वैज्ञानिक नजरिये की राह में सियासत का रोड़ा

बदलाव , , शनिवार , 18-11-2017


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उपेंद्र चौधरी

मचलती, इठलाती, कण-कण को ताज़गी से सहलाती, तन मन में ऊर्जा की लहर जगाती और फितरत के साथ साबिक लय से मन को मोहती-संवारती सूरज की किरणें! आज इन किरणों में न कोई आलस था, न मायूसी थी,  न बादलों की ओट से इंसानी हरक़तों की होती किसी तरह की कोई जासूसी थी। आज सूरज की किरणों ने अपने और धरती के बीच से प्रदूषण का कारण बनती धूल को बादल की बूंदों के बीच धकेल दिया था। आज सुबह धवल वातावरण ने स्वच्छ पर्यावरण की दस्तक सुना दी थी। प्रदूषण पैदा करने वाली धूल की व्याख्या से सियासी अहसास का मुलम्मा उतर गया था। भौगोलिक और भौतिकीय सिद्धांत ज़मीन पर उतरकर ख़ुद को हमारे अपने भीतर अहसास करने का हमें मौक़ा दे रहा था।

पराली के जलाये जाने की सियासी जुगाली वाली व्याख्या ने प्रदूषण की असली और वैज्ञानिक विश्लेषण को निगलने की कोशिश की दी थी। शुरू में थोड़ा अचरज हुआ, अपनी ही सामूहिक मूर्खता पर खीझ भी हुई। लेकिन समझने में देर नहीं लगी कि विज्ञान की बुनियादी समझ आज भी हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा नहीं बन पायी है। चेतना चाहे, सामाजिक हो, आर्थिक हो, यहां तक कि अध्यात्मिक या राजनीतिक हो, विज्ञान की बुनियादी समझ की दरकार हर कहीं पड़ती है। मगर, विचारधाराओं में बंटी भावनात्मक राजनीति ने इस दरकार को भी तर्क से पार ले जाकर दोफ़ाड़ कर दिया है। प्रदूषण के घनीभूत होने पर इसके लिए पराली के जलाये जाने को ज़िम्मेदार ठहराये जाने का मज़ाक उड़ा,उसकी भावनात्मक अभिव्यक्तियां हुईं और दसवीं कक्षाओं तक में विज्ञान पढ़ने-पढ़ाने वालों ने उसकी आधारभूत समझ से ही अपनी सोच का मुंह मोड़ लिया। ऐसा ही कुछ होली और दिवाली के समय भी उन निर्देशों-आदेशों और सुझावों का हस्र होता देखा जा रहा है, जिसे कोई ग्रीन ट्रिब्यूनल या न्यायालय इंसानी ज़िंदगी के लिए ज़रूरी समझता है। ये निर्देश-आदेश और सुझाव ट्रिब्यूनल या न्यायालय से निकलते ही झट से होली में सांप्रदायिक रंग अख़्तियार कर लेते हैं, दिवाली में सामूहिक रौशनी की जगह सांप्रदायिक शोले का रूप धर लेते हैं और समावेशी संस्कृति की जगह गहरी खींचती भेद-रेखाओं में ढलने लगते हैं।

विविधता की एक बड़ी विशेषता होती है कि अगर हमने उसे विज्ञान की नज़रों से देखा तो वह हमें विकास की ऊंचाइयां उपलब्ध करा सकती है और अगर हमने उसे अवैज्ञानिक नज़रिये से देखने की आदत डाल ली, तो वो हम अब तक पाये गये विकास के खंडहर में भी दब सकते हैं। विविधता प्राकृतिक है, इसलिए जब हम उसके साथ कृत्रिमता सरीखा व्यवहार करते हैं, तो वह विध्वंसात्मक रूप ले लेती है। धर्म-जाति-नस्ल-रस्म-ओ-रिवाज़, संगीत की साज अपनी विविधता में ही लयात्मक कोरस पैदा कर पाते हैं। इस लयात्मक कोरस में ही यह माद्दा होता है कि वह विकास को सिद्धांतों और नारों से निकालकर व्यवहारिक और स्थूल रूप दे पाये। अपनी कमियों के बावजूद अमेरिका जैसा देश इसका जीता जागता उदाहरण रहा है। वहीं कभी सोवियत रूस के साथ विकसित होने का अहसास करने वाले मध्य एशियई गणराज्य, यूएसएसआर के टूटने के बाद से विविधता की लय से दूर विविधता की फ़ांस में उलझकर भविष्य के ताने-बाने के बिगड़ने की आशंकाओं से जूझने लगे हैं। 

