मृणाल सेन के जाने के साथ समाप्त हो गया सिनेमा का एक युग

सिनेमा , , सोमवार , 31-12-2018


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संजय जोशी

(बांग्ला फिल्मों के प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक मृणाल सेन का रविवार को कोलकाता स्थित उनके आवास पर 95 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया । मृणाल सेन को सिनेमा जगत में उनके अन्यतम योगदान के लिए पद्मभूषण और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था । यहां प्रस्तुत है उनकी फिल्म भुवन शोम पर ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी की यह टिप्पणी:संपादक)

सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में अपने संवादों के लिए, कुछ अदाकारी तो कुछ अपनी भव्यता के लिए अमर हो जाती हैं। कुछ ऐसी भी फिल्में हैं जो शुद्ध रूप से अपनी सिनेमाई भाषा के कौशल के कारण दर्शकों पर अमिट प्रभाव छोड़ती हैं। ऐसी ही एक फिल्म है 1969 में निर्मित मृणाल सेन निर्देशित ‘भुवन शोम’।

मृणाल सेन की पहली हिंदी फ़िल्म थी। हालांकि इससे पहले वे बांग्ला भाषा में कई महतवपूर्ण फिल्में बनाकर प्रतिष्ठित हो चुके थे। उत्पल दत्त, साधू मेहर, सुहासिनी मुले जैसे कुशल कलाकारों, विजय राघव के संगीत, सौराष्ट्र के खास लोकल के साथ–साथ जिस चीज ने मृणाल सेन की फ़िल्म को महत्वपूर्ण बनाने में निर्णायक भूमिका अदा की वह थी केके महाजन की श्वेत और श्याम फ़ोटोग्राफ़ी।

हिन्दुस्तानी नई लहर की इस फ़िल्म की कहानी बहुत पेंचदार नहीं है। एक हैं रेलवे के ईमानदार और खडूस शोम साहब (उत्पल दत्त) जो अपनी ईमानदारी के कारण नितांत अकेले भी हो गए हैं। दरअसल फ़िल्म की कहानी भी उनके दौरे से शुरू होती है। वे अपने महकमे के एक छोटे कर्मचारी जाधव पटेल (साधू मेहर) की जांच के लिए सौराष्ट्र आते हैं। वैसे जांच के अलावा रेगिस्तान के विशाल मैदान में पंछी का शिकार खेलना भी उनकी इस यात्रा का एक मकसद है, बल्कि यही फ़िल्म की मुख्य कहानी बन जाती है। फ़िल्म में बहुत जल्दी शिकार कथा शुरू हो जाती है। शोम साहब गावं की एक अल्हड़ किशोरी गौरी (सुहासिनी मुले) के साथ पंछी के शिकार पर निकल जाते हैं।

पंछी के शिकार की कथा फ़िल्म की पूरी कथा में आनुपातिक रूप से भी थोड़ी ज्यादा पड़ती हुई भी दिखाई देती है लेकिन पूरी फिल्म देखने के बाद समझ में आता है कि असल में इस कथा को ही मृणाल सेन कहना चाहते थे बाकी तो सब इसकी भूमिका थी। शिकार का यह सीक्वेंस केके महाजन के कुशल कैमरे की वजह से पंछी के शिकार की बजाय पंछी के प्रति नायक –नायिका के प्रेम जैसा दिखता है याकि नायक–नायिका में खुद बनते हुए प्रेम को लक्षित करता है।

श्वेत श्याम छायांकन में रेत के ढूहों में सुन्दर फ्रेम बना लेना कोई मजाक का काम नहीं। के के महाजन सुहासिनी मुले और उत्पल दत्त के क्लोज़ अप, मिड शॉट और रेगिस्तान के लॉन्ग शॉट के जरिये एक ऐसा शिकार दृश्य निर्मित करते हैं जिसमें कोई शिकार ही नहीं होता बल्कि एक उन्मुक्त लोकेशन में होने के रोमांच की वजह से उम्र का अंतर बहुत अधिक होने के बावजूद प्रेम जैसा कुछ घटता हुआ दिखता है। लॉन्ग शॉट का वह दृश्य जब पंछियों का एक विशाल समूह आकाश में दिखाई देता है तब केके महाजन के सब कुछ को समेट लेने वाले बेहतरीन लॉन्ग शॉट के कलात्मक पैन के साथ विजय राघव का मधुर संगीत शिकार के आयोजन में प्रेम के बीज बो देता है।

मृणाल बाबू भी शायद यही हासिल करना चाहते थे कि प्रेम जैसा कोमल तत्व भी कितना जरुरी है हमारे जीवन में यह स्थापित हो जाय। इसी कारण फ़िल्म ख़त्म होते–होते हम तथाकथित शिकारियों को घायल पक्षी को अपने साथ वापस लाता देख पाते हैं और वह उनकी गोली से नहीं बल्कि गलत निशाने पर चली गोली के धमाके से घायल हुआ है।

(समकालीन जनमत से साभार)


 








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