मुंबई के भाईचारे में छिपे इस संदेश को सलाम!

हमारा समाज , मुंबई, बृहस्पतिवार , 31-08-2017


mumbai-barish-badh-flood-shivsena-ncp-mnc

लोकमित्र गौतम

कहते हैं किसी समाज के असली मिज़ाज का पता संकट के समय ही लगता है। सोमवार यानी 28 अगस्त 2017 को रात 9 बजे से ही देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और इसके आसपास के उपनगरों में मूसलाधार बारिश हो रही थी। अनुभवी मुंबईकरों को तभी खटका होने लगा था कि अगले दिन कुछ गड़बड़ हो सकता है। लेकिन तड़के बारिश थम गयी। शायद उसे भी आशंका हो रही थी कि लोग सजग हो रहे हैं। इसलिए चकमा देना जरूरी था। मंगलवार यानी 29 अगस्त 2017 की सुबह सामान्य थी। सुबह करीब 9 बजे तक ज्यादातर जगहों में मौसम साफ़ था। इस समय तक  90% से ज्यादा मुंबईवासी घरों से निकल जाते हैं। आज भी निकल गए थे। दरअसल यहाँ कई दफ्तर तो ट्रैफिक की भीड़ से बचने के लिए सुबह आठ बजे ही शुरू हो जाते हैं जिसके लिए लोगों को घर से 6 -7 बजे ही निकलना पड़ता है। कहने का मतलब 9 बजे तक घर से बाहर जाने वाला मुंबई घर के बाहर आ चुका था। ट्रेनें ठसाठस और सडकें लबालब थीं।

मुंबई में बाढ़।

जब ठप हो गयी मुंबई

तभी करीब 9.15 बजे पिछले दिन की तरह एक बार फिर बादल घिर आये और बारिश शुरू हो गयी। देखते ही देखते इसकी रफ़्तार बढ़ी और जल्द ही इस बारिश ने अपना रौद्र रूप धारण कर लिया। बादल झूमकर बिल्कुल मूसलाधार अंदाज में बरसने लगे। दो घंटे तक तो मुंबई की लाइफलाइन ने इस मूसलाधार बारिश को किसी तरह से झेल लिया लेकिन साढ़े बारह के बाद इसके अलग-अलग जगहों से थमने की खबरें आने लगीं और दिन में दो बजते बजते तो इसने पूरी तरह से हाथ खड़े कर दिए। सेंट्रल, वेस्टर्न और हार्बर तीनों लाइनों और इनकी लिंक लाइनों में हर जगह लोकल ट्रेनें जहाँ थीं वहीँ खड़ी हो गईं। उस समय करीब डेढ़ से दो लाख लोग इन ट्रेनों के अन्दर मौजूद थे जबकि 45-50 लाख लोग घरों से बाहर काम के सिलसिले में निकले हुए थे। इनमें स्कूलों के बच्चे और कालेज के छात्र भी थे क्योंकि स्कूलों और कालेजों ने छुट्टी की सूचना और खतरे की चेतावनी देने में देर कर दी थी। 

लोकल के कदम रुकते ही लोगों के चेहरों में खौफ अपनी जगह बनाने लगा और शाम होते–होते तो लोगों के चेहरों पर सिर्फ इसी का कब्जा था। ज्यों-ज्यों दिन ढल रहा था,यह खौफ भी बढ़ता जा रहा था। शुक्र बस इतना था की अभी तक ज्यादातर जगहों में बिजली थी,जिस कारण अँधेरे ने अलग से डराना शुरू नहीं किया था। मगर सभी जगहें इतनी खुशकिस्मत भी नहीं थीं,कई जगहों की लाईट गुल हो गयी थी। जाहिर है डर ,बेचैनी और घबराहट बढ़ने लगी थी। फोन बजते बजते रुकने लगे थे। लग रहा था ये रात मुंबई पर बहुत भारी पड़ेगी। 

लोगों ने बढ़ाया सहयोग का हाथ।

जब एक मैसेज ने दी लोगों को राहत

लेकिन तभी एक मैसेज आया और कुछ ही देर में दूसरा मैसेज भी। इन मैसेजों के साथ ही देखते ही देखते स्थितियां बदलने लगीं। पहला मैसेज हरप्रीत सिंह खालसा और हरनीत सिंह खालसा का था। जिसमें बताया गया था की शहर के हर गुरुद्वारे को लोगों के भोजन और शरण लेने के लिए खोल दिया गया है। आपके नजदीक जो भी गुरुद्वारा हो वहां पहुंचिये। दूसरा मैसेज यह बताने के लिए था कि शहर की अलग-अलग जगहों में वालंटियर मौजूद हैं, आप किसी भी परेशानी में उनकी भी मदद ले सकते हैं। इसके साथ ही लोगों से रिक्वेस्ट भी की गयी थी की इस मैसेज को जहाँ तक संभव हो फैला दीजिये। बताया जाता है कि यह मैसेज 700000 मोबाइलों तक पंहुचा। 

