दुनिया के मुसलमानों से भिन्न हैं भारत के मुसलमान

हमारा समाज , , बृहस्पतिवार , 10-08-2017


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जगदीश्वर चतुर्वेदी

भारत में हिंदुओं और मुसलमानों ने अन्य समुदायों के साथ मिलकर स्वाधीनता संग्राम लड़ा, संसदीय जनतंत्र चुना, भारत के अधिकांश मुसलमानों ने भारत विभाजन को अस्वीकार करके भारत में रहकर लोकतंत्र के विकास में भूमिका निभाने का फैसला किया। लोकतंत्र का मार्ग मुसलमानों का चुना मार्ग है, यह साम्प्रदायिक ताकतों के द्वारा निर्मित मार्ग नहीं है। बल्कि साम्प्रदायिक ताकतें तो एकजुट भारत के खिलाफ 1947 के पहले भी थीं और 1947 के बाद भी रही हैं। 

हिंदू-मुस्लिम एकता का एक आम दृश्य।

कंधे से कंधा मिलाकर चले हैं मुसलमान

भारत के मुसलमानों ने हमेशा भारत के संविधान को माना और संसदीय लोकतंत्र को पुख्ता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत के मुसलमानों ने कभी साम्प्रदायिकता के आधार पर न तो वोट दिया और न कभी साम्प्रदायिक नेताओं को संसद और विधानसभा में चुनकर भेजा। इसके बावजूद मुसलमानों के विकास के लिए लोकतंत्र में जिस तरह की सुविधाएं और समान अवसर होने चाहिए मनमोहन सरकार के पहले तक किसी सरकार ने उनका ख्याल नहीं किया। 

पहली बार सच्चर कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद विस्तार से पता चला कि आजादी के चालीस साल बाद भी मुसलमानों के सामाजिक-शैक्षणिक-आर्थिक हालात बेहद खराब हैं। यहां तक कि वाम शासन वाले पश्चिम बंगाल में तो सबसे ज्यादा खराब थे। इसलिए यह कहना कि मुसलमानों के लिए कांग्रेस और वाम ने महत्वपूर्ण काम किए हैं यह सही नहीं है। पहली बार सच्चर कमीशन ने हमारे सिस्टम में निहित मुस्लिम विरोधी भावों को उजागर किया। इसके बाद यूपीए सरकार ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व में 15 सूत्री कार्यक्रम लागू किया। आरएसएस के मुस्लिम विरोधी प्रचार से अप्रत्यक्ष तौर पर कांग्रेस और वाम कहीं न कहीं प्रभावित रहे हैं, मुस्लिम तुष्टीकरण का उन पर संघ का आरोप बेबुनियाद है। सच्चाई यह है कि अधिकांश मुसलमान बहुत ही खराब अवस्था में आज भी रह रहे हैं। मुस्लिम तुष्टीकरण का नारा लगाकर आरएसएस हमेशा मुसलमानों के हकों पर हमले करने की कोशिश करता रहा है।

मध्यकाल में भी दिखती है भिन्नता

 भारत के मुसलमान बाकी दुनिया के मुसलमानों से वैचारिक तौर पर भिन्न रहे हैं, यह वैचारिक भिन्नता आधुनिक काल में ही नहीं दिखती बल्कि मध्यकाल में भी दिखती है। बाकी दुनिया के मुस्लिम शासकों और भारत के मध्यकालीन मुस्लिम शासकों के विचारों में बुनियादी अंतर है, इसके कारण आधुनिककाल में भी मुसलमानों में अंतर चला आया, बाद में आधुनिक काल के मुस्लिम विचारकों और स्वाधीनता सेनानी मुसलमानों में बाकी समाज के साथ मिलकर उदारतावाद को मज़बूत बनाने और देश में उदारतावाद का माहौल बनाने का फैसला किया, यह परंपरा बाकी दुनिया के मुस्लिम देशों में नजर नहीं आती। 

दूसरी बात यह कि मुसलमानों का भारत में एक ही विचारधारा की ओर रुझान कभी नहीं रहा, उनमें उदार, धार्मिक, क्रांतिकारी और अनुदारवादी किस्म के लोग और संगठन रहे हैं, इसके बावजूद बहुसंख्यक मुसलमान उदारवादी रहे हैं। इसलिए मुसलमानों को एक ही विचारधारा के दायरे में रखकर नहीं देखना चाहिए। मुसलमानों में भी विचारों की बहुलता है। अफसोस की बात यह है कि हम मुसलमानों को न तो जानना चाहते हैं और न उनके यथार्थ को देखना चाहते हैं। उलटे आरएसएस के प्रचार को सच मानकर चलते हैं। सच यह है कि मुसलमानों के यथार्थ जीवन को लेकर आरएसएस कुछ नहीं जानता, वह साम्राज्यवादी ताकतों के मुसलमान विरोधी प्रचार माल को ही हमारे सामने परोसता रहता है।

तिरंगे का अभिवादन करते मुस्लिम समुदाय के लोग।

आरएसएस के मिथ्या अभियान को रोकना जरूरी

 आरएसएस और उसके भोंपू मीडिया में चल रहे मुस्लिम रूढ़िबद्ध प्रचार अभियान को एक सिरे से ठुकराने की जरूरत है। मुसलमान इस देश के नागरिक हैं, उनके सुख-दुख भी हिंदुओं जैसे होते हैं, वे सतह पर भिन्न हो सकते हैं लेकिन अंदर से तो भारतवासी हैं। सवाल यह है ऊपर की धार्मिक पहचान को हम क्यों अहमियत देते हैं? मुसलमान तो मनुष्य हैं जैसे हिंदू मनुष्य हैं। हम सभी लोगों को मनुष्य के रूप में देखें। कोई यदि अपने को हिंदू कहे या मुसलमान, हमें उसके प्रति मित्रता और भाईचारे का भाव रखना चाहिए।

यह सच है देश में इस समय सत्ता का आतंक और भय छाया हुआ है लेकिन इस भय को मित्रता और शिरकत से तोड़ सकते हैं। राजनीतिक खेमेबाज़ी से यह चीज हासिल नहीं हो सकती।

(जगदीश्वर चतुर्वेदी वरिष्ठ साहित्यकार और लेखक हैं। अध्यापन सेवा से निवृत होने के बाद आजकल दिल्ली में रह रहे हैं।)










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