तुम क्यों नहीं बोलते नसीर, तुम बोले क्यों नसीर?

कहां आ गए हम... , , शनिवार , 29-12-2018


naseeruddin-controversy-statement-bjp-modi-inspector-bulandshahar

अमोल सरोज

2014 से 2019 आने को है। इन पांच सालों में क्या कुछ अलग हुआ है ? जो अलग हुआ है, वह देश और समाज के लिए कितना घातक है, इसका पूरा पता आने वाले सालों में ही चल पाएगा। जो हालात सामने हैं, उनके लिए कौन-कौन जिम्मेदार हैं, यह भले ही बहस का विषय हो सकता है पर कम से कम मुझे इस बात में संदेह नहीं है कि हालात बहुत ज्यादा ख़राब हैं जिनका असर आने वाले सालों में और भयावह रूप में दिखाई देने वाला है। फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने पिछले दिनों अपनी चिंता और गुस्सा व्यक्त किया कि एक गाय के मरने को एक इंस्पेक्टर की हत्या से ज्यादा तरजीह दी जा रही है। इस देश में जो हो रहा है, वह शायद अब सुधर न सके।

कैसा भयावह समय है, पुलिस के एक इंस्पेक्टर को गुंडों द्वारा उसकी चौकी पर हमला करके मार दिया जाता है? मीडिया इस हत्या को गाय से जोड़कर दिखाता है। जाने-माने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह इस स्थिति पर चिंता जताते हैं तो केंद्र सरकार का एक मंत्री उन्हें देश छोड़ने की बात कहता है। कुछ बुद्धिजीवियों को लगता है कि नसीर ने यह बयान देश में हो रही बाकी गंभीर घटनाओं पर से ध्यान हटाने के लिए दिया। गोया एक पुलिस अधिकारी की पुलिस चौकी पर हमला कर की गई हत्या कोई गंभीर घटना नहीं है।

या इस देश में सरकार को जिसे अपने ही इंस्पेक्टर की मौत की परवाह नहीं है, वह इतनी डरी बैठी है कि उसने गंभीर घटनाओं से ध्यान हटाने के लिए नसीर को पे रोल पर लिया हुआ है? ऐसे बुद्धिजीवियों को हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर साम्प्रदायिक मुहिम का मसला भी फर्जी लगता है। ऐसे बुद्धिजीवी कमाल के जीव हैं कि किसी भी घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करना उन्हें बीजेपी का ट्रैप लगता है और ख़ामोशी कायरता। उनका बस चले तो वो किसी संवेदनशील इंसान को इन घटनाओं पर अभिव्यक्ति देने पर प्रतिबंधित कर दें। 

उनके कितने आसान से तर्क हैं- `पहले क्यों नहीं बोले?` `अब क्यों बोले?` कमाल बात है कि उनके निशाने पर अधिकतर वह अभिनेता या कलाकार रहता है जो बोलने के सब खतरों को जानते-बुझते हुए बोलता है। ऐसे कलाकारों की संख्या वैसे भी न के बराबर ही है। 

इस रीढ़विहीन समाज में कोई बोलता है तो उस पर फासिस्टों की तरफ से हमले तो समझ आते हैं पर खुद को प्रगतिशील कहने-कहलवाने वाले लोग भी उसके पक्ष में खड़े होने के बजाय उस पर अपनी कांसिपिरेसी थियरी के साथ हमला करते नजर आते हैं। तो मैं उनके दिल की बात समझने की कोशिश करता हूं। क्या वो ये कहना चाहते हैं कि जब हम सब चुप बैठे हुए हैं तो तेरी हिम्मत कैसे हुई बोलने की? या हमारे होते, तू क्यों बोल रहा है? चुपचाप फिल्म कर ताकि हम तुम्हें चुप रहने पर गरिया सकें।

हो सकता है कि जनाब नसीरुद्दीन शाह फासिस्टों के पे रोल पर हों और जान-बूझकर ऐसा स्टेटमेंट दिया हो जिससे फासिस्टों को तथाकथित फायदा (?) मिल रहा हो! वहीं ये भी हो सकता है कि ऐसी थियरी देने वाले बुद्धिजीवी ही सरकार के पे रोल पर हों ताकि सरकार के खिलाफ कोई आवाज उठाने की हिम्मत ही नहीं कर सके? होने को कुछ भी हो सकता है पर क्या इतनी सी बात समझना बहुत बड़ी बात है कि आज के वक्त बीजेपी के पास इतनी बड़ी आईटी सेल है कि उसे ऐसा कोई काम करने के लिए नसीर या किसी की भी जरूरत क्यों होने लगी? 