लोग गुरुद्वारों में पहुँचने लगे जहाँ खाना भी मिला,चाय भी मिली और राहत भी बिना किसी का धर्म पूछे, बिना किसी का आधार कार्ड देखे। इस मदद का असर जंगल की आग के जैसे रहा। देखते ही देखते मंदिर, गिरिजाघर और शायद पहली बार मस्जिदें भी बाढ़ में फंसे परेशान लोगों के लिए खुल गयीं। भाईचारे और सर्वधर्म समभाव का यह अद्भुत नजारा था। सिर्फ धर्मस्थल ही बिना किसी भेदभाव के लोगों की मदद के लिए आगे नहीं आये बल्कि लगने लगा अपने अंदाज़ में पूरी मुंबई ही घरों से बाहर मदद के लिए निकल आयी है। किसी ने किसी की न जाति पूछी न धर्म, न नाम पूछा न ये पूछा वोट किसको देते हो और न ही नसीहत दी कि अब इसे नहीं इसे देना। यह अद्भुत नजारा था किताबों से निकलकर हिंदुस्तानियत और इंसानियत मुम्बई की सड़कों में घूम रही थी। कोई हाथ में पूड़ियां लिए था। कोई बड़ा पाँव लिए था। कोई ब्रेड में मक्खन लगाए घूम रहा था कि कोई खा ले।

मदद के लिए आगे आए लोग।

पिकनिक में बदल गया संकट

शायद ही सोशल मीडिया का इससे बढ़िया पहले कभी इस्तेमाल हुआ होगा। लोग फेसबुक में अपने घर की लोकेशन पोस्ट कर रहे थे और वह भी अजनबी लोगों के लिए कि अगर वो आस-पास हों तो आयें,खाएं और शरण लें। इन दिनों मौजूद हर तरफ लगे गणेश पंडाल अब लोगों के अस्थाई राहत कैंप बन गए थे। यहाँ तक कि कुछ घंटों के बाद होटल और रेस्टोरेंट वालों को भी इंसानियत ने संक्रमित कर दिया उन्होंने भी अपनी डोरमेट्री और लॉबी अनजान लोगों के लिए खोल दी। स्टेशन के बाजू वाले मकान अचानक होटलों में तब्दील हो गए। घर चाहे छोटे हों या बड़े आम लोगों के हों या राजनेताओं के 29-30 अगस्त की रात सबके घर अजनबियों के लिए खुल गए बिना किसी भेदभाव के, बिना किसी पूछताछ के। देखते ही देखते बाढ़ आनंददायक पिकनिक लगने लगी। चाय,पकौड़े और भरपूर पैकेट वाले स्नैक्स की पिकनिक।

मुंबई के लोगों ने इस बाढ़ के बहाने देश के उन राजनेताओं को एक बड़ा मैसेज दिया है जो समाज को बांटकर अपनी राजनीति चमकाते हैं। मुंबईकरों ने बताया है कि हिंदुस्तानियत क्या होती है और यह भी कि नेता लोग कितनी ही कोशिश कर लें भारतीयों को आपस में बांटना इतना आसान नहीं है। मुंबईवासियों के इस जज्बे को सलाम।

(लोकमित्र गौतम वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल मुंबई में रहते हैं।)










Leave your comment











Ak dewangan :: - 09-04-2017
मानवता के इस जज्बे को मैं कोटि कोटि नमन करता हूँ।यही है हमारा भारत।अगर ये भावना हर कौम के लोगों में आ जाये तो मज़ाल है कोई आँख उठा कर देखे।

Ak dewangan :: - 09-04-2017
मानवता के इस जज्बे को मैं कोटि कोटि नमन करता हूँ।यही है हमारा भारत।अगर ये भावना हर कौम के लोगों में आ जाये तो मज़ाल है कोई आँख उठा कर देखे।

Pyarelal Bhamboo :: - 08-31-2017
It's a great victory of humanity.

Nikhil Verma :: - 08-31-2017
संकट की घड़ी में मुंबई के लोग जिस तरह से सड़क पर निकल कर लोगों की मदद में दिलोजान से जुट जाते हैं , देखते ही बनता है ! मुंबई के लोगों को सलाम !