन ये सच जन्ता थोड़ी जानती है। उसने तो इस दौरान हुए अपने कष्ट को छाती पर तमगे की तरह सजा लिया है। बाकी पुरानी मोहरों को नयी मोहरों से बदलने की बहती गंगा में जिन्ने भी हाथ धो लिये वो सब आपके मुरीद हैं और अगले मौके का इंतज़ार कर रहे हैं।'

सम्राट - 'लेकिन इस बार अपनी जीत तो पक्की है ना।'

विदूषक - 'देश की सीमा के बाहर और भीतर का तनाव युद्ध और गृहयुद्ध का माहौल बना सकता है। ऐसे में आपका छप्पन इंची दांव विरोधियों को चारों खाने चित्त कर देगा। युद्ध की उद्घोषणा का असली सच यही है सम्राट।'

सम्राट - 'ये तो कमाल हो गया... मैं तो समझ रहा था कि इस बार चुनाव की पहेली कहीं तुम्हें लाजवाब न कर दे लेकिन तुम तो सब कुछ पहले ही हल कर चुके हो। अच्छा खैर... एक सवाल का जवाब दो विदूषक... मैं चक्करवर्ती सम्राट एक्सीडेंटल हूं या मेंटल।'

विदूषक - सम्राट, आप इन दोनों में से कोई भी नहीं। आप तो सेंटीमेंटल हो। जब जब आप सेंटी होते हो आपके चाहने वाले मेंटल हो जाते हैं। अब खैर की मनमोहनी अदा को छोड़िये और युद्ध के नगाड़ों का लुत्फ लीजिये।

विदूषक के कंधे पर हाथ रख कर चक्करवर्ती सम्राट खुशी-खुशी कक्ष से प्रस्थान करते हैं। उनके ठहाकों के साथ ही नेपथ्य में एक गीत गूंज रहा है.... जीत जाएंगे हम, तू अगर संग है... जिंदगी हर कदम...

(भूपेश पंत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

 








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