कारगर नहीं हो पायेगी सच को छिपाने की मोदी की सियासत

हमारा समाज , , सोमवार , 02-07-2018


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मदन कोथुनियां

गरीबी की चर्चा न हो, उसका मतलब यह नहीं होता है कि इस देश में कोई गरीब नहीं है। बहस के केंद्र में न होने का मतलब यह कतई नहीं है कि इस देश में सबको समान व सर्वसुलभ शिक्षा उपलब्ध हो गई है। किसानों की बदहाली मुख्यधारा की मीडिया के मुंह पर न आए, उसका मतलब यह नहीं है कि खेत छोड़कर सड़कों पर बैठने वाले लोग किसान ही नहीं थे। चिकित्सा व्यवस्था के मुद्दे को यज्ञों के हवाले करने का यह मतलब कतई नहीं है कि अब एलोपैथिक चिकित्सा व्यवस्था अपने उत्कर्ष तक पहुंच गई है और अब हम खुशी के मारे यज्ञों में नवाचार ढूंढने लग गए हैं। आज युवा सोशल मीडिया पर एक दूसरे को ट्रोल करने और रोज नए-नए चुटकुले निर्मित करने में लगे हैं। अब इसका मतलब यह तो नहीं है कि मोदीजी ने सबको रोजगार दे दिया है। यह सियासत व सियासत के भूखे लोगों का मायाजाल है। इसको समझने के लिए मुनव्वर राणा का यह शेर पढ़िए.....

सियासत किस हुनरमंदी से सच्चाई छुपाती है!

जैसे सिसकियों के जख्म शहनाई छुपाती है।। 

जो इसकी तह में जाता है वो वापिस नहीं आता। 

जैसे नदी हर तैरने वाले से गहराई छुपाती है!!

बस यही है मोदी के मुद्दों के मायने। मीडिया सरकारी तोता बन गया है। बुद्धिजीवी डरकर खामोश हो गए हैं। विरोधी सीबीआई, आईटी, ईडी के आगे नतमस्तक हैं और जो कुछ दिनों पहले राजनीति में आने की तैयारी कर रहे थे उनको हर हाल में टिकट चाहिए क्योंकि वो नदी में उतर चुके हैं। डूबे या तैरकर पार हो जायें लेकिन चुनौती की चाशनी खून में घुल चुकी है। ऐसी चुनौती कि सब मुद्दे किनारे, बस लुटेरों की बस्तियों में एक अदद सा मकान हासिल करना है। खुद की वजूद वाली बस्तियों के बयाबान देखने का समय किसी के पास नहीं है!

बस इस देश की जवानी से उम्मीदें बची हुई हैं। यह बुड्ढों का देश है और बूढ़ों का खून कभी बगावत नहीं कर सकता। बगावत के लिए खून में उबाल जरूरी है और यह गर्माहट जब मैं युवाओं से मिलता हूं तो महसूस भी करता हूं। युवाओं! इसलिए किसी की बात को मत मानों कि वो उम्र में तुमसे बड़ा है। किसी की बात इस आधार पर मत मानों कि वो ज्यादा पढ़ा-लिखा या बड़ी पोस्ट पर है। इस आधार पर भी किसी की बात मत मानों कि पूर्वजों के लिखे धार्मिक शास्त्र या कालजयी रचनाएं श्रेष्ठ हैं। 

प्राकृतिक व्यवस्था में कुछ भी कालजयी या अंतिम सत्य नहीं होता है। पनघट पर बैठकर प्यार की नुमाइश करते-करते व्हाट्सअप व फेसबुक पर आ चुके हो, क्योंकि यह सुविधाजनक है। मां ने पत्थर की चक्की बाड़े में रख दी, क्योंकि इलेक्ट्रिक चक्की ज्यादा सुविधाजनक है। मथानी, गिड़गिड़ा खूंटी से गायब हो गए क्योंकि घी निकालने के लिए मशीन ज्यादा सुविधाजनक है। हर जगह बदलाव को तुम दिल खोलकर स्वीकार कर रहे हो तो हजारों सालों पहले जिन इंसानों की कल्पना,सोच और निर्माण क्षमता थी, उनको चुनौती देने की, नवाचार अपनाने की हिम्मत तुममें क्यों नहीं है!

अगर हमारे अनपढ़ मां-बाप गोबर को किनारे करके गैस पर खाना बना रहे हैं। पैदल धार्मिक यात्राओं का नाटक छोड़कर बच्चों की शिक्षा के लिए शहरों की यात्राएं कर रहे हैं तो हम युवा दिमाग से कैसे पैदल होते जा रहे हैं? हर जगह हमने नवाचारों को, बदलावों को, विज्ञान की तरक्की को तवज्जो देते हुए तार्किकता को अपनाया है तो सब कुछ हासिल करके भी हम धर्म,जाति,पाखंड और अंधविश्वास के मामले में इतनी मूढ़ता और जड़ता के शिकार होकर कैसे बैठ गए?

सोचिए! धर्म और सत्ता का रिश्ता बहुत पुराना है। अगर इसके भेद को समझकर भेद करना सीख गए तो न हमारे सामने कोई मोदी बड़ा सुल्तान है न योगी की सल्तनत। न राहुल कोई राजकुमार है, न गाय कोई माता। न गोबर कोई कोहिनूर है, न गृहस्थ जीवन के पलायनकर्ता बाबाजी हमारे आदर्श। 

किसी भी देश की तरक्की के वाहक युवा हैं। जवानी को सही दिशा में झोंकिए फिर देखना इस देश की सियासत, सत्ता व मीडिया किस तरह गरीबी,चिकित्सा,शिक्षा, रोजगार आदि के मुद्दों पर गला फाड़ता नजर आएगा। गलती व्यवस्था की नहीं, बल्कि इस देश के युवाओं की है।

अगर तुम्हारे दिलों में आग है तो मैं चिंगारी बनकर उसको भड़काने निकला हूं। अगर तुम्हारे अंदर बगावत की हिम्मत है तो मैं हौंसला देने निकला हूं! अगर तुम मानसिक अपंगता त्यागने के मूड में हो तो मैं सहारा बनकर कंधा देने निकला हूं। अगर स्थापित व्यवस्था को हथौड़ा मारकर ध्वस्त करना चाहते हो तो मैं बारूद बनकर तुम्हारे साथ खड़ा रहूंगा। अपने खून को पानी मत होने दीजिए। आप बगावत करिये, बागी बनिये, व्यवस्था से विद्रोह करिए। मैं विद्रोही बनकर आपके साथ खड़ा रहूंगा।

                           (मदन कोथुनियां स्वतंत्र पत्रकार हैं और जयपुर में रहते हैं।) 










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