रात डरकर छिपने के लिए नहीं ढूंढने के लिए है, कोई सुर...कोई सड़क

आधी आबादी , मेरी रात-मेरी सड़क, मंगलवार , 22-08-2017


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वर्षा सिंह

मुझे रात कुछ ज्यादा ही प्यारी है। रात सड़कें और सफ़र दोनों रोमांचित करते हैं। नाइट शिफ्ट के दौरान रात में दफ़्तर से बाहर निकलकर कई बार दोस्तों के साथ चाय पी है। उसका ज़ायका ही कुछ और था।

रात सबको उसके हिस्से का स्पेस देती है। जब सारे काम खत्म कर आप खुद के साथ होते हैं। ये स्पेस बहुत जरूरी है।

रात डर के छिपने के लिए नहीं ढूंढने के लिए है। कोई सुर, कोई सड़क...

आधी रात को हमारा देश आज़ाद हुआ था...वो आधी रात वाली आज़ादी हमारे हिस्से में आनी बाकी है।

'मेरी रात-मेरी सड़क' मुहिम के तहत सड़कों पर निकली लड़कियां। साभार

रात दूर तक जाती कोई शांत सड़क, किनारे लैंप पोस्ट की मंद रोशनी, झिलमिलाते तारों वाला आसमान, आप किधर को ही मुंह घुमा के चल दें, आपका पीछा करने वाला वो बेशर्म चांद..., इस रात के हक़दार तो हम भी हैं।

उस रात अखबार के दफ्तर के बाहर करीब दो बजे हमने बुढ़िया के यहां चाय पी थी। रात दो बजे एक बूढ़ी मां सड़क पर चाय बना रही थी। उसकी केतली से उठती भाप हवा में जमी ठंड को पिघला रही था। स्मृतियों में जमा वो रातरजाई ओढ़कर बिताई गई कई रातों पर भारी है।

और उस रात जब गाड़ी का पेट्रोल लगभग खत्म होने को था। ग्रेटर नोएडा का वो चमचमाता एक्सप्रेस-वे खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। कोई यू टर्न नहीं। अंधेरा सब पर भारी। रात में रास्ता भटक गए तो समझो गए। पर मैं उस रात बच ही गई। पेट्रोल पंप मिल गया। फिर रात को छकाया जा सकता ये भयावह किस्सा रोमांचक बन गया।

खुशनुमा रातों में विलेन!

अब इन सारी खुशनुमा रातों में कोई विलेन घुस जाए। कोई वर्णिका सड़क से गुजरे कोई विकास बराला पीछे पड़ जाए। ये रातें जो रोमांचक थीं, भयावह भी हो सकती थीं। और इस डर से रात में घर से निकलना भूल चुकी लड़कियों के हिस्से की कितनी कहानियां, कितनी सड़कें, कितने लैंपपोस्ट, तारों वाला कितना सारा आसमान गायब है।

हम रातों को सड़क पर निकलें क्योंकि ये सुरक्षित नहीं, दिन के उजाले वाले जेंटलमैन की सीरत रात को बदल जाती है, ये तो भेड़ियोंवाली सी कहानी है। दिक्कत ये है कि सारा सिस्टम इसी बात को सपोर्ट करता है कि लड़कियां रात को घरों से निकलें। इस पर ज़ोर ही नहीं दिया गया कि हमारी सड़कें रातों को भी सुरक्षित हों। हमारी लड़कियां रातों को भी बेधड़क सड़कों पर निकल सकें। ये सिर्फ लड़कियों के रात में घर से निकलने का मामला नहीं है। इससे लड़के लड़कियों में भेदभाव का हल भी निकलता है। मानिए रात को घर में किसी की तबीयत बिगड़ी तो लड़की फटाफट मेडिकल स्टोर जा कर दवा ले आएगी या अस्पताल ले जाएगी। या फिर किसी को देर रात रेलवे या बस स्टेशन छोड़ने जाना हो तो लड़की छोड़ आएगी। आखिर हमारा पूरा समाज लड़कों पर ज़ोर क्यों देता है। ये भी एक वजह बनती है। सुरक्षा।

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

वर्षा मार्ग...वर्णिका मार्ग...

फिर लड़कियों को संस्कृति का पाठ भर-भर के पढ़ाने वाले लड़कों को संस्कृति का भी नहीं सिखा पाते। रातें हमारी हैं, हमारी हैं, हमारी हैं, रातों पर अपना हक़ हम लेकर रहेंगे। रात हमारे छिपने दुबकने के लिए नहीं है। रात के तकिए पर सिर टिकाकर हम देर तक तारों को देखेंगे, अपने विचारों को गूंथेंगे, किसी रात जब नहीं जी चाहेगा हम नहीं सोएंगे। सुबह होने तक जागेंगे, अपने हिस्से की सड़कें ढूंढ़ेगे और तुम्हारी सड़कों पर अपने नाम के पत्थर लगा देंगे। वर्षा मार्ग, दीप्ती मार्ग, वर्णिका मार्ग वगैरा वगैरा। 

बात ये है कि अब लड़कियां ऐसे सपने देख भर नहीं रहीं, ऐसे आंदोलन, ऐसी मुहिम आहूत भी कर रही हैं। वे सड़कों पर निकल रही हैं ये बताने के लिए कि ये सड़कें तुम्हारी बपौती नहीं, हमारी भी हैं, उतनी ही, जितनी तुम्हारी हैं, समझे।

(लेखक वर्षा सिंह कवि और टीवी पत्रकार हैं।)










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