मोदी जी! निर्जीव मूर्तियों से भी इतना डर?

आड़ा-तिरछा , , शुक्रवार , 09-03-2018


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अंशुल कृष्णा

आज के दौर का इतिहास जब भी लिखा जायेगा तो उसमें डर से कांपते हुए अश्वमेध के घोड़े पर सवार उस आदमी का जिक्र जरूर होगा जो चुनाव में तो जीतता रहा लेकिन इतनी हिम्मत न जुटा पाया कि महापुरुषों की मूर्ति के सामने खड़ा हो सके। मूर्तियों को तोड़ने की खबरें आना बंद नहीं हुई हैं। लेनिन, पेरियार, मुखर्जी, अम्बेडकर के बाद केरल में गांधी की मूर्ति के साथ भी यही हुआ। इन मूर्तियों को तोड़ने में दूसरे लोग भी शामिल हैं लेकिन आप सबसे ज्यादा शामिल हैं। शुरुआत आपने की है, जिम्मेदार भी आप ही होंगे,

नहीं मालूम आपको इन मूर्तियों से इतना डर क्यों लगता है, नहीं मालूम आप अक्ल /तर्क में इतने कच्चे क्यों हैं कि वैचारिक असहमति होने पर आप निर्जीव मूर्तियों से बदला लेते हैं, तो फिर आप ट्वीट की ये नौटंकी क्यों करते हैं, खुलकर विरोध क्यों नहीं करते, अपने आकाओं का खुलकर प्रचार क्यों नहीं करते, जिनकी मूर्तियों पर हमले कर रहे हैं उनका सार्वजनिक रूप से विरोध क्योँ नहीं करते, आप कहते हैं वे लोग मूर्ति का समर्थन नहीं करते और मूर्ति तोड़ने पर इतना विरोध करते हैं तो क्या आप अपने ही तर्क से अपने ही हाथ को उखाड़ के फेंक देंगे। क्योंकि कांग्रेस के हाथ के पंजे का समर्थन तो आप भी नहीं करते, जानता हूं ये कुतर्क है लेकिन जो आप दे रहे हैं वो क्या है ?

इतना डर क्यों लगता है आपको, उन लोगों से जिनको इस दुनिया में गए हुए वर्षों बीत गए, क्या इतनी सारी जीतों के बावजूद खुद को आईने में देखने की ताकत अब तक हासिल नहीं कर पाए हैं आप ?क्या वाकई मजबूत बहुमत की ढाल लिए भीतर से बेहद कमजोर और सहमे हुए हैं आप ?

यकीनन आप ऐसे ही हैं तभी तो खुद को असली हिन्दू साबित करने के लिए आपको ईद का सहारा लेना पड़ता है। हमको तरस आता है आप पर, आपको तिलक और टोपी के एक साथ होने से सबसे ज्यादा परेशानी है, हरे और केसरिया के एक होने से आपको डर इसलिए लगता है क्योंकि तब तिरंगा बन जाता है और आपका भगवा खत्म हो जाता है, और फिर जब अपनी ही देश भक्ति साबित करने के लिए आप तिरंगे का सहारा लेते हैं तो हँसी आती है आप पर, वंदेमातरम के नाम पर देशद्रोही बनाने पर आमादा आप वंदेमातरम ही याद नहीं रख पाने पर खुद नंगे हो जाते हैं,

महिला दिवस की बधाई देने वाले आप जब जय सिया राम को जय श्री राम कहते हैं तो आपकी पितृसत्तात्मक सोच के पाजामे का नाड़ा साफ दिख जाता है, आपके अध्यक्षों और सरसंघचालकों की सूची देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती, जानता हूं कि आपको डर है कि कहीं देश का बहुसंख्यक तबका, जिसकी राजनीति करके आप उसे मूर्ख बना रहे हैं, वो आपका सच न जान जाए, आप बेरोजगार लोगों के आक्रोश से इतना डरे हुए हैं कि रोजगार के आंकड़े तक जारी करना बंद करने जा रहे हैं, संसद की सबसे ज्यादा कुर्सियों पर जमे हुए आप सड़क के छुटपुट विरोध से घबरा जाते हैं ,कलम से निकले शब्दों से आपके चेहरे पसीने से छप हो जाते हैं आप जीत के बावजूद भी इतना बौखलाए हुए हैं कि आपको सड़क की आवाज को डाइवर्ट करने के लिए सड़कछाप चीजों का सहारा लेना पड़ रहा है मैं आपसे कहना चाहता हूँ कृपया तोड़िये मूर्तियाँ और तोड़ते रहिये इनको, क्योंकि जब मूर्ति टूटकर गिरती है तो हमको आप और ज्यादा गिरे हुए नजर आते हैं।

(अंशुल कृष्णा सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। ये लेख उनके फेसबुक टाइमलाइन से साभार लिया गया है।)

 






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