मुस्लिम समाज को समझने के लिए बेहद उम्दा स्रोत साबित होगी “मुस्लिम समाजः इतिहास और वर्तमान का अध्ययन” किताब

धर्म-समाज , , बुधवार , 12-12-2018


mulsim-society-religion-communalism-history-book

उर्मिलेश

“देश और मुसलमानः मिथक इतिहास और यथार्थ” शीर्षक से छपी यह किताब दो कारणों से महत्वपूर्ण है। पहला ये कि इस विषय पर हिन्दी में बहुत कम काम हुआ है। इस वक्त देश में भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय में जिस तरह के असुरक्षा और अलगाव के बोध की जमीन तैयार की जा रही है, उसे देखते हुए सन 2018 में छपी यह किताब (लेखकः सुनील यादव, प्रकाशक-ज्ञानसम्पदा, दिल्ली, वर्ष, 2018) एक बहुत जरूरी वैचारिक हस्तक्षेप है।

दूसरा कारण कि मुस्लिम समुदाय और उसके सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ को यह किताब एक समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के साथ मूल हिन्दी में लिखे कुछ उल्लेखनीय उपन्यासों की कथावस्तु की रोशनी में भी देखने-परखने की कोशिश करती है। लेखक ने पुस्तक को दो खंडों में बांटा है। पहले खंड में इस्लाम और भारत का मुस्लिम समाज, मुस्लिम सामाजिक संरचना, भारत में सांप्रदायिकता का उदय, सांप्रदायिक राजनीति का आख्यान और भारत विभाजन जैसे कुल पांच अध्याय हैं। दूसरे खंड में लेखक ने हिन्दी के दो प्रमुख उपन्यासों ‘आधा गांव’(राही मासूम रजा), ‘काला जल’(शानी) और हिन्दी फिल्म ‘जख्म’ (महेश भट्ट) संदर्भ में भारतीय मुस्लिम समाज, खासकर हिन्दी पट्टी के मुस्लिम परिदृश्य, आम मुसलमान की हालत, उसकी जद्दोजहद और विडम्बना को समझने की कोशिश की है।

सुनील ने भारत में सांप्रदायिकता को मध्यकाल और मुस्लिम शासकों की नीतियों से जोड़ने के तथ्यहीन प्रलाप का ठोस तथ्यों और तर्कों के साथ खंडन किया है। देश के कई ख्यातिलब्ध इतिहासकारों की तरह वह भी मानते हैं कि भारत में एक ‘विचारधारा’ के तौर पर सांप्रदायिकता की शुरुआत अंग्रेजी राज के दौरान हुई। इसके पीछे ठोस राजनीतिक कारण थे। फिर आर्थिक पहलू भी जुड़ते गये। ब्रिटिश हुकूमत के नक्शेकदम पर कई अंग्रेज लेखकों-इतिहासकारों ने योजना के तहत हिन्दू-मुस्लिम विभेद और विभाजन को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। जेम्स मिल ने भारत के मध्यकालीन इतिहास का ‘मुस्लिम काल’ जैसा नामकरण किया। धर्म और सांप्रदायिकता पर सुनील की समझ बिल्कुल साफ है। पुस्तक की भूमिका में ही वह साफ कर देते हैं कि सांप्रदायिकता का धर्म से गहरा ताल्लुक जरूर है पर धर्म उसकी उत्पत्ति का कारण नहीं हो सकता।

इस्लाम धर्म और भारतीय मुस्लिम समाज पर अंग्रेजी में बहुत सारी किताबें उपलब्ध हैं। पर मूल हिन्दी में इतनी कम किताबें हैं कि बहुत संक्षिप्त होने के बावजूद सुनील की यह किताब हिन्दी के विशाल पाठक वर्ग की क बड़ी जरुरत पूरा करती है। इस्लाम और भारतीय मुसलमान के बारे में पाठकों को वह कुछ बहुत बुनियादी जानकारी देने के साथ जटिल सवालों की संजीदा व्याख्या भी पेश करती है। पुस्तक का पहला अध्याय इस्लाम धर्म और भारतीय मुसलमान की स्थिति पर रोशनी डालता है। इस अध्याय में लेखक ने इस्लाम और भारत के ऱिश्तों से जुड़ी कई भ्रांतियों के निराकरण की कोशिश की है। उदाहरण के लिए एक बहुप्रचारित भ्रांति तो यह भी है कि भारत में इस्लाम धर्म तलवारों के जोर पर आया और दरबारों के दबाव में प्रचारित-प्रसारित हुआ।