16 साल का बच्चा ईद की खरीदारी करने जाता है और दिन दहाड़े ट्रेन में मार दिया जाता है। एक बूढ़े इंसान को घर में ही घेर कर मार दिया जाता है। उसके क़त्ल के आरोपी की मौत होती है तो उसे तिरंगे में लपेट कर लाया जाता है। एक यूनिवर्सिटी के होनहार और राजनीति की अद्भुत समझ रखने वाले छात्र को फासिस्ट आत्महत्या करने पर मजबूर कर देते हैं। देश की राजधानी में एक यूनिवर्सिटी में से एक छात्र ऐसे गायब कर दिया जाता है जैसे जहान में था ही नहीं। पुलिस चौकी पर हमला करके एक इंस्पेक्टर को मार दिया जाता है। क्या इन सब घटनाओं का विरोध करने के लिए हमें सोचना पड़ेगा? किसी भी संवेदनशील इंसान को क्यों सोचना पड़ेगा? क्या कोई भी वक्त इन घटनाओं पर प्रतिक्रिया जताने, प्रतिरोध दर्ज कराने के लिए ग़लत हो सकता है?

नोएडा में पुलिस अधिकारी ने एक कम्पनी को नोटिस भेजा है कि वह कर्मचारियों को पब्लिक पार्क में नमाज करने से मना करे। जब तीन-चार साल छोटे भाई के मुंह से यह बात सुनने को मिली थी कि मुसलमान तो पार्क में भी नमाज पढ़ते हैं तो उसके रुख पर बहुत हैरानी हुई थी। वह पूरी तरह से आश्वस्त था कि ऐसा करना एक गैर क़ानूनी काम है और सरकार ऐसा करने देकर तुष्टीकरण कर रही है। मैंने जब उससे पूछा कि क्या मैं पार्क में बैठ कर हाथ जोड़ के प्रार्थना नहीं कर सकता तो उससे जवाब नहीं दिया गया। मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था कि देश की कानून व्यवस्था को कायम रखने की जिम्मेदारी जिस अधिकारी पर है वह बाकायदा ऐसा लिखित नोटिस भेज सकता है।

वह नोटिस बहुत भयावह है। क्या कम्पनी में काम करने वाले श्रमिक कम्पनी के गुलाम हैं जो श्रमिकों के पार्क में होने के लिए कम्पनी को नोटिस भेजा जा रहा है? पार्क में शांतिपूर्वक बैठने के लिए किस की इजाजत की जरुरत होती है? सार्वजानिक पार्क और किस लिए होता है? ये नोटिस बताता है कि संविधान लोकतंत्र और कानून जैसे शब्दों का किस कदर मजाक बनाया हुआ है! उन्हें न किसी की परवाह है ना किसी का खौफ है। गरीबों के पेशाब-टट्टी जाने तक के लिए खौफ पैदा किया जा रहा है। बिल्कुल सच है ये सब सिर्फ पिछले पांच सालों में नहीं हुआ है। बरसों की मेहनत है जो कि पिछले पांच सालों में खुले में दिखने लगी है। पर अब सवाल यह है कि हम क्या कर सकते हैं या क्या कर रहे हैं? इतनी बेबसी में ही शायद फ़ैज़ साहब के `दुआ` में `हाथ उठे होंगे`-

``जिनका दीं पैरवी-ए-किज़्ब-ओ-रिया है उन को 

हिम्मत-ए-कुफ़्र मिले जुरअत-ए-तहक़ीक़ मिले 

जिन के सर मुंतज़िर-ए-तेग़-ए-जफ़ा हैं उन को 

दस्त-ए-क़ातिल को झटक देने की तौफ़ीक़ मिले`` 

(लेखक अमोल सरोज स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

 








Tagnaseeruddin controversy statement bjp bulandshahar

Leave your comment