दिल्ली-एनसीआर का आकाश आज साफ़ है, वातावरण में उम्मीद भरी एक चमक है, जलायी गयी पराली से मुरझाया हुआ पर्यावरण बारिश की ऐसी हल्की बूंदों से हरा-हरा और जीवंत हो गया है, जिसमें किसी के माथे को भी सराबोर करने की क्षमता नहीं थी। अगर ये बादल टूटकर बरस गये होते, तो पर्यावरण की हंसी की आहट, खिलखिलाहट के स्वर से प्रकृति के हर घटक के पोर-पोर में मोर नचा दिया होता।बहरहाल,अच्छा है कि जिस सुबह में सांस लेने की ज़रूरत समझी जाती है, उस गुनगुने सुबह में बच्चों को अपने नाक और मुंह पर आज मास्क लगाकर स्कूल जाते हुए नहीं देखा,साइकिल से नौकरी बजाने वाले किसी मज़दूर-गार्ड को अपने गंदे-भद्दे रुमाल से नाक ढके नहीं देखा। छोटी-बड़ी गाड़ी वाले भले ही अपनी गाड़ियों के शीशे बंद कर इस ऐंठ में रहते हों कि सांस में घुलते प्रदूषण उनता क्या बिगाड़ लेगा, मगर स्कूल छोड़ते ही उनके बच्चे भी उन्हीं विविध वर्गों से आये बच्चों की भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं,जिनके स्कूल के प्रांगण खुले आकाश तले ठहरे हुए प्रदूषण की गिरफ़्त में लगभग सप्ताह भर कुलबुलाते-हड़बड़ाते रहे।

जनसंख्या से घनीभूत होते दिल्ली-एनसीआर के लोगों को सिर्फ़ पराली की व्याख्या में ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की ज़रूर हो, ऐसा नहीं; उनके साथ पूरे देश-दुनिया में एक वैज्ञानिक नज़रिये से समस्याओं को देखने की आदत डालनी होगी। ऐसा इसलिए नहीं कि इससे हमारी ज़िंदगी ही सिर्फ़ सहूलियत पाती है, बल्कि आने वाले हमारी अपनी ही पीढ़ियों की ज़िंदगी सुरक्षित हो पायेगी। सियासत ताक में है कि वैज्ञानिक नज़रिया मंद होते जायें ताकि लोगों की चेतना को मूढ़ता में बदला जा सके,जागरूकता को एक भीड़ की मानसिकता में तब्दील किया जा सके और सिर्फ़ मनमाफ़िक वोटर में बदल दिये जाने वाले उस भीड़ के बूते सत्ता की पीठ पर लगातार सवारी की जाती रहे।

दिल्ली की नई सुबह

मगर, आज हुई बारिश की हल्की-हल्की बूंदों ने हमारी समझ और चेतना की क्षमता पर भी वैज्ञानिक नज़रिये की एक हल्की सी जुंबिश दे दी है। विज्ञान की उस जुंबिश ने काले और सफेद बादलों में अंतर करने का इशारा किया है; बादल काले होने से भी बारिश हो, ज़रूरी नहीं, बादल की सफेदी भी वर्षा की गारंटी नहीं। अगर हम समझ नहीं रखते,तो बाक़ियों की तरह मौसम और जलवायु की व्याख्या करने वाली वैज्ञानिक संस्थाओं से समझ उधार लेने में भी कोई बुराई नहीं, क्योंकि ये न सिर्फ़ हमारी व्याख्या क्षमता के पार की वैज्ञानिक क़यास लगाते हैं, बल्कि इन क़यासों के बूते हम अपनी व्याख्या क्षमता का भी विस्तार करते हैं। 

समय रहते हम अपने वैज्ञानिक नज़रिये को क़ायम कर लें ताकि आज की तरह कल की सुबह भी और आगे आने वाले हर कल की सुबह हममें ताज़गी का अहसास करा दे। विज्ञान जबतक किसी आख़िरी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता, वैज्ञानिक नज़रिये से निष्कर्ष की तलाश करने वालों के बीच भी एक ही विषय वस्तु पर विरोध और बहस की गुंजाईश भरपूर होती है। हम ऐसे ही विरोध के साथ वैज्ञानिक निष्कर्ष की तलाश करने वाले ऐसे मुसाफ़िर बनें,जिन सबकी मंज़िल एक बेहतर ज़िंदगी से ज़्यादा कुछ भी नहीं हो !

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)           


 










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