अनेक विख्यात इतिहासकारों के शोधों की रोशनी में लेखक ने इस भ्रांति का तथ्यपूर्ण ढंग से खंडन किया है। किताब के दूसरे अध्याय में ‘मुस्लिम सामाजिक संरचना’ के बारे में प्रामाणिक जानकारी दी गई है। तीसरे अध्याय ‘देश और मुसलमान’ में  भारतीय जनगणना के अधिकृत आंकड़ों, अलग-अलग विषयों पर हुए कई प्रामाणिक सर्वेक्षणों, विभिन्न आयोगों के दस्तावेज और फिर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की रोशनी में भारतीय मुस्लिम समाज की मौजूदा स्थिति पर प्रकाश डाला गया है। ‘सांप्रदायिक राजनीति का आख्यान और भारत-विभाजन’ शीर्षक अध्याय में ब्रिटिश हुकूमत के दौर में भारत की स्थिति, आजादी की लड़ाई और उसकी अलग-अलग राजनीतिक धाराएं, कांग्रेस और उसकी विचारधारा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ‘सांस्कृतिक राजनीति’ की असलियत सहित अनेक मुद्दों और पहलुओं की बहुत तथ्यपूर्ण व्याख्या की गई है।

पुस्तक के दूसरे खंड के पहले ही अध्याय में सुनील ने एक बड़ा सवाल उठाया है, आखिर आजादी से पहले या उसके बाद के लंबे दौर के हिन्दी साहित्य लेखन में मुस्लिम पात्र या मुस्लिम कथानक इतना कम क्यों है! मुस्लिम समाज लगभग अनुपस्थित है! बाद के दिनों में वह कुछ तरक्कीपसंद लेखकों, नाटककारों, फिल्मकारों या फिर मुस्लिम समुदाय से आने वाले कुछ प्रतिभाशाली लेखकों की रचनाओं में उभरता है। राही मासूम रजा की महान  औपन्यासिक रचना ‘आधा गांव’ और शानी के ‘काला जल’ के माध्यम से लेखक ने बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में मुस्लिम समुदाय की जटिल तस्वीर को सामने लाने की कोशिश की है।

विभाजन के समय भारत के मुसलमानों के पास विकल्प था कि वे भारत में रहें या पाकिस्तान चले जायं!  भारत के किसी अन्य समुदाय के पास अपना फिर से नया देश चुनने का विकल्प नहीं था। मुस्लिम समुदाय का जो बड़ा हिस्सा भारत में ही रहा, पाकिस्तान जाने से इंकार किया, उसके ही वंशजों को अगर  किसी कथित ‘हिन्दुत्व-मंडली’ का कोई सिरफिरा कहे कि ‘अब तुम इस देश में नहीं रह सकते’ तो सोचिए इतिहास, मनुष्यता और इंसानी ईमान के साथ यह कितना बड़ा दुराचार है!

सुनील यादव की किताब इस सच को शिद्दत के साथ रेखांकित करती है कि सदियों से भारतीय समाज में विचार, उत्पादन या संस्कृति के क्षेत्र में जितना भी विकास हुआ है, उसमें अन्य समुदायों के साथ मुस्लिम समाज का बड़ा योगदान है। इसलिए मुस्लिम समाज या किसी आम मुसलमान को भारत या भारत की संस्कृति से अलग करके नहीं देखा जा सकता! किताब का यह संदेश आज के भारत के लिए बहुत प्रासंगिक और जरुरी है।

(लेखक उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं और इस दौर में देश में चल रहे बौद्धिक विमर्श के बुनियादी चेहरों में शुमार किए जाते हैं। कश्मीर और बिहार समेत कई विषयों पर लिखी गयी आपकी कई किताबें बेहद चर्चित रही हैं।)










Leave your comment











Md. Arif Ansari :: - 12-12-2018
How can I have this book

Md. Arif Ansari :: - 12-12-2018
How can I have this book